“सच्चा संन्यास: आडंबर नहीं, आत्मज्ञान और भक्ति का मार्ग

महेंद्र मुनि ने अनेक सिद्धियाँ प्राप्त कर ली थीं, परंतु वे इससे संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने भास्कर योगी के पास जाकर दीक्षा ली। गुरु कृपा और साधना से उन्हें पूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद महेंद्र मुनि लोगों के दुःख दूर करने और उन्हें सही मार्ग पर लाने के लिए भ्रमण करने लगे। एक बार उन्होंने देखा कि कुछ लोग संन्यासी का वेश धारण किए हुए हैं, परंतु उनमें संन्यासी के कोई गुण नहीं हैं। वे केवल दिखावा और पाखंड कर रहे हैं। उन लोगों को शिक्षा देने के लिए उन्होंने कहा, ‘क्या संन्यास का उद्देश्य चार्वाक अनुयायियों की तरह सुखपूर्वक संसार का आनंद लेते हुए जीवन व्यतीत करना है? यदि ज्ञान प्राप्त हो जाए, तो क्या आश्रमधर्म के विरुद्ध पाखंड को बढ़ावा दिया जा सकता है? यदि ज्ञान प्राप्त न हो, तो उसके लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए और गुरु सेवा, जप, नित्यकर्म आदि के द्वारा अंतःकरण को शुद्ध करके ज्ञान का अधिकारी बनना चाहिए अथवा महात्मा घोषित होकर लोगों द्वारा पूजित होना चाहिए। पेट-पूजा में लिप्त होकर अपने जीवन और अपने पवित्र आश्रम को नष्ट न करें।’ सच्चे संत के वचन उन आडंबरपूर्ण संन्यासियों के हृदय को चुभ गए और उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने महेंद्र मुनि से क्षमा मांगी और कहा, ‘प्रभु! आपने हमारे ज्ञानचक्षु खोल दिए हैं, कृपया हम आपकी शरण में आएँ।’ इसके बाद उन्होंने सभी को ज्ञान-विज्ञान का उपदेश दिया और उन्हें भक्ति के मार्ग पर लगाया।
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