जब घर ही बन जाए डर की जगह: रिश्तों के भीतर बढ़ती हिंसा का कड़वा सच

Report. देश के अलग-अलग हिस्सों से हाल के दिनों में ऐसी दर्दनाक घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने समाज को भीतर तक हिला दिया है। इन मामलों की सबसे भयावह बात यह है कि अपराधी कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि अपने ही परिवार के सदस्य निकले। घर, जिसे सुरक्षा और स्नेह का स्थान माना जाता है, कुछ मामलों में खतरे की जगह बनता दिखाई दे रहा है।
लखनऊ में एक युवक ने मामूली कहासुनी के बाद अपने पिता पर गोली चला दी। घटना यहीं नहीं रुकी, बल्कि उसने शव को टुकड़ों में बांटकर छिपाने की कोशिश की। वहीं दिल्ली के समयपुर बादली इलाके में एक व्यक्ति पर अपनी गर्भवती पत्नी और तीन मासूम बेटियों की हत्या का आरोप लगा। वारदात के बाद वह फरार हो गया, लेकिन बाद में उसे राजस्थान के किशनगढ़ से गिरफ्तार कर लिया गया।
इसी तरह बिहार के बक्सर में एक शादी समारोह के दौरान एक महिला को गोली मार दी गई। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर Viral हो गया और लोगों के बीच गुस्सा और दहशत फैल गई।
परिवार के भीतर होने वाले अपराध केवल हत्या तक सीमित नहीं होते, वे भरोसे की नींव को भी तोड़ देते हैं। जब अपने ही लोग जान लेने पर उतारू हो जाएं, तो समाज में असुरक्षा की भावना गहराती है। ऐसे मामलों में सबसे अहम सवाल यह नहीं कि अपराध क्यों हुआ, बल्कि यह है कि स्थिति वहां तक पहुंचे ही क्यों, जहां से वापसी असंभव हो जाती है।
क्लीनिकल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि घरेलू हिंसा के पीछे कई मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हो सकते हैं। व्यक्तित्व की जटिलताएं, पुराना मानसिक आघात, बचपन में हिंसक माहौल देखना, या रिश्तों में अधिकार भावना — ये सभी तत्व मिलकर किसी व्यक्ति को आक्रामक बना सकते हैं। कई बार लोग अपनी गलतियों का ठीकरा दूसरों पर फोड़ते हैं और हिंसा को सही ठहराने लगते हैं।
हालांकि आंकड़े बताते हैं कि पारिवारिक हिंसा के अधिकतर मामलों में पुरुष आरोपी होते हैं, लेकिन हाल के वर्षों में कुछ घटनाओं में महिलाएं भी मुख्य आरोपी के रूप में सामने आई हैं। जून 2025 में एक चर्चित मामले में सोनम रघुवंशी ने मेघालय में हनीमून के दौरान अपने पति की हत्या की साजिश रची थी। इस तरह की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि हिंसा किसी एक लिंग तक सीमित नहीं है।
यदि अतीत पर नजर डालें तो 1995 का चर्चित तंदूर कांड भी याद आता है। उस मामले में Sushil Sharma ने अपनी पत्नी Naina Sahni की हत्या कर शव को ठिकाने लगाने की कोशिश की थी। यह मामला आज भी भारतीय अपराध इतिहास के सबसे भयावह अध्यायों में गिना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हर व्यक्ति में स्वाभाविक रूप से आक्रामकता होती है, लेकिन सामाजिक मूल्य, नैतिक शिक्षा, सहानुभूति और सुरक्षित संबंध उसे नियंत्रित रखने में मदद करते हैं। जब ये नैतिक सीमाएं कमजोर पड़ जाती हैं, तो क्रूरता अपने चरम पर पहुंच सकती है।
करीबी रिश्तों का आधार भरोसा और सुरक्षा की भावना होती है। जब वही संबंध हिंसा में बदल जाते हैं, तो केवल एक परिवार नहीं, बल्कि पूरा समाज मानसिक रूप से प्रभावित होता है। इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि मानसिक स्वास्थ्य, संवाद और समय पर हस्तक्षेप (Intervention) की जरूरत पहले से कहीं अधिक है।
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