गुण-ग्राहक दृष्टि को जाग्रत कीजिए

Motivation| प्रेरणा: गुण-ग्राहक दृष्टि को जाग्रत कीजिए : जिसके दोष देखने को हम बैठते हैं उसके दोष-ही-दोष दिखाई पड़ते हैं। ऐसा मालूम पड़ता है कि इस प्राणी या पदार्थ में दोष-ही-दोष भरे हुए हैं, बुराइयाँ-ही-बुराइयाँ उसमें संचित हैं। पर जब गुण-ग्राहक दृष्टि से निरीक्षण करने लगते हैं तो हर प्राणी में, हर पदार्थ में कितनी ही अच्छाइयाँ, उत्तमताएँ, विशेषताएँ दीख पड़ती हैं।
वस्तुतः संसार का हर प्राणी एवं पदार्थ तीन गुणों से बना हुआ है। उसमें जहाँ कई बुराई होती हैं वहाँ कई अच्छाइयाँ भी होती हैं। अब यह हमारे हाथ में है कि उसके उत्तम तत्त्वों से लाभ उठाएँ या दोषों को स्पर्श कर दुःखी बनें। हमारे शरीर में कुछ अंग बड़े मनोहर होते हैं, पर कुछ ऐसे कुरूप और दुर्गंधित हैं कि उन्हें ढके रहना ही उचित समझा जाता है। इस गुण-दोषमय संसार में से हम उपयोगी तत्त्वों को ढूँढ़ें,
उन्हें प्राप्त करें और उन्हीं के साथ विचरण करें तो हमारा जीवन सुखमय हो सकता है। बुराइयों से शिक्षा ग्रहण करें, सावधान हों, बचें और उनका निवारण करने का प्रयत्न करके अपनी चतुरता का परिचय दें तो बुराइयाँ भी हमारे लिए मंगलमय हो सकती हैं। चतुर वैद्य वह है, जो विषों को शोधन और मारण करके अमृतोपम औषधि बना लेता है, चतुर मनुष्य वह है, जो बुराइयों से भी लाभ प्राप्त कर लेता है, गुण-ग्राहक दृष्टि को जाग्रत करके हम हर स्थिति से लाभ उठा सकते हैं।
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