प्रेरणा

तिथियों का ज्योतिषीय महत्त्व

 Motivation| प्रेरणा:  ज्योतिष शास्त्र में तिथियों का बहुत महत्त्व  है। तिथियों के आधार पर मुहूर्त निकाले जाते हैं और उनके अनुसार विभिन्न कार्य किए जाते हैं। प्रतिपदा तिथि-प्रतिपदा तिथि में गृह निर्माण, गृहप्रवेश, वास्तुकर्म, विवाह, यात्रा, प्रतिष्ठा, मांगलिक कार्य आदि सभी मंगल कार्य किए जाते हैं। कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा में चंद्रमा को बली माना गया है और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में चंद्रमा को निर्बल माना गया है। इसलिए शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में विवाह, यात्रा, व्रत, प्रतिष्ठा, सीमांत, चूड़ाकर्म, वास्तुकर्म तथा गृहप्रवेश आदि कार्य नहीं करने चाहिए। 

द्वितीया तिथि – इस तिथि में विवाह मुहूर्त, यात्रा करना, आभूषण खरीदना, शिलान्यास, देश अथवा राज्य संबंधी कार्य, वास्तुकर्म, उपनयन आदि  कार्य करना शुभ माना जाता है, परंतु इस तिथि में तेल लगाना वर्जित है।  तृतीया तिथि – तृतीया तिथि में शिल्पकला अथवा शिल्प संबंधी अन्य कार्यों को, सीमन्तोनयन, चूड़ाकर्म, अन्नप्राशन, गृहप्रवेश, विवाह, राज-संबंधी  कार्य, उपनयन आदि शुभकार्यों को संपन्न किया जा सकता है।  चतुर्थी तिथि- सभी प्रकार के बिजली के – कार्य, शत्रुओं को हटाने के कार्य, अग्नि संबंधी – कार्य, शास्त्रों का प्रयोग करना आदि कार्यों के लिए – यह तिथि अच्छी मानी गई है। 

पंचमी तिथि- सभी प्रवृत्तियों के लिए यह – तिथि उपयुक्त मानी गई है। इस तिथि में किसी को – ऋण देना वर्जित माना गया है।षष्ठी तिथि – युद्ध में उपयोग में लाए जाने वाले शिल्पकार्यों का आरंभ, वास्तु कर्म, गृहारंभ, नवीन वस्त्र पहनने जैसे शुभ कार्य इस तिथि में किए जा सकते हैं। इस तिथि में तैलाभ्यंग, अभ्यंग, पितृकर्म, आवागमन, काष्ठकर्म आदि कार्य वर्जित हैं।  सप्तमी तिथि – इस तिथि में विवाह मुहूर्त, संगीत संबंधी कार्य, आभूषणों का निर्माण और नवीन आभूषणों को धारण किया जा सकता है। यात्रा, वधू-प्रवेश, गृह प्रवेश, राज्य संबंधी कार्य, वास्तुकर्म, चूड़ाकर्म, अन्नप्राशन, उपनयन संस्कार आदि सभी शुभ कार्य भी इस तिथि में किए जा सकते हैं। 

अष्टमी तिथि – लेखन कार्य, युद्ध में उपयोग में आने वाले कार्य, वास्तुकार्य, शिल्प संबंधी कार्य, रत्नों से संबंधित कार्य, आमोद-प्रमोद से जुड़े कार्य, अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले कार्यों का आरंभ इस तिथि में किया जा सकता है।  नवमी तिथि – नवमी तिथि में शिकार करने का आरंभ करना, जुआ खेलना, शस्त्र निर्माण करना, निर्माण कार्य तथा सभी प्रकार के क्रूर कर्म किए जा सकते हैं।  दशमी तिथि- दशमी तिथि में राजकार्य अर्थात वर्तमान समय में सरकार से संबंधी कार्यों का कार्य आरंभ किया जा सकता है। हाथी-घोड़ों से संबंधित कार्य, विवाह, संगीत, वस्त्र, आभूषण, यात्रा आदि इस तिथि में किए जा सकते हैं। गृह- प्रवेश, वधु-प्रवेश, शिल्प, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन संस्कार आदि कार्य इस तिथि में किए जा सकते हैं। एकादशी तिथि – एकादशी तिथि में व्रत,  सभी प्रकार के धार्मिक कार्य, देवताओं का उत्सव, – सभी प्रकार के उद्यापन, वास्तु कर्म, युद्ध से जुड़े – कर्म, शिल्प, यज्ञोपवीत, गृह निर्माण का आरंभ – और यात्रासंबंधी कार्य किए जा सकते हैं।

 द्वादशी तिथि – इस तिथि में विवाह तथा – अन्य शुभकर्म किए जा सकते हैं। इस तिथि में – तैलमर्दन, नए घर का निर्माण करना तथा नए घर – में प्रवेश तथा यात्रा इत्यादि का त्याग करना चाहिए।  त्रयोदशी तिथि- संग्राम से जुड़े कार्य, सेना के उपयोगी अस्त्र-शस्त्र, ध्वज-पताका के निर्माण संबंधी कार्य, राज-संबंधी कार्य, वास्तु कार्य, संगीत विद्या से जुड़े कार्य इस दिन किए जा सकते हैं। इस दिन यात्रा, गृह-प्रवेश, नवीन वस्त्राभूषण तथा यज्ञोपवीत धारण जैसे शुभ कार्यों का त्याग करना चाहिए।  चतुर्दशी – चतुर्दशी तिथि में सभी प्रकार के क्रूर तथा उग्र कर्म किए जा सकते हैं। इस तिथि में यात्रा करना वर्जित है। चतुर्थी तिथि में किए जाने वाले कार्य भी इस तिथि में किए जा सकते हैं।  पूर्णमासी – पूर्णमासी (पूर्णिमा) तिथि में शिल्प, आभूषणों से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं। संग्राम, विवाह, यज्ञ, जलाशययात्रा, शांति तथा पोषण करने वाले सभी मंगलकार्य भी किए जा सकते हैं। 

अमावस्या – इस तिथि में पितृ कर्म मुख्य रूप से किए जाते हैं। महादान तथा उग्र कर्म किए जा सकते हैं। इस तिथि में शुभ कर्म तथा स्त्री का संग नहीं करना चाहिए। इस प्रकार ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तिथियों का विशेष महत्त्व है। यदि इनका समुचित उपयोग किया जा सके तो जीवन की अनगिनत समस्याओं का समाधान किया जा सकता है और जीवन में शांति पाई जा सकती है।

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गुजरात के प्रसिद्ध संत नरसी मेहता जब आठ वर्ष की उम्र तक बोलना नहीं शुरू कर पाए तो उनके परिवार के लोगों को चिंता होने लगी। बच्चे को अनेक वैद्यों को दिखाया गया, लेकिन कोई तरीका प्रभावी न रहा। उनकी दादी उनको नियमित मंदिर ले जातीं और वहाँ उनके बोलने हेतु मनौती मनातीं। एक दिन मंदिर जाने के मार्ग में उन्हें एक संत दिखाई पड़े, जो बालक नरसी मेहता को देखते ही उनके चरणों में गिर पड़े और बोले- “माँ! यह बालक दिव्य आत्मा है। यह आगे चलकर प्रसिद्ध संत बनेगा और अनेकों को अपने भजनों से प्रेरणा देगा।” नरसी की दादी आश्चर्य से बोलीं- “पर महाराज! यह तो अभी बोल भी नहीं पाता।” संत बोले- “क्या कभी आपने इससे भगवान का नाम लेने को बोला है ?” ऐसा कहते हुए उन्होंने बालक नरसी से कहा – “बेटा! श्रीकृष्ण बोल।” भगवान का नाम लेते ही नरसी मेहता बोलने लगे। महान आत्माएँ प्रभुस्मरण से ही उद्दीप्त होती हैं।

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