प्रेरणा

कर्म बड़ा या भाग्य

  Motivation| प्रेरणा:  ‘कर्म बड़ा या भाग्य‘- यह बहस इस दुनिया न में सदियों से चली आ रही है। कर्म और भाग्य में व बड़ा कौन है ? यह प्रश्न सदियों से मानव मन में है उभरता रहा है। कर्म को मानने वाले कर्मवादी लोग कहते हैं कि कर्म ही सब कुछ है और भाग्य कुछ नहीं होता। वहीं भाग्यवादी लोगों का कहना है कि भाग्य ही सब कुछ है और मनुष्य चाहे जो कुछ कर ले; अंततः होगा वही, जो भाग्य में, किस्मत में लिखा होगा। वस्तुतः सत्य क्या है ? कर्म बड़ा है या भाग्य ? कर्म श्रेष्ठ है या भाग्य ? कर्म महत्त्वपूर्ण है या भाग्य ? कर्म और भाग्य एकदूसरे के विरोधी हैं या पूरक ? ये प्रश्न हमारे मन में अक्सर उठते हैं, पर वास्तव में सच क्या है ? इसे समझने के लिए हम पुराणों में वर्णित एक मधुर कहानी में प्रवेश करते हैं। 

             कहानी के अनुसार एक बार देवर्षि नारद भगवान विष्णु के पास पहुँचे। उन्होंने भगवान से शिकायत करते हुए कहा – “आपकी बनाई इस धरती पर आपका प्रभाव कम हो रहा है। जो लोग धर्म और सच्चाई के रास्ते पर चल रहे हैं, उनका भला नहीं हो रहा है तथा अधर्म और बुराई के मार्ग पर चलने वाले दुष्ट, अधर्मी, पापी लोग हर दिन प्रगति कर रहे हैं।” देवर्षि ने आगे कहा- “अच्छाई के मार्ग पर चलने वाले लोग, अच्छे कर्म, शुभ कर्म, पुण्य कर्म करने वाले लोग दुःख और कष्टों से भरा जीवन जी रहे हैं और बुराई के मार्ग पर चलने वाले लोग सुखी हैं।” यह सुनकर विष्णु भगवान मुस्कराए और बोले- “जो हो रहा है, वह सब नियति है।” पर नारद जी बोले- “भगवन्! मैं पृथ्वी पर यह सारा दृश्य अपनी आँखों से देखकर आ रहा हूँ, फिर मैं कैसे मानूँ कि जो कुछ भी हो रहा है वह सब नियति है।” 

              भगवान बोले- “ठीक है, आप कोई ऐसी घटना बताएँ, जिससे आपकी बात सिद्ध होती हो।” देवर्षि नारद बोले-“अभी मैं एक वन से होकर आ रहा हूँ। उस वन में मैंने देखा कि एक गाय दलदल में फँस गई थी, लेकिन उसे बचाने वाला कोई भी न था। तभी एक चोर वहाँ से गुजरा और गाय को दलदल में फँसी देखकर उसके शरीर पर पैर रखकर वह दलदल पार कर निकल गया। फलस्वरूप वह चोर तो दलदल पार कर गया, पर वह गाय दलदल में और अधिक फँस गई।” देवर्षि ने अपनी बात आगे बढ़ाई और कहा- “भगवन् ! आगे जाकर उस चोर को बहुत से सोने के सिक्कों से भरा एक थैला मिल गया। इस घटना के कुछ समय बाद उसी मार्ग से एक वृद्ध महात्मा भी जा रहे थे। 

               गाय को दलदल में फँसी देखकर उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर उस गाय को दलदल से बाहर निकाला और उसकी जान बचाई। “उसके बाद वे वृद्ध साधु अपने मार्ग पर आगे बढ़ते जा रहे थे कि तभी वह रास्ते में आए एक कुएँ में गिर पड़े। अब भगवन्, आप ही बताइए यह कौन-सा न्याय है ?” देवर्षि का प्रश्न सुनकर भगवान विष्णु बोले- ” नारद ! यह सब कर्मानुसार हुआ।” “वह कैसे भगवन् ?” नारद जी ने फिर पूछा। तब भगवान बोले- “चोर के द्वारा पूर्व में किए गए अच्छे कर्मों के कारण उसके भाग्य में सोने के सिक्के भरा एक थैला नहीं, बल्कि पूरा महल था, पर उसने गाय के साथ जो किया उसके कारण उसके कर्म बिगड़ गए और कर्म बिगड़ जाने के कारण उसका भाग्य भी बिगड़ गया। फलस्वरूप भाग्य में, किस्मत में महल होने के बावजूद भी उसे सिर्फ एक थैला ही मिल सका।” भगवान थोड़ा मुस्कराए व देवर्षि नारद को संबोधित कर कहने लगे- “वहीं साधु के भाग्य में उस दिन बड़ी दुर्घटना लिखी थी, लेकिन उन्होंने गाय को बचाकर जो पुण्यकर्म किया उससे उनके साथ घटने वाली बड़ी दुर्घटना एक छोटी-सी चोट में बदल गई।” 

                       भगवान की बातें सुनकर नारद जी संतुष्ट हुए और उन्हें यह समझ में आया कि अच्छे कर्म से अच्छे भाग्य का निर्माण होता है और बुरे कर्म से बुरे भाग्य का निर्माण होता है और तदनुसार कर्म करने से हम अपने भाग्य को भी बदल सकते हैं। कर्म और भाग्य के रिश्ते को सम्यक रूप से समझने के लिए हम एक और मधुर व रोचक कहानी में प्रवेश करते हैं। कहानी के अनुसार – ” एक बहुत बड़ा जंगल था। जंगल के दोनों ओर अलग-अलग राजाओं का राज्य था और उसी जंगल में एक महात्मा रहते थे। उन महात्मा को दोनों राज्यों के राजा अपना गुरु मानते थे। उस जंगल के बीच से एक नदी बहती थी। अक्सर उसी नदी को लेकर दोनों राज्यों के बीच झगड़े-फसाद हुआ करते थे। “एक बार दोनों राज्यों के बीच युद्ध जैसी स्थिति आ पहुँची। दोनों में से कोई भी राजा सुलह को तैयार न था, सो युद्ध होना सुनिश्चित था। 

          दोनों राज्यों के राजा युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए महात्मा जी से आशीर्वाद पाने के उद्देश्य से उनकी कुटिया की ओर चल पड़े। पहले एक राज्य के राजा ने महात्मा जी के पास पहुँचकर महात्मा जी से विजय का आशीर्वाद माँगा। “महात्मा जी ने कुछ देर उस राजा को निहारा और कहा-‘राजन् तुम्हारे भाग्य में जीत तो नहीं दिखती, पर आगे ईश्वर की मरजी, देखो क्या होता है।’ यह सुनकर राजा थोड़ा विचलित तो हुआ, पर राजा को अपने मनोबल, आत्मबल, संकल्पबल और पुरुषार्थ पर पूरा भरोसा था, इसलिए उसने सोचा कि यदि हारना ही है तो युद्ध से पहले ही हार मान लेना कोई वीरता नहीं, बल्कि कायरता ही है, इसलिए हम युद्ध में पीठ नहीं दिखाएँगे, बल्कि शत्रु को अपनी वीरता, बहादुरी और पौरुष का लोहा मनवाकर रहेंगे और आसानी से हार नहीं मानेंगे। “मन-ही-मन यह सोचकर वह राजा वहाँ से चला गया। 

             तत्पश्चात दूसरे राज्य का राजा भी महात्मा जी के पास जीत का आशीर्वाद लेने पहुँचा, उनके पैर छुए और विजयश्री का आशीर्वाद माँगा। महात्मा जी ने उसे भी कुछ देर निहारा और कहा- ‘राजन्, भाग्य तो तुम्हारे साथ है ही, इसलिए तुम जीत सकते हो।’ यह सुनकर राजा तो खुशी से भर गया और वापस जाकर वह बिलकुल निश्चित हो गया, मानो उसने युद्ध उसी दिन जीत लिया हो। “उधर पहले राज्य का राजा युद्ध की बढ़- चढ़कर पुरजोर तैयारियाँ करता रहा। अपनी कमजोरी और ताकत का सही मूल्यांकन कर वह अपनी कमजोरी दूर करने और अपनी ताकत को और अधिक बढ़ाने पर काम करता रहा और दूसरे राज्य का राजा अपने भाग्य के भरोसे रहने के कारण युद्ध की पुरजोर तैयारी नहीं कर सका। उसने अपनी कमजोरियों को दूर करने का कोई प्रयास भी नहीं किया। अंततः युद्ध की घड़ी आ पहुँची।

          दोनों राज्यों के बीच युद्ध का शंखनाद हुआ। “पहले राज्य के राजा की सेना यह सोचकर लड़ रही थी कि चाहे उसके भाग्य में, किस्मत में हार ही क्यों न लिखी हो, चाहे युद्ध का कोई भी परिणाम क्यों न हो, हार और जीत की चिंता किए बगैर वह सेना पूरी शक्ति से युद्ध लड़ रही थी। “पहले राज्य के राजा की सेना यह बात सोचकर लड़ रही थी कि भले ही हमारी किस्मत में हार हो, पर फिर भी हम हार नहीं मानेंगे। हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयत्न करेंगे, हम अपना सर्वस्व झोंक देंगे। “वहीं दूसरे राज्य की सेना यह सोचकर लड़ रही थी कि हमारे राजा के भाग्य में जीत लिखी ही है तो हमारी जीत तो सुनिश्चित है ही, फिर हमें कोई चिंता क्यों करनी चाहिए। लड़ते-लड़ते अचानक दूसरे राज्य के राजा के घोड़े के पैर का नाल भी निकल गया और घोड़ा लड़खड़ाने लगा, पर राजा ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। क्यों ? क्योंकि राजा के दिमाग में बस, यही एक बात चल रही थी कि जीत मेरे भाग्य में है ही, फिर चिंता किस बात की। “कुछ ही क्षण बाद दूसरे राजा का घोड़ा लड़खड़ाकर गिर गया, जिससे राजा भी जमीन पर गिर पड़ा और घायल हो गया और वह पहले राज्य की सेना के बीच घिर गया। 

           सैनिकों ने उसे बंदी बना लिया और अपने राजा को सौंप दिया। राजा के बंदी होते ही उसके सारे सैनिकों ने आत्म- समर्पण कर दिया। युद्ध का निर्णय हो चुका था। पहले राज्य के राजा को विजयश्री प्राप्त हो चुकी थी। “युद्ध का परिणाम महात्मा जी के द्वारा की गई भविष्यवाणी के बिलकुल विपरीत था। निर्णय किया। अंततः युद्ध की घड़ी आ पहुँची। दोनों के राज्यों के बीच युद्ध का शंखनाद हुआ। “पहले राज्य के राजा की सेना यह सोचकर लड़ रही थी कि चाहे उसके भाग्य में, किस्मत में हार ही क्यों न लिखी हो, चाहे युद्ध का कोई भी परिणाम क्यों न हो, हार और जीत की चिंता किए बगैर वह सेना पूरी शक्ति से युद्ध लड़ रही थी। “पहले राज्य के राजा की सेना यह बात सोचकर लड़ रही थी कि भले ही हमारी किस्मत में हार हो, पर फिर भी हम हार नहीं मानेंगे।

              हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयत्न करेंगे, हम अपना सर्वस्व झोंक देंगे। “वहीं दूसरे राज्य की सेना यह सोचकर लड़ रही थी कि हमारे राजा के भाग्य में जीत लिखी ही है तो हमारी जीत तो सुनिश्चित है ही, फिर हमें कोई चिंता क्यों करनी चाहिए। लड़ते-लड़ते अचानक दूसरे राज्य के राजा के घोड़े के पैर का नाल भी निकल गया और घोड़ा लड़खड़ाने लगा, पर राजा ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। क्यों ? क्योंकि राजा के दिमाग में बस, यही एक बात चल रही थी कि जीत मेरे भाग्य में है ही, फिर चिंता किस बात की। “कुछ ही क्षण बाद दूसरे राजा का घोड़ा लड़खड़ाकर गिर गया, जिससे राजा भी जमीन पर गिर पड़ा और घायल हो गया और वह पहले राज्य की सेना के बीच घिर गया। 

        सैनिकों ने उसे बंदी बना लिया और अपने राजा को सौंप दिया। राज के बंदी होते ही उसके सारे सैनिकों ने आत्म- समर्पण कर दिया। युद्ध का निर्णय हो चुका था पहले राज्य के राजा को विजयश्री प्राप्त हो चुकी थी “युद्ध का परिणाम महात्मा जी के द्वारा क गई भविष्यवाणी के बिलकुल विपरीत था। निर्णय के बाद महात्मा भी वहाँ पहुँच गए। अब दोनों राजाओं को बड़ी जिज्ञासा थी कि आखिर भाग्य का लिखा बदल कैसे गया ? जिसके भाग्य में जीत थी, उसे हार मिली और जिसके भाग्य में – हार थी, उसे जीत मिली। आखिर कैसे ? आखिर – यह कैसे संभव हुआ ? दोनों राजाओं ने यह प्रश्न महात्मा जी से पूछा। “महात्मा जी ने मुस्कराते हुए कहा- ‘राजन् भाग्य नहीं बदला, वो तो बिलकुल अपनी जगह पर सही है, पर तुम लोग बदल गए।’ उन्होंने विजेता राजा की ओर इशारा करते हुए कहा- ‘अब आपको ही देखो राजन् ! आपने संभावित हार के बारे में सुनकर दिन-रात एक कर दिया, सब कुछ भूलकर आप जबरदस्त तैयारी में जुट गए, यह सोचकर कि परिणाम चाहे जो भी हो, पर हार नहीं मानूँगा। आपने हर बिंदु का ध्यान रखा।’ “महात्मा जी ने आगे कहा- ‘आपने स्वयं ही कुशल रणनीति बनाई; जबकि पहले आपकी योजना सेनापति के भरोसे युद्ध लड़ने की थी।’ फिर महात्मा जी ने पराजित राजा की ओर इशारा करते हुए कहा- ‘राजन् आपने तो युद्ध से पहले ही जीत का उत्सव मनाना शुरू कर दिया था।

      आपने तो अपने घोड़े की नाल तक का ख्याल नहीं रखा, फिर आप इतनी बड़ी सेना को कैसे सँभालते और कैसे उसको कुशल नेतृत्व देते और हुआ वही, जो होना लिखा था, जो होना ही चाहिए था। भाग्य नहीं बदला, पर जिनके भाग्य में जो लिखा था उन्होंने स्वयं को ही बदल लिया, फिर बेचारा भाग्य क्या करता।’ “दोनों राजाओं को महात्मा जी की बात समझ में आ गई। यह कहानी यह स्पष्ट करती है कि कर्म ही प्रधान है। कर्म अच्छा है तो भाग्य भी अच्छा होगा और कर्म बुरा है तो भाग्य भी बुरा ही होगा। क्यों ? क्योंकि कर्म ही भाग्य के रूप में परिणत होता है। कर्म ही भाग्य के रूप में अभिव्यक्त होता है। कर्म यदि बीज है तो भाग्य उस बीज से प्रकट हुआ वृक्ष है। “यदि बीज बबूल का है तो उस बीज से बबूल का वृक्ष ही प्रकट होगा और यदि बीज आम का है तो उस बीज से आम का वृक्ष ही प्रकट होगा। 

         उसी प्रकार अच्छे कर्म, पुण्य कर्म, शुभ कर्म ही अच्छे भाग्य के रूप में व्यक्त होते हैं, अभिव्यक्त होते हैं, परिणत होते हैं, प्रकट होते हैं। भाग्य कुछ और नहीं, बल्कि अतीत में या वर्तमान में हमारे द्वारा किए गए कर्मों की ही अभिव्यक्ति है। “वही हमारे कर्मों की छाया है, हमारे कर्मों का प्रतिबिंब है, हमारे कर्मों का प्रतिफल है। जहाँ पौरुष है, पुरुषार्थ है, दृढ़ इच्छाशक्ति है, प्रचंड मनोबल, आत्मबल है वहीं विजयश्री है, वहीं जीत है, वहीं सफलता है, वहीं जय-जयकार है और जहाँ आलस्य है, अकर्मण्यता है, प्रमाद है, वहीं हार है, वहीं असफलता है। इसलिए हमारे शास्त्रों में कर्म करने को ही, पुरुषार्थ करने को ही महत्त्वपूर्ण माना गया है।” 

       गीता (2/47-48) में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन *को कहते हैं- 

   कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। 

 मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ 

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । 

सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।। 

       अर्थात तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो। हे धनंजय ! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्त्तव्य कर्मों को कर। समत्व की स्थिति में होना ही योग कहलाता है। यह जीवन, यह संसार कर्मप्रधान है। कर्म की प्रधानता को प्रकाशित करते हुए मानसकार ने लिखा है- 

          करम प्रधान बिस्व करि राखा। 

       जो जस करइ सो तस फलु चाखा ॥ 

          सकल पदारथ हैं जग माहीं।

             कर्महीन नर पावत नाहीं ॥ 

       अर्थात यह विश्व, यह जगत् कर्मप्रधान है। जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। इस संसार में सभी प्रकार के पदार्थ सुलभ हैं। इस संसार में किसी पदार्थ की कोई कमी नहीं है, पर कर्महीन मनुष्य को कुछ भी प्राप्त नहीं होता; क्योंकि इस संसार में कुछ पाने के लिए पहले उद्यमरूपी कर्म करना पड़ता है। कर्म की महत्ता को लेकर संत कबीर ने भी क्या खूब कहा है- 

      कीन्हें बिना उपाय के, देव कबहु नहिं देत।

      खेत बीज बोवै नहीं, तो क्यों जायेंगे खेत ।।

          अर्थात स्वयं उपाय करने से ही फल प्राप्त होता है, बिना परिश्रम के देव भी कुछ नहीं देता। खेत में यदि बीज बोया ही नहीं तो खेत में क्या जमेगा। कर्म और भाग्य को स्पष्ट करते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि अपने विचारों पर नियंत्रण रखो, नहीं तो वे तुम्हारा कर्म बन जाएँगे और अपने कर्मों पर नियंत्रण रखो नहीं तो वे तुम्हारा भाग्य बन जाएँगे। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। वह अपने कर्मों से ही अच्छे या बुरे भाग्य का निर्माण करता है। 

    वहीं परमपूज्य गुरुदेव ने भी स्पष्ट किया है कि ‘मनुष्य जैसा सोचता है, वह वैसा ही करता है और वह वैसा ही बन जाता है। कर्म और भाग्य एकदूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। भाग्य कुछ और नहीं, बल्कि कर्मों की ही अभिव्यक्ति है। यदि कर्म श्रेष्ठ हैं तो भाग्य श्रेष्ठ होगा ही और यदि कर्म निकृष्ट हैं तो भाग्य भी वैसा ही होगा और निस्संदेह मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। वह स्वयं को जैसा चाहे, वैसा बना सकता है।’ 

      राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित कविता की प्रस्तुत पंक्तियों से भी यही भाव मुखरित हो रहे हैं- 

    मानव जब जोर लगाता है,

    पत्थर पानी बन जाता है। 

    सच है, विपत्ति जब आती है,

    कायर को ही दहलाती है, 

    शूरमा नहीं विचलित होते, 

     क्षण एक नहीं धीरज खोते, 

      विघ्नों को गले लगाते हैं, 

       काँटों में राह बनाते हैं। 

       जो आ पड़ता सब सहते हैं, 

       उद्योग-निरत नित रहते हैं,

शूलों का मूल नसाने को, 

बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को। 

है कौन विघ्न ऐसा जग में,

 टिक सके वीर नर के मग में, 

खम ठोंक ठेलता है जब नर, 

पर्वत के जाते पाँव उखड़ । 

मानव जब जोर लगाता है, 

पत्थर पानी बन जाता है। 

बत्ती जो नहीं जलाता है, 

रोशनी नहीं वह पाता है, 

मेहँदी जब सहती है प्रहार, 

बनती ललनाओं का सिंगार। 

जब फूल पिरोये जाते हैं, 

हम उनको गले लगाते हैं। 

वसुधा का नेता कौन हुआ ? 

भूखंड-विजेता कौन हुआ ? 

अतुलित यश-क्रेता कौन हुआ ? 

नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ ? 

जिसने न कभी आराम किया, 

विघ्नों में रहकर नाम किया। 

जब विघ्न सामने आते हैं, 

सोते से हमें जगाते हैं, 

मन को मरोड़ते हैं पल-पल, 

तन को झंझोरते हैं पल-पल । 

सत्पथ की ओर लगाकर ही, 

जाते हैं हमें जगाकर ही। 

पौरुष के हैं साधन प्रचंड, 

वन में प्रसून तो खिलते हैं, 

बागों में शाल न मिलते हैं। 

विपदाएँ दूध पिलाती हैं, 

लोरी आँधियाँ सुनाती हैं। 

जो लाक्षा-गृह में जलते हैं,

वे ही शूरमा निकलते हैं। 

बढ़कर विपत्तियों पर छा जा, 

मेरे किशोर ! मेरे ताजा ! 

जीवन का रस छन जाने दे, 

तन को पत्थर बन जाने दे। 

मानव जब जोर लगाता है, 

पत्थर पानी बन जाता है। 

     अस्तु यह स्पष्ट ही है कि यदि मनुष्य में प्रचंड आत्मबल हो, प्रचंड संकल्पबल हो, प्रचंड मनोबल हो तो उसके पौरुष की गर्जना के समक्ष सागर भी, पर्वत भी उसे रास्ता देने को विवश हो जाते हैं। बड़ी-बड़ी विपदाएँ भी उसे अपने लक्ष्य से विचलित नहीं कर पाती हैं। उसके लिए विपरीत परिस्थितियाँ भी अनुकूल होती जाती हैं। वह चाहे तो खेल, उद्योग, अध्यात्म, अंतरिक्ष, शिक्षा, व्यवसाय आदि किसी भी क्षेत्र विशेष में सफलता के शीर्ष तक जा पहुँचता है। जैसे वह कुशल मूर्तिकार कठोर पाषाण को तराशकर उसे मनचाही मूर्ति, आकृति, और आकार का रूप दे देता है वैसे ही पौरुषवान व्यक्ति, अपने पुरुषार्थ से, श्रेष्ठ कर्म से अपने जीवन को मनचाहा आकार दे पाता है और स्वंय अपने हाथों से ही अपने भाग्य को गढ़ता है, रचता है और सुख, सौभाग्य तथा आनंद का अधिपति बनता है। 

                 अस्तु हमारा कर्म ही बीज है और भाग्य उसी बीज से प्रकट हुआ वृक्ष है। भाग्य उसी वृक्ष में लगे हुए खट्टे या मीठे फल हैं। अस्तु हमें उपनिषद् का यह संदेश सदैव स्मरण रखना चाहिए कि 

         उठो ! जागो और तब तक संघर्ष करो,

            जब तक मंजिल मिल न जाए।

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