छत्तीसगढ़ के जल संसाधन: मानसून, नहरें और सिंचाई से बदलती खेती

छत्तीसगढ़ में जल संसाधन – छत्तीसगढ़ भारत के ऐसे हिस्से में स्थित है जहाँ भरपूर बारिश होती है, लेकिन मानसून के अनियमित स्वभाव के कारण, कुछ-कुछ सालों के अंतराल पर सूखा पड़ता है। औसत बारिश वाले सालों में कृषि उत्पादन बहुत अच्छा होता है। हालाँकि, औसत से कम बारिश वाले सालों में कृषि गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं। राज्य में मानसून की बारिश का स्वभाव भी सिंचाई की ज़रूरत को बढ़ाता है। ज़्यादातर बारिश जून से सितंबर तक ही होती है। बाकी महीने आमतौर पर सूखे रहते हैं। इन सूखे महीनों के दौरान, कृषि गतिविधियाँ केवल उन्हीं क्षेत्रों में संभव हैं जहाँ की मिट्टी में नमी बनाए रखने की क्षमता होती है। इसके अलावा, मानसून की बारिश का स्वभाव ऐसा है कि कभी-कभी बारिश जल्दी शुरू हो जाती है और जल्दी खत्म भी हो जाती है। राज्य बनने के बाद से सिंचाई सुविधाओं का तेज़ी से विस्तार हुआ है। इसलिए, यहाँ के किसान अब पूरी तरह से प्राकृतिक बारिश पर निर्भर नहीं हैं।
सिंचाई के साधन – राज्य बनने के समय, सिंचित क्षमता 13.28 लाख हेक्टेयर थी, जो मार्च 2002 तक बढ़कर 14.11 लाख हेक्टेयर हो गई। यह विभिन्न स्रोतों से बढ़ी हुई सिंचाई का परिणाम है। वर्तमान में, राज्य में सिंचाई मुख्य रूप से चार तरीकों से की जाती है: (a) नहरें, (b) तालाब, (c) कुएँ, और (d) ट्यूबवेल। (a) नहरों द्वारा सिंचाई: छत्तीसगढ़ में नहरें सिंचाई का मुख्य साधन हैं। 2000-2001 में, 984,162 हेक्टेयर के कुल सिंचित क्षेत्र का लगभग 69 प्रतिशत नहरों द्वारा सिंचित किया गया था। महानदी और तंदुला नहरें यहाँ की प्रमुख नहरें हैं। ये रायपुर, धमतरी, बलौदाबाजार, दुर्ग और बालोद तहसीलों को सिंचित करती हैं। जशपुर का सामरी-पाट क्षेत्र भी नहरों द्वारा सिंचित होता है। इस क्षेत्र में नहरों का उपयोग करने वाली प्रमुख सिंचाई परियोजनाओं में महानदी (रायपुर), पैरी (रायपुर), कोदार (रायपुर), जोंक (रायपुर), रविशंकर सागर (रायपुर), गोंटूर (रायपुर), दुधवा बांध (रायपुर), हसदेव (बिलासपुर), मिनियारी जलाशय (बिलासपुर), कन्हार (सरगुजा), तंदुला (दुर्ग), और अर्पा (बिलासपुर) नदियों पर बनी परियोजनाएँ शामिल हैं। इन प्रोजेक्ट्स के अलावा, छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, बस्तर, दुर्ग और रायगढ़ जिलों में कई अन्य छोटे प्रोजेक्ट भी चल रहे हैं।
छत्तीसगढ़ की प्रमुख सिंचाई परियोजनाओं में अधोलिखित उल्लेखनीय हैं-
(1) हसदो बाँगो मिनीमाता परियोजना जांजगीर-चाम्पा। (2) महानदी जलाशय परियोजना धमतरी, रायपुर, दुर्ग। (3) पैरी परियोजना रायपुर जिला। (4) कोडार-परियोजना रायपुर जिला। (5) जॉक-परियोजना रायपुर जिला। (6) रवारंग-परियोजना बिलासपुर जिला । (ख) तालाबों से सिंचाई: प्राचीन छत्तीसगढ़ में तालाब सिंचाई के प्रमुख साधन थे। इस समय मात्र 06 प्रतिशत क्षेत्र तालाबों से सिंचित है। यद्यपि छत्तीसगढ़ तालाबों से भरा हुआ है। प्रत्येक गाँव के पास तालाब हैं। अनेक गाँवो में एक से अधिक तालाब है। तालाबों के अतिरिक्त छोटे नालों को बाँध कर भी सिंचाई की जाती है। इन्हें टार कहते हैं। राज्यशासन ने विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत तालाब निर्माण का कार्य आरंभ किया है। इससे ग्रामीणों को कृषि मौसम के बाद न केवल रोजगार मिल रहा है, बल्कि सिंचाई और निस्तारी के साधन में भी वृद्धि हो रही है। (ग) कुओं से सिंचाई: छत्तीसगढ़ का 4 प्रतिशत क्षेत्र कुओं के माध्यम से सिंचित हैं। कुओं से पानी खींचने के लिए अब विद्युत चालित यंत्र तथा डीजल पम्पों का प्रयोग हो रहा है। सब्जियों की माँग बढ़ने से भी कुओं का उपयोग बढ़ा है। (घ) नलकूपों से सिंचाई: छत्तीसगढ़ के कृषि क्षेत्र का 21 प्रतिशत नलकूप-सहित अन्य साधनों से सिंचित है। यहाँ कुएँ खोदकर कम खर्च से अधिक सिंचाई की जाती है।
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