प्रेरणा

संभावनाएँ जगाएँ, सृष्टि सुंदर बनाएँ

MOTIVATION| प्रेरणा : भगवान ने मनुष्य की योनि, जिसमें मनुष्य का शरीर ही नहीं, वरन मन, बुद्धि, भावनाएँ ये सभी सम्मिलित हैं- इनको एक विशेष उत्साह और अभिप्राय के साथ बनाया है। जितना परिश्रम, जितनी योजना विधाता ने इनसान को गढ़ने में लगाए हैं- ऐसा प्रतीत होता है कि उतना परिश्रम भगवान ने अन्य किसी के साथ नहीं किया। शरीर, मन, बुद्धि से लेकर अंतःकरण के स्थान में भगवान ने निश्चित रूप से इनसान को एक विशेषता, मौलिकता और गुण देकर के भेजा है। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि यदि स्रष्टा को अपनी सृष्टि चलाने में किसी प्राणी के सहयोग की आवश्यकता आन पड़े तो उसे मनुष्य के अतिरिक्त और कोई प्राणी सम्यक रीति से कर पाने में सक्षम नहीं है। उन्होंने इनसान के भीतर वो सारी शक्तियाँ और विभूतियाँ सजाकर के रख दी हैं, जो स्वयं परमेश्वर के भीतर थीं और इसीलिए इनसान को भगवान का अंश कहकर पुकारा जाता है। 

               इनसान के भीतर वो ही विभूतियाँ हैं, वो ही शक्तियाँ हैं जो भगवान के भीतर हैं या हो सकती हैं। एक जैसी शक्तियाँ, एक जैसी विशेषताएँ, दोनों के ही भीतर देखने को मिल जाती हैं। शक्तियों की दृष्टि से देखें तो हम अन्य प्राणियों की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली हैं, ज्यादा सामर्थ्यवान हैं। संभव है कि शारीरिक बल की दृष्टि से हम हाथी, शेर, गैंडे इत्यादि से कमतर सिद्ध हों, परंतु तब भी क्या यह सत्य वहीं कि ये ही इनसान हाथी पर महावत बनकर, शेर पर रिंग मास्टर बनकर सवारी करता नजर आता है। ऐसा इसलिए कि बौद्धिक दृष्टि से, आत्मिक दृष्टि से जो शक्ति इनसान के पास है, वो दूसरों को नसीब नहीं है।

              इसीलिए जहाँ हम शारीरिक दृष्टि से कम पड़ते हैं तो वहाँ-वहाँ उन दिक्कतों से पार पाने के लिए हमने दूसरे मार्ग खोज लिए हैं। जैसे हम एक चीते से तेज नहीं दौड़ सकते हैं, पर हमारी बनाई कार दौड़ सकती है। हम हाथी से ज्यादा वजन नहीं उठा सकते, पर हमारी बनाई क्रेन तो उठा सकती है। हम मछली की तरह डुबकी नहीं लगा सकते, पर हमारी बनाई पनडुब्बी लगा सकती है। हम चिड़िया की तरह उड़ नहीं सकते, पर हमारा बनाया हवाई जहाज उड़ सकता है। कहने का अर्थ मात्र इतना है कि ईश्वर ने इनसान को ऐसी बौद्धिक क्षमता देकर भेजा है कि जिन-जिन क्षेत्रों में हम दूसरे प्राणियों से पिछड़ते दिखे, उन-उन क्षेत्रों में हमने शक्ति के या तो दूसरे स्रोत ढूँढ़ लिए या अन्य माध्यम ढूँढ़ लिए। इसके अतिरिक्त शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक ही नहीं; इनसान के पास आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग भी खुले हैं। 

         अनेक महामानवों का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि यदि मनुष्य अपने भीतर की दिव्य संभावना को जाग्रत करना जान जाता है तो वो ऋषि, मुनि, सिद्ध, संत, महात्मा बनता दिखाई पड़ता है और उन संभावनाओं को साकार करता दिखाई पड़ता है, जो इनसानी गुणों की अंतिम पराकाष्ठा है। इतनी सारी महान संभावनाओं के होते हुए भी कई बार आश्चर्य होता है, जब मनुष्य को अत्यंत तुच्छ, निकृष्ट जीवन जीते देखा जाता है। कई लोग शारीरिक समस्याओं के कारण जीवन में रुके-ठहरे नजर आते हैं तो कई लोग मानसिक उलझनों के शिकार हो जाते हैं। कुछ सामाजिक – समस्याओं से परेशान हैं तो कइयों को भावनात्मक – आघात निराश करते नजर आते हैं। यदि ऐसी • परेशानियाँ हममें से किसी की प्रगति को बाधा – पहुँचाती दिखें तो हमें महापुरुषों के जीवन की ओर दृष्टि उठा के देखने की जरूरत है। 

                जो शारीरिक बीमारियों से कभी परेशान हों – तो वो राणा सांगा के जीवनवृत्त को देखें, हरिसिंह – नलवा की जिंदगी देखें, अष्टावक्र की जिंदगी देखें और यदि कभी मानसिक दिक्कतें हमें रोकने की कोशिश करें तो हम देखें कि क्या ध्रुव, हरिश्चंद्र, गुरुगोविंद सिंह को भावनात्मक प्रतिघातों को सहन नहीं करना पड़ा था ? जो सामाजिक विडंबना की राह पर चल पड़े हैं वे ये सोचें कि हमारी समस्याएँ कितनी भी बड़ी हों, पर सुदामा से ज्यादा, राणा प्रताप से ज्यादा, पूज्य गुरुदेव से ज्यादा नहीं हैं। सत्य यही है कि हममें से अनेकों के जीवन में कठिनाइयाँ इतनी ज्यादा या बड़ी नहीं होतीं, पर हमें उनको बड़ा करके आँकने की आदत पड़ जाती है। हम सोचें कि हमारे पास जो संभावनाएँ हैं, जो ताकतें हैं, उनका अंत नहीं है, पर हम अपने कर्त्तव्य को और भगवान को दिए अपने वचन को विस्मृत करके बैठ गए हैं। 

             कर्त्तव्य यह है हमारा कि हम भगवान की बनाई इस सृष्टि के निगरानीकर्ता हैं, इसको सुव्यवस्थित, सुंदर बनाए रखना कर्त्तव्य है हमारा। यह स्मरण रखते हुए भी तृष्णाएँ-कामनाएँ मनुष्य की गति को रोककर के बैठ जाती हैं। आज के इस चुनौतीपूर्ण समय में हमें, स्वयं के भीतर निहित उसी संभावना को स्मरण करने की और उसी को जाग्रत करने की आवश्यकता है। वो दिव्य संभावनाएँ जाग्रत होती हैं तो मनुष्य महानता के शिखर तक चढ़ता चला जाता है और उसकी गति को रोकने वाला कोई नहीं होता। 

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राजा शत्रुदमन का पुत्र अरिदमन अत्यंत अहंकारी था। उसमें करुणा, उदारता, सेवा, दया, सहानुभूति जैसे गुणों का सर्वथा अभाव था। राजा भी उसके स्वभाव से परिचित थे। अतः उन्होंने उसे एक सिद्ध महात्मा के पास स्वभाव-परिवर्तन के उद्देश्य से भेज दिया। एक दिन महात्मा ने अरिदमन से एक वृक्ष की पत्तियाँ तोड़कर लाने को साथ ही यह भी आदेश दिया कि यदि पत्तियाँ कड़ई हों तो उन्हें न लाए। कहा। काफी समय लगाकर अरिदमन वापस लौटा और महात्मा जी से बोला – “महाराज! वे सभी पत्तियाँ कडुई थीं, पूजा योग्य नहीं थीं, इसलिए मैं उन्हें नहीं लाया।” महात्मा बोले -“पुत्र ! इसी प्रकार जीवन से भी सभी कड़ई चीजें फेंक देने योग्य होती हैं। तुम भी अपने अंदर से दोष-दुर्गुणों रूपी कड़आहट को फेंक दो और सबके प्रति मधुर बनो। मधुर व्यक्ति ही सम्मान का पात्र होता है।” उस दिन से अरिदमन का कायाकल्प हो गया।

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