Uncategorized

क्या एक साधारण ब्लड टेस्ट से पहले ही पता चल जाएगा कैंसर? नई रिसर्च ने उठाए बड़े सवाल

वैज्ञानिकों का कहना है कि नया blood test कई तरह के कैंसर का संकेत ढूंढ सकता है, लेकिन इसकी accuracy को लेकर अभी और रिसर्च की जरूरत है

Report| कैंसर की जल्दी पहचान के लिए वैज्ञानिक एक नए तरह के blood test पर काम कर रहे हैं, जिससे बीमारी के लक्षण सामने आने से पहले ही उसका संकेत मिल सकता है। इस तकनीक को लेकर काफी उम्मीदें जताई जा रही हैं क्योंकि एक ही टेस्ट से शरीर में कई प्रकार के कैंसर की जांच संभव बताई जा रही है।

इस प्रक्रिया में खून के नमूने में मौजूद डीएनए के बेहद छोटे टुकड़ों की तलाश की जाती है, जो कैंसर कोशिकाओं से निकलकर रक्त में पहुंचते हैं। लैब में अत्याधुनिक मशीनें इन डीएनए पैटर्न का विश्लेषण करती हैं और यह पता लगाने की कोशिश करती हैं कि शरीर में कहीं कैंसर विकसित तो नहीं हो रहा।

अगर यह तकनीक पूरी तरह सफल साबित होती है तो लोगों को किसी गांठ, अचानक वजन घटने या अन्य लक्षणों का इंतजार करने की जरूरत नहीं होगी। इसके बजाय हर 6 या 12 महीने में एक साधारण जांच से कैंसर के शुरुआती संकेत पकड़े जा सकते हैं।

इसी दिशा में NHS England ने भी बड़े स्तर पर इस तकनीक का परीक्षण किया है। लगभग 1.42 लाख लोगों पर किए गए ट्रायल को कुछ विशेषज्ञों ने मेडिकल क्षेत्र में संभावित बड़ी क्रांति बताया था।

रिसर्च में सामने आई नई सच्चाई

हालांकि बाद में जब वैज्ञानिकों ने इन परीक्षणों के परिणामों का गहराई से विश्लेषण किया तो तस्वीर थोड़ी अलग नजर आई। ब्रिटेन में हुई एक बड़ी स्टडी में पाया गया कि यह ब्लड टेस्ट उन कई कैंसर मामलों को पकड़ने में असफल रहा जो बाद में प्रतिभागियों में विकसित हुए।

इसका मतलब यह है कि यदि किसी व्यक्ति का टेस्ट नेगेटिव आता है तो भी यह पूरी तरह सुनिश्चित नहीं करता कि उसे कैंसर नहीं है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे लेकर सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं।

गलत भरोसा भी बन सकता है खतरा

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अगर लोग इस तरह के टेस्ट पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करने लगें तो वे शरीर में दिखाई देने वाले लक्षणों को नजरअंदाज कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, किसी नई गांठ, लगातार खांसी, बिना कारण वजन कम होना या असामान्य रक्तस्राव जैसे संकेत होने पर भी लोग डॉक्टर के पास जाने में देर कर सकते हैं।

पारंपरिक जांच जैसे मैमोग्राम, कोलोनोस्कोपी या सर्वाइकल स्क्रीनिंग दशकों के शोध पर आधारित हैं और इनके जरिए कई लोगों की जान बचाई गई है। हालांकि इनमें भी सीमाएं हैं, लेकिन इनके लाभों के मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं।

गलत अलर्ट और खर्च की समस्या

मल्टी-कैंसर ब्लड टेस्ट का एक और पहलू यह है कि कभी-कभी ये गलत संकेत भी दे सकते हैं। यानी रिपोर्ट में कैंसर का शक दिखे जबकि व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ हो। इससे मरीज और उसके परिवार पर अनावश्यक मानसिक दबाव पड़ सकता है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त जांच का बोझ भी बढ़ सकता है।

इसके अलावा इन टेस्ट की लागत भी काफी अधिक हो सकती है। अगर इन्हें पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण मिलने से पहले बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया गया तो स्वास्थ्य सेवाओं के संसाधन दूसरी जरूरी चीजों से हट सकते हैं, जैसे धूम्रपान छोड़ने के कार्यक्रम, वजन नियंत्रण या मौजूदा स्क्रीनिंग योजनाओं को मजबूत करना।

फिर भी पूरी तरह खारिज नहीं

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस तकनीक को पूरी तरह नकारना सही नहीं होगा। इसके पीछे की विज्ञान तकनीक तेजी से विकसित हो रही है और भविष्य में यह खास तौर पर हाई-रिस्क समूहों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।

जिन लोगों के परिवार में कैंसर का इतिहास है या जिनमें जेनेटिक म्यूटेशन मौजूद हैं, उनके लिए ऐसे टेस्ट ट्यूमर का जल्दी पता लगाने में मदद कर सकते हैं। इसके अलावा यह भी देखा जा रहा है कि इलाज के बाद कैंसर दोबारा लौट रहा है या नहीं, इसकी निगरानी में भी यह तकनीक सहायक हो सकती है।

लोगों को क्या करना चाहिए

जब तक इस तकनीक पर और ठोस वैज्ञानिक प्रमाण सामने नहीं आते, तब तक विशेषज्ञ कुछ सावधानियां बरतने की सलाह देते हैं। अगर किसी व्यक्ति को ऐसे टेस्ट के क्लिनिकल ट्रायल में शामिल होने का मौका मिले, तो उसे पहले यह समझना चाहिए कि स्टडी का उद्देश्य क्या है और अब तक क्या नतीजे सामने आए हैं।

यदि कोई प्राइवेट संस्थान इस तरह की जांच कराने की सलाह देता है, तो यह पूछना जरूरी है कि रिपोर्ट का मूल्यांकन कौन करेगा और उसके बाद चिकित्सा सहायता कैसे मिलेगी।

सबसे अहम बात यह है कि शरीर में किसी भी असामान्य बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। नई गांठ, लगातार खांसी, बिना कारण वजन घटना, असामान्य ब्लीडिंग या पाचन की आदतों में बदलाव जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए, चाहे पिछला टेस्ट सामान्य ही क्यों न आया हो।

विशेषज्ञों का कहना है कि बेहतर इलाज, समय पर पहचान और जनस्वास्थ्य उपायों की वजह से कैंसर के परिणाम धीरे-धीरे बेहतर हो रहे हैं। नई तकनीकें इस दिशा में मदद कर सकती हैं, लेकिन फिलहाल इन्हें चमत्कारी समाधान मानना सही नहीं होगा।

नए खबरों के लिए बने रहे सटीकता न्यूज के साथ।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
अडूसा: प्राकृतिक औषधि जो सर्दी, खांसी, घाव और दर्द में देती है राहत शादी में पुरुष क्या चाहते हैं? सुंदरता से ज़्यादा ये 5 गुण रिश्ते को बनाते हैं मज़बूत परीक्षा में सही टाइम मैनेजमेंट और स्मार्ट टाइम टेबल कैसे करे सर्दियों में इम्यूनिटी बढ़ाने का देसी तरीका, घर पर बनाएं सेहत से भरपूर कांजी स्वाद भी सेहत भी: बयु/बबुआ खाने के फायदे जानकर आप भी इसे डाइट में ज़रूर शामिल करेंगे गले की खराश से तुरंत राहत: अपनाएं ये असरदार घरेलू नुस्खे