औद्योगिक विकास में ट्रेड यूनियनों की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

Senior Reporter India |। सुप्रीम कोर्ट ने देश में औद्योगिक विकास की रफ्तार पर ट्रेड यूनियनों की भूमिका को लेकर कड़ी टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि इंडस्ट्रियल ग्रोथ में आने वाली कई बाधाओं के लिए ट्रेड यूनियन काफी हद तक जिम्मेदार रही हैं, जिसके चलते देश की कई पारंपरिक औद्योगिक इकाइयों को बंद होना पड़ा है। कोर्ट के अनुसार, कुछ यूनियन लीडर औद्योगिक प्रगति में सहयोगी बनने के बजाय रुकावट का कारण बनते गए हैं।
इन टिप्पणियों के साथ ही अदालत ने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन तय करने और उसके लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा लागू करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई से इनकार कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि मौजूदा कानूनों में संशोधन करने के लिए वह केंद्र या राज्य सरकारों को कोई निर्देश जारी नहीं कर सकती। सुनवाई के दौरान CJI ने कहा कि यदि ऐसी याचिकाएं स्वीकार की गईं, तो हर घर कानूनी विवादों में उलझ सकता है। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि न्यूनतम वेतन तय होने की स्थिति में लोग घरेलू कामगारों को रखना ही बंद कर सकते हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि सिंगापुर जैसे देशों में घरेलू कामगारों के लिए रजिस्ट्रेशन, साप्ताहिक अवकाश और न्यूनतम वेतन अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि सामूहिक सौदेबाजी (कलेक्टिव बारगेनिंग) प्रभावी तरीका है और याचिकाकर्ता पंजीकृत ट्रेड यूनियन हैं।
इस पर CJI ने ट्रेड यूनियनों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि कई बार यूनियन नेता संघर्ष के बीच मजदूरों को असहाय स्थिति में छोड़ देते हैं, जिससे वास्तविक हित प्रभावित होते हैं।
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