कर्तापन से साक्षीभाव तक: त्रिगुणातीत होकर आत्मा की अमरता का अनुभव

विवेकशील मनुष्य प्रकृति के तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्त्ता के रूप में नहीं देखता है और स्वयं को गुणों से परे अनुभव करता है और वह सत्यस्वरूप को प्राप्त होता है। दूसरे शब्दों में जब मनुष्य द्रष्टा बन जाता है और इस सत्य की अनुभूति करता है कि उसकी गुणों के साथ असंगता है, तब उस समय वह परमात्मा के त्रिगुणातीत, सच्चिदानंदघनस्वरूप को तत्त्वतः जानते हुए भगवान के सत्यस्वरूप को प्राप्त होता है।मनुष्य के जीवन में दुःख, जन्म-मरण के चक्र में पड़ने से आते हैं। जन्म-मरण के चक्र में पड़ने का मूल कारण कर्म-संस्कारों का एकत्रित होना है और उनका इकट्ठा होना कर्त्तापन के भाव के कारण है। जैसे ही हम कर्त्तापन के भाव से मुक्त होकर साक्षीभाव से इस सृष्टि के क्रियाकलापों को देखते हैं, वैसे ही उस निरासक्ति के भाव में हम अपने मूलस्वरूप के निकट होने लगते हैं।
ज्यों-ज्यों हम अपने या यों कहें कि परमात्मा के मूलस्वरूप के निकट होने लगते हैं, इस बात को गहराई से जान व मान लेते हैं कि हम कर्त्ता नहीं, यंत्र मात्र हैं- ऐसा होते ही हम परम पुरुष को, परमेश्वर को प्राप्त हो जाते हैं। विवेकी मनुष्य, देहधारी देह को उत्पन्न करने वाले इन तीनों गुणों का अतिक्रमण करते हुए जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूपी दुःखों से रहित होकर अमरता को अनुभव करता है। यहाँ अमरता का अर्थ शरीर की नहीं, आत्मा की अमरता से है। जिस मनुष्य के भीतर अकर्त्ता का, साक्षी का, त्रिगुणातीत का भाव उत्पन्न हो जाए, फिर उसे थामने की सामर्थ्य भला किस शारीरिक विकार में है।ऐसा मनुष्य एक स्वतः सिद्ध अमरता को प्राप्त कर लेता है। वह फिर शरीरजन्य सभी अवस्थाओं से पार व परे चला जाता है; क्योंकि वह त्रिगुणातीत बन जाता है, भावातीत बन जाता है। इस भावातीत अवस्था को उपलब्ध हो जाना ही मुक्ति है। इन तीनों गुणों से अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणों से युक्त होता है, उसका आचरण कैसा होता है और इन तीनों गुणों का अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है ?
यह प्रश्न एक का नहीं है, वरन अनेकों का है। अनेक साधकों, व्यक्तियों, जिज्ञासुओं के मन में यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि जो पुरुष प्रकृति के इन तीनों गुणों से पार व परे चला गया है, वो जो भावातीत है, त्रिगुणातीत है, उसकी पहचान कैसे हो सकती है ? पहला प्रश्न तो उन लक्षणों से संबंधित है, जो एक त्रिगुणातीत व्यक्ति की पहचान बन जाएँ। दूसरा प्रश्न उसके आचरण को लेकर है तो तीसरी जिज्ञासा यह है कि मनुष्य किन प्रयासों को करने से त्रिगुणातीत हो पाता है ? इनको एक-एक करके समझने का प्रयत्न करते हैं।अनेक लोगों को यह भ्रम है कि जो व्यक्ति जीवनमुक्त हो जाता है, जो व्यक्ति त्रिगुणातीत हो जाता है, वह बाहर से कुछ भिन्न हो जाता है। लक्षण कहते ही उन गुणों को हैं, जो बाहर से गिनाए जा सकें। ऐसा पूछने का एक कारण यह है कि हमने इस संसार का वर्गीकरण इस आधार पर किया है, जिसे हम देख-सुन पाते हैं। इसीलिए लोग रंग, वर्ण, गोरे-काले, शारीरिक बल, लिंग, छोटे-बड़े आधारों पर बँट गए हैं।
चूँकि हमारे प्रगति के मापदंड बाहरी हैं, अतः आंतरिक जगत् के परिवर्तन को भी हम बाह्य लक्षणों के आधार पर जाँचने या मापने का प्रयत्न करते हैं।यदि कोई व्यक्ति गुणों से पार जाता है तो यह एक आत्मिक, आंतरिक परिवर्तन है और इसका बाहरी लक्षणों से कोई संबंध नहीं है। यदि कोई आंतरिक शांति को प्राप्त करता है तो कौन-सा बाह्य लक्षण उसकी पुष्टि करता है ?हिंदी में हम दो शब्दों का प्रयोग करते हैं- आकृति व प्रकृति। आकृति बाह्य संरचना, बनावट व लक्षण का नाम है तो प्रकृति आंतरिक संरचना का। त्रिगुणातीत होने पर व्यक्ति की आंतरिक संरचना भिन्न होती है। उसके भावों का रूपांतरण होता है, परिस्थितियाँ नहीं बदलतीं, पर उसकी मनःस्थिति बदल जाती है। घटनाक्रम नहीं बदलते, पर उन घटनाक्रमों के प्रति उसका दृष्टिकोण बदल जाता है।सच यह है कि त्रिगुणातीत व्यक्ति के बाहरी लक्षण बहुत ज्यादा भिन्न नहीं होते, बल्कि कई मानों में तो वह और भी ज्यादा साधारण हो जाता है। इसी जिज्ञासा के क्रम *में दूसरा प्रश्न है कि उस त्रिगुणातीत व्यक्ति का आचरण कैसा होता है? आचरण आंतरिक रूपांतरण की अभिव्यक्ति है। बाहर के लक्षण तो महापुरुषों के साधारण ही रहते हैं, परंतु उनके गुण, कर्म, स्वभाव व आचरण में महानता, दिव्यता व भगवत्ता परिलक्षित होती है।
*कई लोग बाहर की साधारणता से भ्रमित हो बैठते हैं और ये सोचने लगते हैं कि इस व्यक्ति में तो कुछ भी विशेष दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है, पर सत्य यह है कि महापुरुषों के जीवन की असाधारणता उनके बाह्य आचरण से नहीं, वरन आंतरिक गुणों व आचरण से प्रकट होती है। बाहर से तो वे यह दिखाने का कभी प्रयत्न भी नहीं करते कि वे किसी दृष्टि से विशिष्ट हैं या उनमें कोई विशिष्ट लक्षण है। इसीलिए कई लोग परमपूज्य गुरुदेव से मिलते समय यह धोखा खा जाते थे कि बाह्य लक्षणों में तो कुछ असाधारणता नहीं दिखाई पड़ रही; जबकि सत्य यह था कि पूज्य गुरुदेव की अलौकिकता, आंतरिक रूपांतरण के कारण थी।जो त्रिगुणातीत हो गया हो उसे बाह्य आडंबर करने की, कोई विशेष परिधान पहनने की, कोई विशेष केशविलास रखने की आवश्यकता ही क्यों पड़ेगी- ये मूर्खताएँ तो मात्र गुणों में उलझे व्यक्तियों के लिए हैं। जो त्रिगुणातीत हो गया है उसके बाहरी लक्षण, आचरण क्या होंगे एवं त्रिगुणातीत बनने का क्या उपाय है? यह प्रश्न एक अद्भुत प्रश्न है; क्योंकि इसमें प्रश्न तीन होने के साथ-साथ उनके तल भी तीन हैं।
ये तीनों प्रश्न चेतना के भिन्न-भिन्न तलों से उभर कर आए हैं। शास्त्रों में प्रश्नों के तीन तल बताए गए हैं। पहला-कौतुक या कुतूहलवश पूछा गया प्रश्न।शास्त्र कहते हैं कि ऐसे प्रश्न बालसुलभ चपलता से उभरकर आते हैं। बच्चों के मन में एक प्रश्न उभरता है, पर वह एक कुतूहल से ज्यादा नहीं कहा जा सकता है। वो प्रश्न पूछते हैं, परंतु उसका उत्तर मिले या न मिले इससे उन्हें ज्यादा सरोकार नहीं है। वो प्रश्न मात्र पूछने के लिए पूछा गया प्रश्न है। अर्जुन का पहला प्रश्न कुछ ऐसी ही चपलता से उभरा था, इसीलिए उन्होंने दूसरे तल से दूसरा प्रश्न किया।शास्त्र कहते हैं कि मानवीय चेतना के दूसरे तल से जिज्ञासा जन्म लेती है। जिज्ञासा माने वो प्रश्न, जिसका उत्तर * जानने की इच्छा हो परंतु अभी यह प्रश्न जन्म-मरण का * प्रश्न बन सका है अर्थात ऐसा प्रश्न न बन सका हो कि यदि
उसका उत्तर न मिले तो व्यक्ति के लिए जीवन ही संभव न हो सके।अर्जुन का दूसरा प्रश्न एक ऊपरी तल से था, पर तब भी एक जीवन की दिशा का निर्णायक प्रश्न नहीं था। उनका तीसरा व अंतिम प्रश्न एक जीवन-दिशा हेतु निर्धारक प्रश्न था। एक ऐसा प्रश्न कि यदि उसका उत्तर पाने की इच्छा हमारे मन में गहरी बैठ जाए तो जीवन की दिशा बदल जाती है।प्रकाश और प्रवृत्ति तथा मोह- ये सभी अच्छी तरह से प्रवृत्त हो जाएँ तो भी गुणातीत मनुष्य इनसे द्वेष नहीं करता और ये सभी निवृत्त हो जाएँ तो इनकी इच्छा नहीं करता। ऐसा इसलिए कि उसका – गुणातीत महापुरुष का वृत्तियों के साथ राग-द्वेष चला जाता है। हमें जीवन में अनुकूलता या प्रतिकूलता अनुभव ही राग-द्वेष के कारण होती है। जहाँ राग जुड़ जाए, वहाँ अनुकूल भाव की प्रतीति होने लगती है और जिधर द्वेष का भाव जुड़ जाए, उधर प्रतिकूल भाव का अनुभव होने लगता है।जो व्यक्ति गुणातीत हो गया है। उसके अंतस् में अनुकूल परिस्थितियाँ बनी रहें व प्रतिकूल चली जाएँ, ऐसी इच्छा नहीं पनपती। उसके अंतःकरण में वृत्तियाँ आती-जाती हैं, पर वह स्वयं उनसे निर्लिप्त व निर्विकार रहता है।
वृत्तियों का संबंध प्रकृति से है और वे उसके गुणों के कारण बनती व बिगड़ती हैं; जबकि हमारा संबंध परमात्मा के साथ है और जब व्यक्ति त्रिगुणातीत होकर या प्रकृति के गुणों से पार जाकर परमात्मा के सत्यस्वरूप से एकाकार हो जाता है तो उसके मन में इससे न तो अनुकूल और न ही प्रतिकूल भाव जन्म लेते हैं।ऐसा तब ही संभव है, जब मनुष्य में एक आंतरिक एवं स्थायी परिवर्तन घटित हो गया हो। लक्षण बाहरी होते हैं और असली बात भीतर होती है, जैसे बाहर से बार-बार अभ्यास दिलाकर यदि कोई परिवर्तन थोप दिया जाए तो भी वह परिवर्तन व्यक्तित्व का अंग नहीं बन पाता है।आज वैज्ञानिक तरीकों से व्यक्ति के हॉर्मोन्स, अंदर के केमिकल्स बदल पाना संभव है, पर ऐसा कर देने से वह व्यक्ति त्रिगुणातीत नहीं हो जाता है।बाहर की बदलाहट सतही बदलाहट होती है, पर इससे कोई आत्मिक उत्थान या आध्यात्मिक उत्थान संभव नहीं हो पाता है, बल्कि कई अर्थों में तो इससे विपरीत ही
घटता है कि आत्मिक उत्थान की समस्त संभावनाएँ पूर्णतया नष्ट हो जाती हैं।इसे ऐसे समझें कि हमारे द्वारा किसी घटना को घटने के लिए दो तत्त्वों की आवश्यकता है। एक तो उस गतिविधि के लिए नैसर्गिक तत्त्व हमारे शरीर में होने चाहिए तो दूसरा उन रासायनिक तत्त्वों से हमारी चेतना को जोड़ने के लिए एक तादात्म्य का भाव हमारे भीतर चाहिए। जैसे हिंसा करने के लिए हमारे भीतर संबंधित हॉर्मोन्स की आवश्यकता है तो साथ ही हिंसा का भाव उत्पन्न करने के लिए घटना विशेष के साथ तादात्म्य के कारण उपजे क्रोध की भी आवश्यकता है।काम-वासना के लिए यदि निश्चित रासायनिक हॉर्मोन्स की जरूरत है तो वो भाव मन में उभरने के लिए उपजी वासना की भी आवश्यकता है। इनमें से शारीरिक या रासायनिक तत्त्वों को नष्ट कर देने से आंतरिक तादात्म्य का अंत नहीं होता, जैसे आँख फोड़ देने से मन में कुविचार आने बंद नहीं हो जाते। जैसे शरीर से काम-वासना की ग्रंथि काट देने से नपुंसकता आ जाती है, पर उससे ब्रह्मचर्य नहीं पैदा हो जाता।ब्रह्मचर्य का भाव या वो आंतरिक स्थिरता का भाव -साक्षीभाव से आता है और साक्षीभाव आंतरिक तादात्म्य के समाप्त हो जाने से उपजता है।
वह आंतरिक तादात्म्य राग व द्वेष के कारण पनपता है।जैसे ही व्यक्ति राग-द्वेष से मुक्त होकर, निर्विकार होकर, साक्षीभाव से कर्म करता है तो उसके व्यक्तित्व के भीतर एक जागरूकता, निर्मलता का भाव महसूस किया जा सकता है और इस भाव को ही ‘प्रकाश’ कहकर पुकारते हैं। वे कहते हैं कि राग-द्वेष से मुक्त पुरुष के शरीर, इंद्रिय एवं अंतःकरण में एक विशिष्ट निर्मलता, प्रकाशरूप में आते हैं।सतोगुण के प्रभाव से उपजी इस प्रकाशवृत्ति का यदि उसमें स्वतः ही प्रादुर्भाव हो जाता है तो भी उसके ऊपर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता और जब यह प्रकाशवृत्ति तिरोहित हो जाती है तो भी वह उसके आगमन की प्रतीक्षा नहीं करता। दूसरे शब्दों में उसके प्रादुर्भाव या तिरोभाव-दोनों के समय उसकी स्थिति अपरिवर्तित रहती है।इसी प्रकार काम, लोभ, स्पृहा एवं आसक्ति जो रजोगुण की प्रवृत्ति से होने वाले कार्य हैं, वे भी गुणातीत पुरुष में नहीं होते। किसी भी स्फुरणा और क्रिया के प्रादुर्भाव और तिरोभाव में उसकी स्थिति सदा एक-सी बनी रहती है। इसी क्रम में तमोगुण की प्रचुरता के कारण होने वाला मोहभाव भी उसमें नहीं होता है।गुणों से पार गया मनुष्य, सतोगुण के कार्यरूप प्रकाश को, रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को तथा तमोगुण के कार्यरूप मोह को प्रवृत्त होने पर न तो उन्हें बुरा समझता है और न उनकी निवृत्ति पर उनकी आकांक्षा करता है। यह निस्पृहता ही गुणातीत पुरुष की पहचान कही जा सकती है।
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