बने अध्यात्म पथ के सच्चे राही

Motivation| प्रेरणा: हम दशकों से अध्यात्म पथ के राही हैं, लेकिन जीवन को यदि सार्थकता की अनुभूति से रीता पा रहे हैं, आध्यात्मिक प्रकाश एवं समझ से वंचित देखते हैं तथा जीवन अशांति, कुढ़न और संताप से आकुल है तो मानकर चलें कि हमसे अध्यात्म पथ को समझने में, गुरु के बताए मार्ग को अपनाने में कहीं भूल हो रही है। वास्तव में अध्यात्म पथ ईश्वर या गुरु से याचना या भीख माँगने की प्रक्रिया नहीं है। अध्यात्म शिष्य-साधक की अभीप्सा से प्रारंभ होता है, जिसका आधार रहता है आत्मश्रद्धा और जीवन का स्पष्ट लक्ष्य रहता है अपने वास्तविक स्वरूप का बोध अर्थात आत्मसाक्षात्कार।
यदि हमें यह लक्ष्य स्पष्ट नहीं और हम इस दिशा में नहीं बढ़ रहे, तो फिर हम नाना प्रकार की विडंबनाओं से गुजरने के लिए विवश-अभिशप्त होते हैं। ऐसे में संशय पग-पग पर घेरे रहता है, जो अध्यात्म पथ पर एक भी कदम आगे बढ़ने नहीं देता। आत्मश्रद्धा के अभाव में ही जीवन आत्मसाक्षात्कार के लक्ष्य से विमुख रहता है। ऐसे में ऋषियों ने जिस आत्मज्ञान को जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता बताया है, उससे व्यक्ति वंचित रहता है। वह बाहरी ज्ञान और सांसारिक कौशल अवश्य बटोरता रहता है, लेकिन सांसारिक गोरखधंधे में उलझा रहता है या फिर धर्म-अध्यात्म के नाम पर सिद्धि, चमत्कार या अन्य उच्चतर प्रलोभनों में कहीं अटक जाता है। जबकि आत्मश्रद्धा बताती है कि हमें संसार की मोहमाया से बचते हुए ईश्वर की ओर उन्मुख रहना है। सत्य व ज्ञान की ओर बढ़ते हुए तमस् व अज्ञान के पार जाना है। यह बोध रखना है कि संसार और भगवान, दोनों एक साथ नहीं पाए जा सकते।
जहाँ राम, वहाँ काम नहीं, जहाँ काम है, वहाँ राम नहीं। प्रश्न एक ही है कि हम वास्तव में अध्यात्म के प्रति कितना सचेष्ट हैं और इस दिशा में कितना नैष्ठिक प्रयास कर रहे हैं और अध्यात्म जगत् का सत्य है कि यदि हम एक कदम भी ईश्वर की ओर बढ़ाते हैं, तो वह दस कदम हमारी ओर बढ़ाता है लेकिन प्रायः ऐसा हो नहीं पाता; क्योंकि हम संसार को ही परम सत्य मान बैठे होते हैं, जो हमारी समस्या की जड़ है। दो नावों पर सवार होकर हम एक तत्त्व को पाना चाहते हैं और दो सत्य एक साथ कैसे विद्यमान हो सकते हैं? इसलिए एक शिष्य-साधक के मन में पहले पात्रता का विकास करना होता है, विवेक-वैराग्य के भाव को जाग्रत करना होता है। इसके अभाव में हम इस संसार को अपना स्थायी आवास मान बैठते हैं और वही हमारा पूरा ध्यान आकर्षित करता है, हमारे मन की सारी शक्तियों को सोख लेता है, हमारी भावनाओं में रम जाता है तथा वैसी ही हमारी सृष्टि बनती जाती है। जबकि ईश्वर व आत्मतत्त्व ही शाश्वत हैं, इसके अतिरिक्त बाकी सब कुछ परिवर्तनशील है। यह संसार इस शाश्वत के परदे पर चलता चलचित्र मात्र है, नाम-रूप का खेल भर है, ईश्वर की लीलामात्र है, अंतिम सत्य नहीं। यह संसार आँखें बंद कर सपने देखने जैसा है।
आँखें खुलते ही इसकी सारता का बुलबुला फूट जाता है। ऋषियों का वेद-उपनिषद् काल से स्पष्ट उद्घोष रहा है कि ईश्वर ही एकमात्र सत्य हैं, वे ही सदा रहते हैं। इसी तरह उनका अभिन्न अंश आत्मा ही सत्य है, शाश्वत है और एक शिष्य के लिए गुरु ही इसकी आत्मा और परमात्मा का स्वरूप होता है। गुरुमुख से निकले वचन ही शिष्य के लिए गुरुमंत्र होते हैं, जिनका वह अटल विश्वास के साथ दामन थामे रहता है और अपने आदर्श का स्तर कभी गिरने नहीं देता और इसी के मानक के अनुरूप स्वयं को कसता, तपाता रहता है, जब तक कि सर्वोच्च सत्य को नहीं पा ले। इस सत्य की उपेक्षा कर कर्मकांड को ही परम सत्य मानने व उसी को पकड़े-जकड़े रहने पर हम भारी भूल करते हैं और जीवन के सार तत्त्व को भूल जाते हैं। हमारा ज्ञान पुस्तकीय ज्ञान व कथा- प्रवचन तक सीमित रह जाता है, जीवन में उतर नहीं पाता। जबकि महर्षियों के अनुसार, शास्त्रों के शब्द घने जंगल की तरह हैं, जहाँ व्यक्ति के खोने का भय रहता है।
बिना साधना का मात्र पांडित्य जीवन में काम नहीं आता, अग्निपरीक्षा की घड़ियों में यह अपना प्रयोजन सिद्ध नहीं कर पाता। ऐसे में बाल की खाल निकालने वाले तर्क-कुतर्कों में जीवन बीत जाता है और हाथ कुछ सार तत्त्व लगता नहीं। अंतिम आह के साथ आखिर यह जीवन भी नष्ट हो जाता है। यह कुछ ऐसे ही होता है, जैसे भवन में आग लगी है और विद्वज्जन आग के स्रोत पर बहस कर रहे हैं। पूरा भवन जलकर राख बनने के कगार पर है और विवाद किए जा रहे हैं। हमें धर्म के सार अध्यात्म को समझना होगा, कर्मकांडों की सीमा का एहसास करना होगा व इसके सारतत्त्व को ग्रहण करते हुए आगे बढ़ना होगा।
अतः साधक को आत्मतत्त्व के यथार्थ को जानने का प्रयास करना है चाहिए। शास्त्रों का सार हृदयंगम करते हुए इन्हें जीवन में धारण करना चाहिए। शास्त्रों का ज्ञान जीवन में उतर रहा है, इसका परिणाम यह दिखेगा कि जीवन सरल बन रहा है, – सच्चाई-भलाई के मार्ग में रस आ रहा है, विद्वत्ता के दंभ-अहंकार से मुक्ति मिल रही है और जीवन के संघर्ष पथ पर योद्धा बनकर आगे बढ़ने का साहस एवं जुझारूपन जाग्रत हो रहा है। इनके अभाव में व्यक्ति जीवन के यथार्थ से बचता फिरता है, जीवन के सत्य का सामना नहीं कर पाता। कुछ तो इतने आलसी, प्रमादी हो जाते – हैं कि धर्म-अध्यात्म के नाम पर सत्य के अतिरिक्त – अन्य सब कुछ कर रहे होते हैं। वास्तव में आध्यात्मिक जीवन अपनी कीमत माँगता है कि – हम इसे चुकाने के लिए कितना तैयार हैं।
जब लक्ष्य स्थिर कर लिया, गुरु की शरण में आ गए, तो फिर चाहे जो भी कीमत हो, नैष्ठिक साधक बनकर इसे जीना होगा, पूरा करना होगा। अपनी क्षुद्रता, स्वार्थ-अहंप्रधान निम्नवृत्तियों को त्यागने के लिए तैयार र रहना होगा; ; जगत् के गोरखधंधे से बाहर निकलने का साहस करना होगा, जो जन्म- जन्मांतरों के अज्ञानजन्य अभ्यास के रूप में हमें । उलझाकर पंगु बना रहा है। कर्मकांडी विडंबनाओं में उलझने के बजाय हमें गुरु द्वारा बताए अध्यात्म पथ का अनुसरण करना होगा। आध्यात्मिक पथ में जहाँ भावों की र और उदारता को साधना होता है तो वहीं पावनता र को सुदृढ़ करते हुए, मन को उच्चतर मार्ग पर इच्छाशक्ति र ऊर्ध्वगामी भी बनाना होता है।
सांसारिक उपलब्धियों व सुख-भोगों के लिए हम दैत्य की भाँति जिस एकाग्रता तथा इच्छाशक्ति का प्रयोग करते हैं, उन्हें आत्मनोन्मुख करना होता है। यदि हमें अपनी दुर्दशा और भटकी दिशा का थोड़ा-सा भी एहसास हो जाए, तो फिर उसी क्षण हम धर्म और सत्य के मार्ग पर बढ़ चलते हैं। इसी के चरम पर ईश्वर की कृपा अवतरित होती है, जो साधना को नई गति देती है एवं जिसके अवतरण के आधार पर अहंकार निर्मूल होता है, चित्त का परिष्कार होता है तो आएँ हम धर्म- अध्यात्म के नाम पर चिह्नपूजा या कर्मकांड तक सीमित न होकर, गुरु की वास्तविक इच्छा को जानें, उनके बताए साधना-पथ का प्राणपण से पालन करें, उनकी कृपा का आह्वान करें, फिर देखें उनकी कृपा के साथ आध्यात्मिक सत्य कैसे हमारे – जीवन का अंग बनते हैं और हम उनके एक यंत्र के – रूप में अपना अकिंचन-सा ही सही, किंतु सार्थक योगदान दे पाते हैं।
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एक राजा के तीन पुत्र थे। राजा उन तीनों की योग्यता को परख कर, उसके आधार पर अपने उत्तराधिकारी का चयन करना चाहता था। इसलिए एक दिन राजा ने उन्हें बुलाकर कहा- “जाओ, किसी धर्मात्मा को खोजकर लाओ।” तीनों राजकुमार धर्मात्मा की खोज में निकल पड़े। । कुछ दिनों बाद एक पुत्र, एक सेठ को लेकर राजा के पास पहुँचा और बोला- “पिताजी ! इन सेठ जी ने नगर में अनेकों धर्मशालाएँ व मंदिर बनाए हैं।” राजा ने सेठ से ऐसा करने का कारण पूछा तो सेठ बोले- “मैंने सुना है कि ऐसा करने से पुण्य मिलता है।” राजा ने उनका सत्कार किया और उन्हें धन देकर विदा किया। दूसरा राजकुमार एक ब्राह्मण को लेकर लौटा और उनका परिचय कराते हुए राजा से बोला- “ये अत्यंत ज्ञानी व तपस्वी हैं।” राजा ने उनसे धर्म की परिभाषा पूछी तो वे बोले- “शास्त्रोक्त कर्म करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, उसी पथ का पालन धर्म है।”
राजा ने उनको भी सम्मानपूर्वक दक्षिणा देकर विदा किया। तीसरा पुत्र एक गरीब से व्यक्ति को लेकर पहुँचा। राजा के पूछने पर वह बोला- “पिताजी! यह आदमी एक घायल गाय की सेवा कई दिनों से कर रहा था। मुझे लगा कि इसी व्यक्ति के अंदर सही धर्मात्मा होने का भाव है।” राजा ने उस आदमी से पूछा- “तुम धर्म-कर्म का कोई कार्य करते हो?” वह आदमी बोला- “महाराज! मैं एक गरीब किसान हूँ, अनपढ़ हूँ, धर्म-कर्म कुछ जानता नहीं हूँ। हाँ, यदि कोई जरूरतमंद, रोगी, दुःखी, अभावग्रस्त दिख पड़ता है तो यथाशक्ति उसकी मदद अवश्य करता हूँ।” यह सुनकर राजा बोला – “कुछ पाने की आशा किए बिना सच्चे हृदय से दूसरों की सेवा करना ही धर्म है। तुम ही सच्चे धर्मात्मा को लेकर लौटे हो।” वह पुत्र ही राजगद्दी का अधिकारी बना।
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