शिक्षा

छत्तीसगढ़ में मराठा (आधुनिक इतिहास)

10 वीं शताब्दी के अंतिम चरण से लेकर 18 वीं शताब्दी के मध्यान्त तक लगभग 752 वर्षो तक छत्तीसगढ़ प्रदेश पर कलचुरि राजवशों की अधिसत्ता रही। इस प्राचीन राजवंश का एक गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। सन् 1742 ई. में कलचुरि राजवंश की सत्ता का अंत हो गया। उसके स्थान पर नागपुर के भोंसले का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

गौरवशाली इतिहास का अंत

भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास में कलचुरि राजवंश का स्थान विशिष्ट है। इतिहास में और किसी राजवंश ने इतनी लम्बी अवधि तक शासन नहीं किया जितना की कलचुरि राजवंश ने रतनपुर के कलचुरि शासक अपने को हैहय सहस्त्रार्जुन का वंशज कहने में गौरव का अनुभव करते थे। इस कलचुरि शाखा में कई महत्वपूर्ण शासक हुए जिन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार तो किया ही साथ ही साथ धर्म और कला को आश्रय प्रदान कर अपनी कीर्ति दूर-दूर तक फैलायी। ऐसे गौरवशाली शासकों में कलिंगराज (9900-1020), रत्नराजप्रथम पृथ्वीदेव प्रथम (1065-1090 (जाजल्लदेव प्रथम (1090-1120) आदि उल्लेखनीय थे। प्रतापमल्ल के बाद रतनपुर राजसिंहासन पर आसीन होने वाले शासकों का कार्यकाल उल्लेखनीय नहीं रहा है। संभवतः कमजोर एवं अयोग्य शासक एक के बाद एक बैठते रहे परिणामतः इन शासकों के कार्यकाल में प्राचीन गौरवशाली राजवंश का इतिहास विलुप्त हो गया। यह स्थिति भी छत्तीसगढ़ में मराठा प्रभुत्व की स्थापना में निःसंदेह उत्तरदायी कारण रहा हो।

कलचुरि राजवंश की शक्ति का विभाजन

छत्तीसगढ़ में मराठा प्रभुत्व स्थापना का एक आधारभूत कारण कलचुरि राजवंश की शक्ति विभाजित होना भी था। रतनपुर कलचुरि शाखा के शासक सिंघण के कार्यकाल के पश्चात इस राजवंश की शक्ति विभाजित हो गयी। एक शाखा रतनपुर में शासन करती रही दूसरी शाखा ने रायपुर में राजधानी बनायी। इन दोनों में एकता नहीं रही। इस प्रकार परस्पर शक्ति विभाजित होने से आक्रमणकारी मराठों को प्रोत्साहन मिला। बड़े ही सहज रूप से बिना संघर्ष के भोंसले शक्ति ने छत्तीसगढ़ भू-भाग पर राज्य स्थापित कर लिया।

दोषपूर्ण सैनिक प्रबंध

छत्तीसगढ़ के कलचुरि राजवंश के शासकों का सैन्य प्रबंध दोषपूर्ण था। राज्य के पास स्थायी व नियमित सेना थी पर वह पर्याप्त नहीं थी। सामान्यतः सेना में 2000 खडग धारी, 5000 कटारधारी, 3600 बन्दूकधारी, 2600 धनुषधारी, 1000 घुडसवार तथा 216 हाथी थे। जब भी कलचुरि शासकों को अधिक बल की आवश्यकता होती थी उसकी पूर्ति मांडलिकों (जागीरदारों) द्वारा की जाती थी। यही इस राजवंश के शासकों का कमजोर पक्ष था। जब तक जागीदारों पर नियंत्रण रहा तब तक कुछ गड़बड़ी नहीं हुई परंतु ज्यों ही करद राज्यों या जागीदारों में से किसी ने अपनी सत्ता द्दढरूप से जमा ली त्यों ही मामला हाथ से बाहर निकल गया। राजा शक्तिहीन हो गया। जागीरदारी सेना पर अवलंबित रहने वाला था । कलचुरि राजवंश सेनापति भास्करपंत के एकाएक हुए आक्रमण का सामना नहीं कर पाया। उसके पास एक नियमित एवं विशाल सेना थी जिसमें रणबांकुरें एवं कुशल सैनिकों की भरमार थी। परिणामतः कलचुरि शासक ने भयभीत होकर आत्मसमर्पण कर दिया।

अयोग्य शासक व मराठा आक्रमण

भोंसले आक्रमण के समय रायपुर एवं रतनपुर के कलचुरि राजवंश की गद्दी पर क्रमशः अमरसिंह और रघुनाथ सिंह पदारूढ थे। ये दोनों शासक अयोग्य एवं अक्षम साबित हुये। अमरसिंह और राजा रघुनाथ सिंह भोंसले सेनापति भास्करपंत के आक्रमण का सामना नहीं कर पाये। दोनों ही शासक नतमस्तक हो गये। रायबहादुर हीरालाल ने लिखा है- अंतिम राजा तो इतने बलहीन और आलसी हो गये थे कि शत्रु के आते ही उन्होंने सिर नवा दिया और 1500 वर्ष के स्थाई वंश के यश को मिट्टी में मिला दिया। इसी प्रकार एक अंग्रेज अफसर ने अपनी बंदोबस्त रिपोर्ट में यह लिखा था। हैहय समान नामी नरेश्वरों के अंतिम वंशज को हाथ में तलवार लेकर रणभूमि में मर जाना श्रेष्ठ था, न कि बिल्ली के समान दुबक कर प्राण की रक्षा करना।

मोहनसिंह का षड़यंत्र एवं मराठा प्रभुत्व

मराठा प्रभुत्व की स्थापना एवं कलचुरि राजवंश की अधिसत्ता की समाप्ति में मोहनसिंह की महत्वपूर्ण भूमिका थी। रतनपुर के कलचुरि शासक राजसिंह ने निःसंतान स्थिति में रायपुर शाखा के मोहन सिंह को उत्तराधिकारी घोषित किया था। जिस समय राजसिंह की मृत्यु हुई उस समय मोहनसिंह शिकार पर गया था। अतएव मृत्यु शैय्या पर पड़े राजसिंह ने अपने पिता के चाचा सरदार सिंह को राजमुकुट पहना कर उत्तराधिकारी मान लिया। शिकार से लौटने पर मोहन सिंह को सारी स्थिति की जानकारी हुई। वह क्रुद्ध हो गया। उसने बगावत करने के लिए अपने पक्ष में गुट बनाने का प्रयत्न किया और इस कार्य में असफल होने पर वह नागपुर चला गया। मोहनसिंह रघुजी प्रथम से जा मिला तथा भोंसले शासक का प्रियपात्र बन गया। कहा जाता है कि वह मोहनसिंह भोंसले कहलाने लगा। भास्करपंत की हत्या के बाद रघुजी प्रथम को बंगाल अभियान के लिए जाना पड़ा था, उस समय मोहनसिंह उसके साथ था। यह कटु सत्य है कि मोहन सिंह रतनपुर के कलचुरि राजसत्ता से बदला चुकाना चाहता था। बहुत संभव है कि इसी आधार पर मोहनसिंह को गद्दी पर बिठाया गया था।

पराक्रमी एवं महत्वाकांक्षी सेनापति भास्करपंत ने राज्य विस्तार के लिए प्रस्थान किया। उसने मार्ग में छत्तीसगढ़ क्षेत्र पर प्रभुत्व स्थापना की दृष्टि से आक्रमण किया। तत्कालीन समय में इस भू-भाग पर कलचुरि राजवंश शासन कर रहा था। यह राजवंश शक्तिहीन एवं विभाजित था, अपना प्राचीन गौरव खो चुका था। उसमें मराठा सेनापति भास्करपंत को आगे बढ़ने से रोकने एवं पराजित करने की शक्ति नहीं थी। भास्करपंत के अभियान के समय रतनपुर कलचुरि शाखा का शासक 60 वर्षीय रघुनाथसिंह था जो कमजोर व असहाय था। अपने एकमात्र पुत्र की असमय मृत्यु से शोकाकुल था। राजा रघुनाथ सिंह ने शारीरिक एवं मानसिक रूप से अस्वस्थ्य होने के कारण मराठा आक्रमण को रोकने का तनिक प्रयत्न नहीं किया। उसने भास्कर पंत की सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। परिणामतः प्राचीन गौरवशाली हैहय कलचुरि राज्य रतनपुर पर बिना संघर्ष के भास्करपंत ने अधिकार कर लिया।राजा रघुनाथ सिंह के आत्म समपर्ण के पश्चात भोंसले सेनापति ने उसके साथ क्रूरता का व्यवहार नहीं किया। उसने रतनपुर राज्य को आतंकित करने की दृष्टि से वहां की रियासत पर एक लाख रूपया जुर्माना थोप दिया। राजकोष की सभी सम्पत्ति को हस्तगत कर लिया और कल्याण गिरि गुंसाई को मुख्तियार नियुक्त कर दिया ।

अयोग्य शासक व मराठा आक्रमण

भोंसले आक्रमण के समय रायपुर एवं रतनपुर के कलचुरि राजवंश की गद्दी पर क्रमशः अमरसिंह और रघुनाथ सिंह पदारूढ़ थे। ये दोनों शासक अयोग्य एवं अक्षम साबित हुये। अमरसिंह और राजा रघुनाथ सिंह भोंसले सेनापति भास्करपंत के आक्रमण का सामना नहीं कर पाये। दोनों ही शासक नतमस्तक हो गये। रायबहादुर हीरालाल ने लिखा है- अंतिम राजा तो इतने बलहीन और आलसी हो गये थे कि शत्रु के आते ही उन्होंने सिर नवा दिया और 1500 वर्ष के स्थाई वंश के यश को मिट्टी में मिला दिया। इसी प्रकार एक अंग्रेज अफसर ने अपनी बंदोबस्त रिपोर्ट में यह लिखा था। हैहय समान नामी नरेश्वरों के अंतिम वंशज को हाथ में तलवार लेकर रणभूमि में मर जाना श्रेष्ठ था, न कि बिल्ली के समान दुबक कर प्राण की रक्षा करना।।भास्करपंत ने राजा रघुनाथ सिंह को भोंसले शासन का प्रतिनिधि शासक नियुक्त कर रतनपुर राज्य का शासन सौंप दिया। तत्पश्चात उसकी सेना कटक विजय के लिए आगे बढ़ गई। कटक में भास्करपंत की हत्या हो गई, उसकी सेना तितर-बितर हो गई। इस खबर से रघुनाथ सिंह मराठा अधीनता से मुक्त होकर स्वतंत्र शासक बन गया। इस समय नागपुर के भोंसले शासक रघुजी प्रथम बंगाल में राज्य विस्तार के कार्य में संलग्न थे। वे सन् 1745 ई. में बंगाल से लौटते समय रीवां होते हुए रतनपुर आए। उन्होंने रघुनाथ सिंह को पदच्युत कर मोहन सिंह को गद्दी पर बिठा दिया।

राजा रघुनाथसिंह को जीवन निर्वाह के लिए 5 गांव दिए गए। वह अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह पाया था। सन् 1745ई. में ही उसकी मृत्यु हो गई। रतनपुर राज्य में मोहनसिंह का शासन सन् 1758 ई.तक चलता रहा। उसकी मृत्यु के बाद भोंसले शासन ने यहां अपना प्रत्यक्ष शासन स्थापित कर लिया। इस समय रायपुर कलचुरि शाखा का शासक अमरसिंह देव था। राजा रघुनाथ सिंह की भांति अमरसिंह ने भी मराठों को आगे बढ़ने से रोकने का प्रयत्न नहीं किया। उसने भी बिना संघर्ष व रक्तपात के आत्मसमर्पण कर दिया। मराठों ने अमरसिंह को जीविका के लिए राजिम, पाटन और रायपुर ताल्लुका सौंप दिया तथा उस पर सात हजार वार्षिक कर लाद दिया। 1753 ई. में अमरसिंह परलोक वासी हो गए, उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र शिवराजसिंह उत्तराधिकारी बना परन्तु भोंसले प्रशासन ने पूर्व प्रदत्त जागीरें छीन ली। 1757 ई. में इस शाखा में भी प्रत्यक्ष मराठा शासन स्थापित हो गया। इस प्रकार अपमानजनक ढंग से छत्तीसगढ़ प्रदेश से हैहयवंशीय कलचुरियों का प्रभुत्व समाप्त कर दिया गया, इसके स्थान पर नागपुर के भोंसले शासक का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

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