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दुनिया में तेजी से बढ़ रहा Breast Cancer का खतरा, 2050 तक मामले 35 लाख तक पहुंचने की आशंका

वैश्विक Study में खुलासा—वायु प्रदूषण और देर से जांच भी बढ़ा रहे हैं महिलाओं में स्तन कैंसर का जोखिम

Report| नई दिल्ली। स्तन कैंसर आज दुनिया भर में महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। कई स्वास्थ्य अभियानों और जागरूकता कार्यक्रमों के बावजूद इस बीमारी के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है।

मेडिकल जर्नल लैंसेट ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित 204 देशों के आंकड़ों पर आधारित एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2023 में दुनियाभर में करीब 23 लाख महिलाओं में स्तन कैंसर के नए मामले सामने आए। वहीं इस बीमारी के कारण लगभग 7.6 लाख से अधिक महिलाओं की जान चली गई।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय पर जांच और रोकथाम के उपायों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर हो सकती है। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक हर साल करीब 35 लाख महिलाओं में स्तन कैंसर के नए मामले सामने आ सकते हैं। इसके साथ ही इस बीमारी से होने वाली मौतों की संख्या भी बढ़कर लगभग 14 लाख तक पहुंच सकती है।

भारत में भी स्तन कैंसर के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। साल 1990 के बाद से देश में इस बीमारी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

दिल्ली स्थित एम्स अस्पताल के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ. अभिषेक शंकर के अनुसार वायु प्रदूषण भी इस बीमारी के खतरे को बढ़ा सकता है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2023 में प्रकाशित एक वैश्विक शोध में पाया गया कि जिन इलाकों में पीएम 2.5 का स्तर ज्यादा होता है, वहां रहने वाली महिलाओं में स्तन कैंसर होने की संभावना करीब 28 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, स्तन कैंसर महिलाओं में पाया जाने वाला सबसे सामान्य कैंसर है। वैश्विक स्तर पर हर मिनट लगभग चार महिलाओं में इस बीमारी की पहचान की जाती है।

अलग-अलग देशों में स्तन कैंसर से होने वाली मौतों की दर भी अलग-अलग है। रिपोर्ट के अनुसार बांग्लादेश में यह दर लगभग 91 प्रतिशत, इंडोनेशिया में 78 प्रतिशत, भारत में 74 प्रतिशत, जापान में 52 प्रतिशत और फिलीपींस में करीब 41 प्रतिशत दर्ज की गई है। वहीं लाओस में यह आंकड़ा सबसे अधिक 214 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

इसके विपरीत चीन में स्तन कैंसर से होने वाली मौतों में लगभग 37 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है, जो बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और समय पर जांच की वजह से संभव हो पाया है।

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