छत्तीसगढ़ में कैप्टन एण्डमण्ड का प्रशासन (1818 ई.) जाने विस्तार से

छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश संरक्षण को व्यवहारिक रूप सन् 1818 ई. में दिया गया। नागपुर स्थित अंग्रेज रेजीडेन्ट जेनकिंस ने सर्वप्रथम कैप्टन एडमण्ड को छत्तीसगढ़ का प्रशासकीय अधीक्षक नियुक्त किया। उसके प्रशासन काल में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हो पाए। प्रशासन के क्षेत्र भू-राजस्व, न्याय, पुलिस इत्यादि अप्रभावित रहे। इसका कारण यह था कि एडमण्ड का कार्यकाल अल्पकालीन था। उसके शासनकाल की एक प्रमुख घटना डोंगरगढ़ के जमींदार द्वारा अंग्रेजी प्रशासन के विरूद्ध विद्रोह करना था। उसे विद्रोह की प्रेरणा अप्पासाहब भोंसले से मिली थी। डोंगरगढ़ के जमींदार द्वारा किए गए विद्रोह पर ब्रिटिश अधीक्षक एडमण्ड ने कुटनीतिक चाल से खैरागढ़ के जमींदार से सहयोग के बदले डोंगरगढ़ की जमींदारी प्रदान की गई। इस घटना के प्रश्चात ही उसकी मृत्यु हो गई।
एगन्यु का प्रशासन (1825 ई.) – मिस्टर कैप्टन एडमण्ड के असामयिक निधन के पश्चात मिस्टर एगन्यु को छत्तीसगढ़ का अधीक्षक नियुक्त किया गया। संरक्षण काल में छत्तीसगढ़ के प्रशासन के लिए नियुक्त समस्त ब्रिटिश अधीक्षकों में एगन्यु योग्य, अनुभवी एवं कुशलता से विभूषित गुणों वाला व्यक्ति था। तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड हेस्टिंग्ज उससे बहुत अधिक प्रभावित थे। तथा उसे एक योग्य प्रशासक मानते थे। मि. एगन्यु के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ में अनेक महत्वपूर्ण कार्य हुए। उसके प्रशासन काल के कार्यों और घटनाओं को अधोलिखित शीर्षकों में उल्लेखित किया गया है।
रायपुर राजधानी का हस्तान्तरण = मि. एगन्यु का महत्वपूर्ण कार्य राजधानी परिवर्तन करना था। सर्वप्रथम छत्तीसगढ़ का प्रशासन अपने हाथों में लेते हुए इस दिशा में प्रयत्न आरंभ कर दिया। दीर्घकाल तक रतनपुर छत्तीसगढ़ की राजधानी रही। कलचुरि सत्ता की समाप्ति के बाद दिनों-दिन इसका गौरव समाप्त होने लगा था। मि. एगन्यु सुविधाओं से युक्त एवं छत्तीसगढ़ के केन्द्र स्थल को नवीन राजधानी बनाना चाहता था। उसने सन् 1818 ई. में छत्तीसगढ़ के केन्द्र स्थित रायपुर को ब्रिटिश अधीक्षक का मुख्यालय एवं छत्तीसगढ़ की राजधानी बना दिया। इस प्रकार राजधानी रतनपुर से रायपुर हस्तान्तरित हो गई।
मराठाकालीन परगनों की पुनर्रचना = मि. एगन्यु का दूसरा उल्लेखनीय कार्य मराठा कालीन परगनों का पुनर्गठन करना था। मराठाकाल में छत्तीसगढ़ में कुल 27 परगने थे, जिन्हें पुनर्गठित कर केवल 8 परगनें बनाए। उसके द्वारा गठित इन परगनों का क्षेत्र 288 कि.मी. लम्बा और 192 कि.मी. चौड़ा था। इन पुनर्गठित परगनों में रायपुर, रतनपुर, राजहरा, धमतरी, दुर्ग धमधा, नवागढ़ और खरौद था। प्रारंभ में केवल आठ परगने बनाए गए थे। कुछ समय पश्चात बालौद को भी इसमें सम्मिलित कर लिया गया जिससे संख्या 9 हो गई। प्रत्येक परगने में कमाविसदार परगना अधिकारी नियुक्त किया गया था।
भू-राजस्व में सुधार कार्य = मि.एगन्यु ने भू- राजस्व व्यवस्था में विद्यमान दोषों को दूर करने का प्रयास किया। उसका उद्देश्य राजस्व व्यवस्था को न्यायोचित एवं मित्तव्ययी बनाना था। उसने भू-राजस्व व्यवस्था में सुधार करने के लिए अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिए जिससे छत्तीसगढ़ का राजस्व सन् 1818 ई. में 3,31,470 से बढ़कर सन् 1825 ई. में4,03,224 रूपए हो गया।
1. समस्त छत्तीसगढ़ भू-भाग को परगनों में बांटा गया। प्रत्येक परगना में कमाविसदार अधिकारी की नियुक्ति की गई जो परगना का सर्वोच्च अधिकारी था। कमाविसदार को अच्छा वेतन दिया गया ताकि वह ईमानदारी से राजस्व संबंधी कार्य करे। उसके अतिरिक्त आय पर नियंत्रण लगा दिया गया। प्रत्येक परगने में अमीन तथा 20-30 गांव के लिए पण्डया नामक राजस्व अधिकारी की नियुक्ति की गई। मराठा काल में राजस्व प्रशासन में पटेल का महत्वपूर्ण स्थान था, मि. एगन्यु ने पटेल का पद समाप्त कर दिया। मराठा कालीन गौटिया का पद रखा गया।राजस्व अदायगी का सरलीकरण किया गया। भू-राजस्व लगान तीन किश्तों में दिया जा सकता था। प्रथम किश्त का आधा भाग 25 नवम्बर तक, दूसरी किश्त एक चौथाई 5 फरवरी तक तथा तीसरी किश्त एक चौथाई भाग पटाने का नियम निर्धारित कर दिया गया। भू-राजस्व कर का निर्धारण जमीन की स्थिति के अनुसार किया गया, इसमें जमीन का क्षेत्र, उसकी प्रगति और किसानों के साधनों को आधार बनाया गया। मि. एगन्यु ने गांव के गाँटिया को लगान वसूल करने तथा जमा कराने के लिए अधिकृत किया। इस कार्य के निर्वहन के लिए गाँटिया को कुछ करमुक्त भूमि प्रदान की गई। इस भूमि से प्राप्त आय को गौंटिया दान देने, अधिकारियों व यात्रियों पर व्यय करता था। इस प्रकार मि. एगन्यु ने भू-राजस्व व्यवस्था को चुस्त-दुरूरत कर नियमित व गतिशील बनाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
ब्रिटिशकालीन आर्थिक सुधार कार्य = ब्रिटिश अधीक्षक मि. एगन्यु ने आर्थिक क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण सुधारात्मक कार्य किए। उसने मुद्रा विनिमय के क्षेत्र में व्याप्त विषमताओं को समाप्त कर उसमें एकरूपता लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। इसी प्रकार उसने आर्थिक क्षेत्र में वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि को प्रोत्साहन प्रदान किया। उसके इस कदम से छत्तीसगढ़ के किसान प्रोत्साहित हुए उन्होंने वस्तुओं के उत्पादन में रूचि प्रदर्शित की जिससे अधिकाधिक उत्पादन हुआ तथा किसान आर्थिक दृष्टि से मजबूत होने लगे।
सोनाखान में रामाराय का विद्रोह = मि. एगन्यु के प्रशासन काल में सोनाखान जमींदारी के जमीदार रामाराय ने सन् 1819 ई. में विद्रोह का बिगुल बजाया था। सन् 1818 ई. में तृतीय मराठा युद्ध के समापन के साथ ही सोनाखान जमींदारी ब्रिटिश नियंत्रण में आ गई थी। रामाराय विदेशी आधिपत्य के नियंत्रण से बौखला गया। उसने कुद्ध होकर खालसा के 300 गांवों पर कब्जा कर लिया। मि. जेनकिन्स ने कम्पनी के अधिकारियों को यह पत्र लिखा था। सोनाखान का जमींदार परिवार विदेशी प्रभुता को पसन्द नहीं करता है। रामाराय के पिता और स्वयं रामाराय छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश शासन के लिए आतंक बने रहे। मि. एगन्यु एवं जेनकिन्स की सूचना रिपोर्ट प्राप्त होने पर कम्पनी प्रशासन ने कैप्टन मैकसन को सैन्य टुकड़ी देकर विद्रोह दमन के लिए भेजा। सोनाखान के समीय ब्रिटिश फौज ने रामाराय की सेना को परास्त कर दिया। कैप्टन मैक्सन ने आगे बढ़कर सोनाखान जमींदारी पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया, किन्तु एक महत्वपूर्ण संधि के बाद रामराय को पुनः सोनाखान की जमींदारी सौंप दी गई। रामाराय ने संधि की शर्तों का पालन किया जीवन पर्यन्त नागपुर सरकार के खिलाफ किसी विद्रोह में भाग नहीं लिया। सन् 1821 ई. में रामाराय की मृत्यु हो गई।
परलकोट में गेंद सिंह का विद्रोह (1824 ई. ) = बस्तर राज्य के उत्तर पश्चिम में परलकोट जमींदारी स्थित थी। मि. एगन्यु के कार्यकाल में इस जमींदारी का जमींदार गेंदसिंह था। परलकोट जमींदारी के अधिकतर निवासी अबूझमाड़िया आदिवासी थे। इन आदिवासियों को अंग्रेज व मराठों का प्रशासन रास नहीं आया। वे मराठों और अंग्रेजों की शोषण नीति से तंग आ चुके थे। इन अबूमाडियों ने सन् 1824 ई. में विद्रोह कर दिया। इन विद्रोहियों का नेतृत्व परलकोट के जमींदार गेंदसिंह ने किया। मि. एगन्यु ने विद्रोह को कुचलने के लिए चान्दा से सैन्य टुकड़ी बुलवाया। मराठों और अंग्रेजों की संयुक्त सेना ने विद्रोहियों का दमन करना प्रांरभकर दिया। दोनों की संयुक्त सेना ने परलकोट जमींदारी को घेर लिया। गेंदसिंह गिरफ्तार कर लिया गया। उसे 20 जनवरी 1825 को परलकोट में फांसी दे दी गई।मि. एगन्यु ने परलकोट विद्रोह के दमन में सफलता प्राप्त की। इस विद्रोह दमन केबाद मि. एगन्यु ने त्यागपत्र दिया।
कैप्टन हंटर का प्रशासन (1825 ई.)= मि. एगन्यु के त्यागपत्र देने के पश्चात कैप्टन हंटर छत्तीसगढ़ का अधीक्षक नियुक्त किया गया। वे इस पद पर अधिक समय तक नहीं रह पाए। उसके कार्यकाल के कार्यों व घटनाओं की विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं होती है।
सैडिस का प्रशासन (1825-1828 ई.)= मि. हंटर के पश्चात नागपुर के सैन्य अधिकारी सैडिस अधीक्षक नियुक्त किया गया। वे इस पद पर सन् 1825 से 1828 ई. तक कार्यरत रहे। उसके कार्यकाल के कार्यों व उपलब्धियों को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है।(1)मि. सैडिस ने छत्तीसगढ़ भू-भाग पर अंग्रेजी वर्ष को मान्यता प्रदान की। अंग्रेजी वर्ष ने हिन्दू और मुस्लिम प्रचलित वर्ष का स्थान ले लिया।(2) मि. सैडिस ने अंग्रेजी भाषा को सरकारी काम-काज का माध्यम बनाया इससे पूर्व इस क्षेत्र में सरकारी काम-काज स्थानीय भाषा में किया जाता था।(3) सैडिस ने छत्तीसगढ़ क्षेत्र में संचार के साधनों- यथा डाक एवं तार, को प्रारंभ किया तथा उसका विकास किया।(4) मि. सैडिस के शासनकाल में 13 दिसम्बर 1826 को अंग्रेजों और रघुजी तृतीय के मध्य समझौता हुआ। इस समझौते के अनुसार नागपुर जिले का शासन प्रयोग के रूप में रघुजी तृतीय को सौंप दिया गया। नागपुर के अधीनस्थ भागों के शासन में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। छत्तीसगढ़ क्षेत्र में ब्रिटिश संरक्षण पूर्ववत बना रहा।(5) बस्तर और कांकेर राज्य के बीच सुलह करने का महत्वपूर्ण कार्य मि. सैडिस द्वारा किया गया। इन दोनों राज्यों के बीच आए दिन लूट मार-पीट और लोगों को, बन्दी बनाए जाने की घटनाएं होती रहती थीं। मि. सैडिस ने दोनों राज्यों की शिकायतें प्राप्त कर उसके रेजीडेन्ट के माध्यम से गवर्नर जनरल के पास भेज दिया। कुछ समय पश्चात इस संबंध में गवर्नर जनरल का यह निर्देश प्राप्त हुआ कि दोनों एक दूसरे पर आक्रामण न करें अन्यथा दोनों के अधिकार व पद समाप्त कर दिए जाएंगे।
बिल किंसन का प्रशासन (1828 ई.)= मि. सैडिस के प्रस्थान के बाद बिल किंसन अधीक्षक बनाया गया। उसने लगभग एक वर्ष ही इस पद पर कार्य किया। उसका कार्यकाल कोई उल्लेखनीय नहीं रहा है।
क्राफर्ड का प्रशासन (1828 से 1829 ई.)= सन् 1828 में क्राफर्ड को छत्तीसगढ़ का ब्रिटिश अधीक्षक नियुक्त किया गया। इसके प्रशासन काल में 27 दिसम्बर 1829 को अंग्रेजों और भोंसले शासक रघुजी के मध्य एक नया समझौता हुआ। इस समझौता के अनुसार नागपुर व उसके अधीनस्थ भू-भागोंका प्रशासन रघुजी तृतीय को सौंप दिया गया।
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