प्रेरणा

आज़ादी का जश्न: उपलब्धियों, चुनौतियों और आत्मचिंतन का समय

आज जब देश आज़ादी की 78वीं वर्षगांठ मना रहा है, तो यह ज़रूरी है कि हम पीछे मुड़कर देखें कि आज़ादी के सात दशकों से भी ज़्यादा समय में हमने क्या हासिल किया और क्या करना बाकी है। स्वतंत्रता दिवस सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं, बल्कि राष्ट्र के आत्मचिंतन और मूल्यांकन का अवसर भी है। इस नज़रिए से देखें तो हमें ऐसे कई कारण मिलेंगे जो हमें राष्ट्रीय गौरव से भर देंगे। हरित क्रांति की बदौलत हम कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने, आईटी क्रांति ने हमें वैश्विक सॉफ्टवेयर केंद्र बनाया और इसरो की सफलताओं ने हमें अंतरिक्ष क्षेत्र में शीर्ष देशों की कतार में खड़ा कर दिया। आर्थिक मोर्चे पर देश की हालिया उपलब्धियाँ और भी ज़्यादा चकाचौंध करने वाली हैं। हम जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए हैं और 2028 तक तीसरे स्थान पर पहुँचने की राह पर हैं। डिजिटल क्रांति में यूपीआई का दायरा लगातार बढ़ रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के ज़रिए पाकिस्तान को घुटनों पर लाकर हमारी सेनाओं ने पूरी दुनिया को अपनी ताकत दिखाई, वहीं रक्षा उत्पादन में ऐतिहासिक वृद्धि हमारे आत्मविश्वास और क्षमता की गवाही देती है। स्वतंत्रता दिवस का पावन अवसर हमें स्वतंत्रता सेनानियों के उस जज्बे की भी याद दिलाता है, जो मौजूदा चुनौतियों के मद्देनजर बेहद जरूरी है।

बहरहाल, भारत पर 50 फीसदी अमेरिकी टैरिफ लगाने की घोषणा कई आशंकाएं पैदा कर रही है। लेकिन वैश्विक रेटिंग एजेंसी एसएंडपी ने भारत की साख को एक पायदान ऊपर उठाया है और कहा है कि अमेरिकी टैरिफ का भारत पर बहुत कम असर होगा, क्योंकि उसकी आर्थिक तरक्की का आधार घरेलू खपत है। अगर पर्यावरणीय चुनौतियों के लिहाज से देखें, तो जिस तरह से किश्तवाड़ और उससे पहले उत्तराखंड व हिमाचल में प्राकृतिक आपदाएं आईं, उससे यह आशंका पैदा होती है। बहरहाल, भारत पर 50 फीसदी अमेरिकी टैरिफ लगाने की घोषणा कई आशंकाएं पैदा कर रही है। लेकिन वैश्विक रेटिंग एजेंसी एसएंडपी ने भारत की साख को एक पायदान ऊपर उठाया है और कहा है कि अमेरिकी टैरिफ का भारत पर बहुत कम असर होगा, क्योंकि उसकी आर्थिक तरक्की का आधार घरेलू खपत है।

पर्यावरणीय चुनौतियों पर गौर करें तो किश्तवाड़ और उससे पहले उत्तराखंड व हिमाचल में जिस तरह प्राकृतिक आपदाएँ आईं, उससे यह आशंका पैदा होती है कि कहीं यह विकास की दौड़ में हिमालय की आवाज़ को नज़रअंदाज़ करने की सज़ा तो नहीं। दूसरी ओर, देश में राजनीतिक मतभेद अब इतने बढ़ गए हैं कि संवैधानिक संस्थाओं को भी संदेह के घेरे में लाया जा रहा है। आख्यानों के जाल इस तरह बुने जा रहे हैं कि पहले कभी यह इतना ज़रूरी नहीं लगा कि तथ्यों की जाँच कृत्रिम बुद्धिमत्ता से नहीं, बल्कि अपने विवेक के आलोक में की जाए। हमारा ऐसा संकल्प ही आज़ादी के जश्न को महज़ औपचारिकता बनने से बचा सकता है।

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