बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: उम्रकैद घटाकर 12 साल, दोषी के सुधारात्मक प्रयासों को माना आधार

Senior Reporter India | मुंबई से एक महत्वपूर्ण न्यायिक फैसला सामने आया है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने नाबालिग बच्ची से दुष्कर्म के दोषी को दी गई आजीवन कारावास की सजा में संशोधन करते हुए उसे 12 वर्ष की कैद में बदल दिया है। अदालत ने जेल में उसके व्यवहार, पढ़ाई में रुचि और महात्मा गांधी के विचारों पर लिखे गए Essay तथा पुस्तकों के Analysis से जुड़े प्रमाणपत्रों को ध्यान में रखते हुए यह राहत दी।
जस्टिस सारंग कोटवाल और जस्टिस संदेश पाटिल की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अपराध अत्यंत गंभीर था, लेकिन सजा तय करते समय आरोपी की परिस्थितियों और उसके सुधार के संकेतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि घटना के समय आरोपी की उम्र महज 20 वर्ष थी और उसका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। वह नौ वर्ष से अधिक समय से जेल में बंद है और कोविड-19 महामारी के दौरान भी उसे जमानत नहीं मिली।
पीठ ने कहा कि इन सभी पहलुओं को समग्र रूप से देखते हुए सजा में आंशिक नरमी उचित है। न्यूनतम 10 वर्ष की अनिवार्य सजा के प्रावधान के बीच अदालत ने 12 वर्ष की सजा को संतुलित मानते हुए बरकरार रखा, जो पहले से काटी गई अवधि के साथ समायोजित होगी।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि बच्ची को उसके परिजनों ने रंजिशवश बयान देने के लिए प्रेरित किया। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पांच वर्ष की बच्ची के लिए इतनी जटिल और मनगढ़ंत कहानी गढ़ना असंभव है।
हाई कोर्ट ने POCSO Act की धारा 6 के तहत दोषसिद्धि को कायम रखा और पीड़िता तथा उसकी मां के बयान को विश्वसनीय और स्वाभाविक माना।
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