वेस्ट अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे छिपा 23 मिलियन साल पुराना समुद्री राज़ उजागर

Senior Reporter India | वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने वेस्ट अंटार्कटिक आइस शीट के भीतर अब तक की सबसे गहरी ड्रिलिंग कर एक बड़ा खुलासा किया है। रिसर्चर्स ने बर्फ और तलछट (Sediment) की परतों के भीतर झांककर ऐसे प्रमाण जुटाए हैं, जो बताते हैं कि लाखों वर्ष पहले यह क्षेत्र पूरी तरह जमी हुई बर्फ नहीं था, बल्कि यहां खुला महासागर मौजूद था।
इस विशाल आइस शीट में इतनी बर्फ जमी है कि अगर यह पूरी तरह पिघल जाए तो वैश्विक समुद्र स्तर लगभग 4 से 5 मीटर तक बढ़ सकता है। यह खोज भविष्य में समुद्र के बढ़ते स्तर को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
टीम ने करीब 523 मीटर मोटी बर्फ और उसके नीचे 228 मीटर गहरी चट्टानों और मिट्टी में ड्रिल कर कोर सैंपल निकाले। शुरुआती विश्लेषण से संकेत मिले हैं कि ये नमूने लगभग 23 मिलियन वर्ष पुराने हैं। उस दौर में पृथ्वी का औसत तापमान आज के प्री-इंडस्ट्रियल समय से लगभग 2 डिग्री सेल्सियस अधिक था।
अमेरिका की बिंघमटन यूनिवर्सिटी की सह-प्रमुख वैज्ञानिक मौली पैटरसन के अनुसार, तलछट में मिले कुछ अवशेष वर्तमान आइस शीट के नीचे पाए जाने वाले जमाव जैसे थे। लेकिन इसके साथ ही उन्हें समुद्री जीवों के खोल और ऐसे जीवों के निशान भी मिले, जिन्हें सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है। यह संकेत देता है कि किसी समय यहां खुला समुद्र या तैरती बर्फ की परत मौजूद रही होगी।
वैज्ञानिक पहले भी अनुमान लगाते रहे हैं कि रॉस आइस शेल्फ़ के पीछे हटने से यह इलाका कभी समुद्र में बदल गया होगा, लेकिन इसका सटीक समय स्पष्ट नहीं था। अब मिले नए भूवैज्ञानिक रिकॉर्ड से पर्यावरणीय बदलावों की समय-रेखा समझने में मदद मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि अतीत में आइस शीट के पिघलने के कारणों का अध्ययन करने से यह समझने में सहायता मिलेगी कि वर्तमान ग्लोबल वार्मिंग के दौर में बर्फ कितनी तेज़ी से घट सकती है। हाल के दशकों में सैटेलाइट डेटा से यह संकेत मिल चुका है कि यह आइस शीट लगातार द्रव्यमान खो रही है, हालांकि तापमान वृद्धि के सटीक प्रभाव को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।
ड्रिलिंग अभियान जनवरी में पूरा हुआ। इसके बाद कोर सैंपल को करीब 1,100 किलोमीटर दूर स्कॉट बेस पहुंचाया गया, जहां से उन्हें आगे के विस्तृत परीक्षण के लिए न्यूज़ीलैंड भेजा जाएगा। आने वाले महीनों में इन नमूनों का गहन अध्ययन पृथ्वी के जलवायु इतिहास के कई अनसुलझे सवालों के जवाब दे सकता है।
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