क्लाइमेट चेंज का अलार्म: सदी के अंत तक 8,000 प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर

नई दिल्ली। धरती का तापमान बढ़ रहा है, और इंसानी गतिविधियों का दायरा भी बढ़ रहा है। इन दोनों वजहों से जंगलों, घास के मैदानों और वेटलैंड्स में पनपने वाली बायोडायवर्सिटी के अस्तित्व पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है। एक नई ग्लोबल स्टडी चेतावनी देती है कि क्लाइमेट चेंज से होने वाली बहुत ज़्यादा गर्मी और ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव के कारण इस सदी के आखिर तक लगभग 8,000 प्रजातियाँ खत्म होने की कगार पर पहुँच सकती हैं। इस स्टडी का नेतृत्व ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ ज्योग्राफी एंड द एनवायरनमेंट की वैज्ञानिक डॉ. रूथ वर्डी ने किया। इसमें यूके, ऑस्ट्रेलिया और इज़राइल के वैज्ञानिकों के साथ-साथ बेंगलुरु के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के रिसर्चर गोपाल मुरली भी शामिल थे। स्टडी के नतीजे इंटरनेशनल जर्नल ग्लोबल चेंज बायोलॉजी में पब्लिश हुए हैं।
रिसर्च में लगभग 30,000 उभयचर, पक्षी, स्तनधारी और सरीसृप प्रजातियों का एनालिसिस किया गया ताकि यह समझा जा सके कि बढ़ते तापमान और ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव उनके प्राकृतिक आवास और गर्मी सहने की क्षमता को कैसे प्रभावित कर सकते हैं। डॉ. वर्डी का कहना है कि जब कई पर्यावरणीय दबाव एक साथ काम करते हैं, तो बायोडायवर्सिटी पर उनका असर कई गुना बढ़ जाता है। यही वजह है कि संरक्षण उपायों और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी के लिए तुरंत और मिलकर कदम उठाना ज़रूरी है। स्टडी के अनुसार, इस सदी के आखिर तक 7,895 प्रजातियाँ ऐसी स्थिति में पहुँच सकती हैं जहाँ उनका पूरा प्राकृतिक आवास या तो बहुत ज़्यादा गर्मी की चपेट में आ जाएगा या ज़मीन उनके लिए रहने लायक नहीं रहेगी, या दोनों संकट एक साथ आ जाएँगे। ऐसी परिस्थितियाँ उन्हें दुनिया भर में खत्म होने के खतरे में डाल सकती हैं।
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