विज्ञान

पानी में एक हफ्ते से ज्यादा जिंदा रह सकती है भौंरे की रानी, वैज्ञानिकों ने खोला बड़ा रहस्य

नई रिसर्च में सामने आया कि भौंरे की रानियां पानी से oxygen खींचकर और बेहद धीमे metabolism के सहारे कई दिन तक जीवित रह सकती हैं

Report| कुछ समय पहले वैज्ञानिकों को एक बेहद चौंकाने वाली खोज मिली थी। पता चला कि भौंरे की रानी पानी में कई दिनों तक डूबी रहने के बाद भी सुरक्षित बाहर निकल सकती है। अब नई स्टडी ने इस असाधारण क्षमता के पीछे का वैज्ञानिक कारण भी सामने रख दिया है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक भौंरे की रानी अपने आसपास के पानी से oxygen लेने में सक्षम होती है। यही कारण है कि वह पानी में लंबे समय तक रहने के बावजूद जीवित रह पाती है। यह क्षमता खास तौर पर तब काम आती है जब उनका भूमिगत घोंसला अचानक बाढ़ की वजह से पानी में डूब जाए।

इस शोध का नेतृत्व कनाडा की University of Ottawa से जुड़े इवोल्यूशनरी फिजियोलॉजिस्ट Charles Darveau ने किया। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज यह समझने में मदद करती है कि जमीन पर रहने वाले कुछ कीट अत्यधिक पर्यावरणीय चुनौतियों से कैसे बच निकलते हैं।

सर्दियों में खास अवस्था में चली जाती हैं रानियां

सर्दियों के मौसम में कई कीट एक विशेष अवस्था में चले जाते हैं जिसे डायपॉज़ कहा जाता है। इस दौरान उनका विकास और ऊर्जा उपयोग काफी धीमा हो जाता है। भौंरे की रानियां भी इस समय जमीन के नीचे सुरक्षित जगह ढूंढकर आराम की स्थिति में चली जाती हैं।

हालांकि भूमिगत बिल हमेशा सुरक्षित नहीं रहते। भारी बारिश, बर्फ पिघलने या पानी का स्तर बढ़ने से ये जगहें अचानक पानी में डूब सकती हैं। ऐसे हालात में सामान्य रूप से जीवित रहना मुश्किल होता है, लेकिन कुछ प्रजातियां इसके लिए खास तरीके विकसित कर चुकी हैं।

वैज्ञानिकों ने खास तौर पर Bombus impatiens नाम की प्रजाति का अध्ययन किया। 2024 में किए गए प्रयोगों में पाया गया कि इस प्रजाति की लगभग 90 प्रतिशत रानियां एक हफ्ते तक पानी में डूबी रहने के बाद भी जीवित रह सकती हैं।

प्रयोग में सामने आए तीन बड़े कारण

लैब में किए गए प्रयोगों के दौरान वैज्ञानिकों ने कई भौंरों को ठंडे पानी में डुबोकर उनके गैस एक्सचेंज और metabolism की गतिविधि को मापा।

इस दौरान पाया गया कि पानी में रहते हुए भी वे ऑक्सीजन ले रही थीं और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर छोड़ रही थीं। यानी वे किसी हद तक पानी के भीतर भी सांस ले पा रही थीं।

दूसरा कारण यह था कि उनके शरीर में एनारोबिक मेटाबॉलिज्म सक्रिय हो गया। जब शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती तो कोशिकाएं ऊर्जा बनाने के लिए एक अलग प्रक्रिया अपनाती हैं। इस प्रक्रिया के दौरान शरीर में लैक्टेट नाम का पदार्थ बनने लगता है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण यह था कि रानी भौंरों का मेटाबॉलिज्म बहुत कम स्तर पर पहुंच जाता है। डायपॉज़ के दौरान उनका ऊर्जा उपयोग पहले ही लगभग 95 प्रतिशत तक घट जाता है। पानी में डूबने के बाद यह और भी कम हो जाता है।

ऊर्जा की जरूरत बेहद कम हो जाती है

शोध में पाया गया कि पानी में डूबने से पहले रानी भौंरे प्रति घंटे काफी ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड पैदा कर रही थीं। लेकिन पानी में लगभग आठ दिन रहने के बाद यह दर काफी कम हो गई। इसका मतलब था कि उनका शरीर बहुत कम ऊर्जा इस्तेमाल कर रहा था।

कम ऊर्जा की जरूरत और आसपास के पानी से मिलने वाली ऑक्सीजन की मदद से वे लंबे समय तक जीवित रह पाती हैं।

अभी भी बाकी हैं कुछ सवाल

वैज्ञानिकों को अभी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि भौंरे पानी से ऑक्सीजन कैसे खींचते हैं। उनका अनुमान है कि यह प्रक्रिया एक तरह के फिजिकल गिल की मदद से हो सकती है, जिसमें शरीर के आसपास फंसी हवा की पतली परत पानी के साथ गैस का आदान-प्रदान करती है।

भविष्य में वैज्ञानिक यह भी जानना चाहते हैं कि यह क्षमता कितने समय तक काम कर सकती है और किन परिस्थितियों में इसकी सीमा खत्म हो जाती है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि आने वाले समय में इस विषय पर और अध्ययन किए जाएंगे ताकि यह समझा जा सके कि ये छोटे जीव इतने कठिन हालात में भी कैसे जीवित रह पाते हैं।

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