प्रेरणा

अद्भुत है आचार्य शंकर की गंगोत्तरी धाम यात्रा

Motivation: बदरीनाथ धाम व केदारनाथ की यात्रा पूरी कर आचार्य शंकर अपने शिष्यों के साथ वैदिक धर्म की ध्वजा लहराते-फहराते हुए, वैदिक धर्म का प्रचार-प्रसार करते हुए गंगोत्तरी धाम की ओर चल पड़े। गंगोत्तरी धाम जाने का मार्ग बड़ा ही दुर्गम था। कहीं ऊँचे-ऊँचे पर्वतों की कठिन चढ़ाई थी तो कहीं हिंसक जीवों से भरे भयानक वन-क्षेत्र भी थे, पर आचार्य शंकर उन सभी विघ्न-बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़े जा रहे थे। केदारगंगा और भागीरथी के मिलन की अद्भुत छवि को देखते हुए वे सभी आगे बढ़े जा रहे थे। भयानक वन-क्षेत्र से गुजरते हुए हिंसक जीवों के भयानक शब्द सुनाई दे रहे थे। उधर शीतलहर शरीर को सुन्न किए दे रही थी, पर आचार्य शंकर अपने शिष्यों को शिक्षाप्रद कहानियाँ सुनाते हुए, धर्मोपदेश देते हुए, साहस बँधाते हुए आगे ही बढ़ते जा रहे थे। आचार्य शंकर के अदम्य साहस और उत्साह को देखकर ज्योतिर्धाम नरेश और उनके कर्मचारी हतप्रभ और अचंभित से हो जाते। एक ओर भयानक घाटियाँ, दूसरी ओर ऊँचे-ऊँचे पर्वत तो कहीं बरफ से ढकी पाषाण शिलाएँ थीं।

बरफ से ढकी पाषाण शिला पर पाँव रखते ही आगे बढ़ने के बजाय, कभी-कभी पाँव फिसलकर प्राणों को ही संकट में डाल देते, पर सभी कठिनाइयों को पार करते हुए आचार्य शंकर मुस्कराते हुए आगे चल रहे थे। यदि कोई संकट आए तो सबसे पहले वे उसे सहें- शंकराचार्य के हृदय में यह भावना भरी हुई थी। उधर गुरुभक्त पद्मपाद अपने गुरु की जीवन- रक्षा के लिए अपनी जान की परवाह किए बगैर अपने गुरु के साथ छाया की तरह साथ-साथ चल रहे थे और कई संकट भरे स्थानों पर अपने प्राणों को संकट में डालकर पद्मपाद ने अपने गुरु की रक्षा की थी। सचमुच ऐसा गुरुप्रेमी, गुरुभक्त कोई विरला ही होता है। रहे ज्योतिर्धाम नरेश पद्मपाद के साथ चल गुरुप्रेम को देखकर अभिभूत थे और यह समझ चुके थे कि पद्मपाद अपना सर्वस्व अपने गुरु को समर्पण कर चुका है और इसी कारण पद्मपाद पर आचार्य शंकर की विशेष कृपा है और सच भी तो यही है कि बिना समर्पण किए, बिना त्याग किए, कोई भी साधक साधना-पथ पर कहाँ खरा उतरा है, पर पद्मपाद गुरु के प्रति अपने सर्वस्व समर्पण के कारण गुरु के कृपापात्र बन चुके थे। पद्मपाद को कष्टों की कसौटी पर जितना कसा गया, वह उतने ही खरे निकलते गए। उधर चलते-चलते अब सूर्यास्त होने को था। विश्राम की कहाँ व्यवस्था हो, इस पर सभी लोग विचार कर रहे थे। तभी उधर पद्मपाद गुफाओं में और टूटे देवालय खंडहरों में ठहरने का प्रबंध कर वापस आ रहे थे। शंकराचार्य पद्मपाद के बताए हुए विश्रामस्थल पर अपने शिष्यों सहित चल पड़े।

रात्रि विश्राम कर सभी प्रातःकाल जागकर अपनी दिनचर्या पूरी कर आगे के लिए चल पड़े। इस प्रकार सूर्यास्त होते ही सभी गुफाओं में या प्राचीन मंदिरों के खंडहरों में रात्रि विश्राम करते और प्रातःकाल तैयार होकर आगे की ओर चल पड़ते। इस प्रकार यात्रा करते हुए, विश्राम करते हुए. * कई दिन लगातार चलने के पश्चात सभी तीर्थयात्री * भागीरथी के उद्‌गमस्थल की ओर बढ़े चले जा *रहे थे। अंततः वे सभी गंगोत्तरी में सूर्यकुंड, विष्णुकुंड, ब्रह्मकुंड आदि तीर्थों के दर्शन करते हुए विशाल भागीरथ शिला के पास पहुँचे। यह वह शिला है, जिस पर बैठकर भगीरथ ने गंगा जी को मृत्युलोक में लाने के लिए घोर तपस्या की थी। भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर ही गंगा जी इस धरा पर अवतरित हुई थीं। इसलिए गंगा पहले भागीरथी कहलाई । चलते-चलते अब  भागीरथी नदी दिखाई देने लगी थी। युगों-युगों से अपने अमृत जल से इस धरा को धन्य करती हुई भागीरथी लगातार आगे बढ़ती जा रही थीं। गंगा अब भी कितने गाँव, नगर, महानगरों को पवित्र करती हुई, वन-उपवन में हरियाली व सौंदर्य भरती हुई आगे-ही-आगे बढ़ती चली जा रही हैं, यह देखकर सभी तीर्थयात्री आह्लादित थे, आनंदित थे। भागीरथी गंगादेवी लहराती, बलखाती, पर्वतस्थल से आगे की ओर बढ़ी जा रही है, यह देखकर सभी तीर्थयात्री गद्गद थे।

तभी पद्मपाद ने अंजलि में गंगाजल लेकर अपने गुरु के चरण धोए। शंकराचार्य ने हाथ-मुँह धोकर जलपान किया और प्रसन्न होकर तट पर बैठकर गंगा की स्तुति करने लगे। माँ गंगा की स्तुति करते हुए आचार्य शंकर ध्यानस्थ हो गए और उनके हृदय से यह हृदयोद्‌गार निकल पड़े कि ‘हे सुखदायिनी, माता भागीरथी  वेदों में आपके पवित्र सलिल (जल) की महिमा का वर्णन है। मैं आपकी अनंत महिमा नहीं जानता हे कृपामयी ! मैं अज्ञानी हूँ, मेरी रक्षा कीजिए। हे माता! आपके अमल सलिल का जिसने पान किया है. वह अवश्य ही परमपद को प्राप्त होगा। जो आपका भक्त है, उसे देखने तक का अधिकार यम को नहीं है। हे भगवती! मेरे रोग-शोक, पाप-पुण्य, कुमति-कलाप हरण कीजिए। हे त्रिभुवन श्रेष्ठ, आप ही एकमात्र मेरी गति हैं। हे भुवनेश्वरी, त्रिभुवन पावनी, सर्वजन प्रशसिते देवि ! जलमयि ! जो मनुष्य प्रतिदिन इस पवित्र गंगा स्तोत्र का पाठ करता है उसे अवश्य ही सर्वत्र जय लाभ होता है।’ इस प्रकार ध्यानमग्न आचार्य शंकर भागीरथी की स्तुति कर रहे थे और उनके श्रद्धालु शिष्य व  भक्त उनकी ओर देख रहे थे और मन-ही-मन सोच रहे थे कि गुरुदेव की गंगाभक्ति कितनी मर्मस्पर्शी है ? ब्रह्मज्ञ गुरुदेव ने गंगा के माहात्म्य का कितना अद्भुत गायन किया है। इस प्रकार भागीरथी गंगा की स्तुति-वंदना करके आचार्य शंकर आगे की ओर चल पड़े। लगातार बरफ गिरने से रास्ता दुर्गम हो चला था। चारों ओर हिमशिखर दिखाई पड़ रहे थे। शीत के कारण सबके हाथ-पाँव सुन्न हुए जा रहे थे, पर शंकराचार्य जी साहसपूर्वक आगे ही बढ़ते चले जा रहे थे। वे अब गंगोत्तरी की यात्रा पूरी कर गोमुख की ओर बढ़ चले थे।          

अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि ।   

  इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ।।                                               

 अष्टावक्र गीता अर्थात मैं निश्चय ही सब भूतों में हूँ, सब भूत मुझमें हैं। इस कारण से मैं इनमें लय नहीं हूँ और न ही इसे त्यागा जाना है और न ही कुछ ग्रहण किया जाना है। यही ज्ञान है।

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