महात्मा बुद्धगीर और हिंगलाज माता के चमत्कारी दर्शन की कथा

पूर्वजन्म के प्रभाव से महात्मा बुद्धगीर को बाल्यकाल में ही वैराग्य हो गया था। उन्होंने जयपुर के नुवा गाँव में संत लक्ष्मणगीर की शरण ली और उनसे दीक्षा प्राप्त की। गुरुदेव ने उन्हें हिंगलाज देवी (वर्तमान में पाकिस्तान अधिकृत बलूचिस्तान प्रांत में स्थित) के मंदिर जाने का निर्देश दिया और कहा, “रास्ते में अपने गुरुभाई गौरीबाबा से मिलो।” गुरुदेव के निर्देश का पालन करते हुए वे उस स्थान पर पहुँचे जहाँ गौरीबाबा रहते थे। गौरीबाबा ने कहा, “हिंगलाज देवी का मंदिर यहाँ से बहुत दूर है; मैं तुम्हें यहीं उनके दर्शन कराऊँगा।” अपनी आध्यात्मिक शक्ति से गौरीबाबा ने उन्हें हिंगलाज की देवी भवानी के दर्शन कराए और कहा, “फतेहपुर से डेढ़ मील दूर खड्ड में एक पहाड़ी पर जाकर देवी माँ की आराधना करो।
वे वहाँ प्रकट होंगी और न केवल तुम्हें दर्शन देंगी, बल्कि यहाँ के लोगों को भी आशीर्वाद देंगी।” गुरुभाई के अनुसार, बुद्धगीर महाराज ने उस टीले पर वर्षों तक तपस्या की, और माता हिंगलाज उनके सामने प्रकट हुईं, और माता की एक मूर्ति ज़मीन से प्रकट हुई, जिसके बाद महात्मा बुद्धगीर की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। महाराव राजा लक्ष्मण सिंह ने उनसे कुछ गाँव दान में देने का अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने कहा, “मैं माता का भक्त हूँ, और माता मेरी देखभाल करती हैं। आपको अपना धन गरीबों के कल्याण के लिए खर्च करना चाहिए।” राजा लक्ष्मण सिंह ने ऐसा ही किया। राजा लक्ष्मण सिंह ने महात्मा बुद्धगीर की समाधि पर एक शिव मंदिर बनवाया।
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