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मातृभाषाओं का भविष्य: अनेक भाषाएं, एक साझा कल

Senior Reporter India | दुनिया की हर मातृभाषा अपने समाज की पहचान, परंपराओं और इतिहास की जीवित धरोहर होती है। किसी भी समुदाय की संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए उसकी भाषाई विविधता को बचाना अनिवार्य है। लेकिन तेजी से बढ़ते तकनीकी युग में मातृभाषाएं सबसे अधिक चुनौती का सामना कर रही हैं। आज बोलचाल से लेकर लेखन तक, भाषा का प्रयोग काफी हद तक तकनीक पर निर्भर हो गया है।

तकनीक की प्रकृति ही ऐसी है कि वह बाजार की मांग के अनुसार विकसित होती है। जिन भाषाओं को बोलने वालों की संख्या कम है, उनके लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संसाधन विकसित करने में कंपनियां कम रुचि दिखाती हैं। परिणामस्वरूप कई भाषाएं उपयोग के अभाव में धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं।

भारत के संदर्भ में देखें तो 1961 की जनगणना में 1,652 भाषाओं का उल्लेख था, जो 1971 में घटकर 808 रह गईं। 2013 के भारतीय लोकभाषा सर्वेक्षण के अनुसार पिछले पाँच दशकों में 220 भाषाएं समाप्त हो चुकी हैं और लगभग 197 भाषाएं खत्म होने के कगार पर हैं। यह स्थिति उस समय की भी है जब तकनीकी विस्तार इतना व्यापक नहीं था। भाषाविदों का मानना है कि शहरीकरण, बदलती जीवनशैली, उपभोक्तावाद, पारंपरिक मूल्यों से दूरी और रोजगार के सीमित अवसरों ने भी भाषाओं के अस्तित्व पर असर डाला है।

फिर भी कई क्षेत्रों में मातृभाषाओं के प्रति लगाव कायम है। यही कारण है कि इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की थीम “भाषाओं का महत्व: रजत जयंती और सतत विकास” रखी गई है। इसका संदेश स्पष्ट है—“अनेक भाषाएं, एक भविष्य।” यह थीम इस बात पर जोर देती है कि वैश्विक विकास की प्रक्रिया में भाषाई विविधता की भूमिका महत्वपूर्ण है।

पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में 1952 के भाषा आंदोलन के शहीदों की स्मृति में इस दिवस की शुरुआत हुई थी। वर्ष 2025 में इसकी रजत जयंती मनाई गई, जहां भाषाई विविधता, डिजिटल सशक्तिकरण और समावेशी शिक्षा पर विशेष बल दिया गया। विश्व स्तर पर यह स्वीकार किया गया है कि मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और सतत विकास का मजबूत आधार है।

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार दुनिया की लगभग 40 प्रतिशत आबादी को अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलता। जबकि शोध बताते हैं कि Mother tongue में शिक्षा बच्चों के आत्मविश्वास, बौद्धिक क्षमता और समझ को बेहतर बनाती है। इससे नई भाषाएं सीखना भी सरल हो जाता है। भारत की नई शिक्षा नीति में भी स्थानीय भाषाओं में शिक्षा को प्राथमिकता दी गई है।

हर भाषा अपने भीतर परंपरागत ज्ञान, लोककथाएं, चिकित्सा पद्धतियां और सामाजिक अनुभवों का खजाना समेटे होती है। यदि भाषाएं समाप्त होती हैं, तो मानव सभ्यता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी खो जाता है। इसलिए आवश्यक है कि तकनीक और Innovation के माध्यम से इन भाषाओं को डिजिटल दुनिया में स्थान मिले। यह जिम्मेदारी केवल निजी कंपनियों की नहीं, बल्कि सरकारों और सार्वजनिक संस्थानों की भी है कि वे भाषाओं को संरक्षित और प्रोत्साहित करें।

मातृभाषाओं का संरक्षण केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक लोकतंत्र और समावेशी विकास की बुनियाद है। यदि हम विविध भाषाओं को बचा पाए, तो हम अपनी साझा विरासत और भविष्य दोनों को सुरक्षित रख पाएंगे।

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