जीवन में सफलता और प्रसन्नता के समन्वय सूत्र

Motivation| प्रेरणा: जीवन में सभी सफलता और प्रसन्नता को चाहते हैं। सफलता का विधान जहाँ उपलब्धियों से जुड़ा हुआ है, वहीं प्रसन्नता का संबंध जीवन की संतुष्टि से है। इन कसौटियों पर सफलता प्रायः एकांगी ही पाई जाती है, जिसका प्रसन्नता से अधिक तालमेल नहीं दिखता। जीवन में सफलता के चरम पर भी व्यक्ति को खिन्न, अशांत-क्लांत एवं दुःखी देखा जाता है। भौतिक एवं सांसारिक उपलब्धियों तथा अनुकूलता के बावजूद व्यक्ति को जीवन की सार्थकता की अनुभूति से वंचित पाया जाता है। सही समझ व दिशाबोध के अभाव में वे आंतरिक रिक्तता को भरने के लिए नशे, शराब व अन्य व्यसनों तक का सहारा लेते हैं और इनके चंगुल में फँसकर आत्मघाती एवं विध्वंसक पथ पर अग्रसर हो जाते हैं। जीवन ऐसी त्रासदी का शिकार न बने, इसमें सफलता और प्रसन्नता दोनों का समावेश हो, इसका संयोग जुटाना अभीष्ट हो जाता है।
ऋषिप्रणीत सूत्रों के आलोक में इसके चरणों को समझा जा सकता है। प्रथम सूत्र है, जीवन के प्रति समग्र समझ एवं इसके आंतरिक तथा बाह्यस्वरूप के प्रति जागरूकता, जो आत्मचिंतन, स्वाध्याय एवं महापुरुषों के सत्संग से प्राप्त होती है। समझ आता है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। इसके साथ जीवन के समग्र विकास की रूपरेखा तैयार होती है, भौतिक के साथ जीवन का आध्यात्मिक पक्ष संतुलित होता है। स्वयं के विकास के साथ परिवार, समाज-राष्ट्र एवं पूरे विश्व के उत्कर्ष का भाव विकसित होता है, जीवन के समग्र उत्कर्ष की समझ स्पष्ट होती है। इसी के साथ स्वार्थ एवं परमार्थ के संगम- समन्वय की पृष्ठभूमि तैयार होती है।
इसके बाद प्रारंभ होता है जीवनलक्ष्य का निर्धारण एवं इसको मूर्तरूप देने की कवायद, जिसका स्वर्णिम सूत्र रहता है- जहाँ खड़े हैं, वहीं से आगे बढ़ें, जो हाथ में है, उसी को साथ ले मंजिल की ओर चल पड़ें। लक्ष्य निर्धारण में यह ध्यान अवश्य रहे कि अपनी रुचि क्या है, प्रकृति व स्वभाव के अनुकूल लक्ष्य का कितना मेल है तथा अपनी क्षमता इसके अनुरूप कैसी है। यदि क्षमता नहीं है, तो उसे विकसित किया जा सकता है। साथ ही समय की माँग क्या है-इन सबका अपने आत्मिक उत्साह या जुनून के साथ मेल हो सके, तो पग उस दिशा में चल पड़ते हैं, जहाँ बाह्य सफलता एवं आंतरिक संतुष्टि सुनिश्चित हो जाती हैं।
इसी के साथ अनुसरित होती है दैनिक आधार पर अपने लक्ष्य को अंजाम देने की क्षमता एवं सामर्थ्य; जिस क्रम में समय के हर पल, हर मिनट एवं हर घंटे का श्रेष्ठतम सदुपयोग किया जाता है और यह सुनिश्चित होता है प्राथमिकताओं की स्पष्टता के आधार पर। अतः प्रातः उठते ही आत्मबोध के साथ दिनभर के महत्त्वपूर्ण कार्यों की सूची बनाई जाती है, उनको क्रमबद्ध किया जाता है और फिर प्राथमिकता के आधार पर इन्हें अंजाम दिया जाता है। महत्त्वपूर्ण एवं तात्कालिक कार्यों को पहले निपटाया जाता है, तात्कालिक रूप से कम महत्त्वपूर्ण किंतु दूरगामी परिणाम वाले कार्यों को इसके उपरांत स्थान दिया जाता है। जो गैर-महत्त्वपूर्ण किंतु तात्कालिक कार्य आते हैं, उनमें दूसरों की मदद ली जा सकती हो, उन्हें दूसरों को सौंपा जा सकता है।
गैर-महत्त्वपूर्ण एवं समय व ऊर्जा को नष्ट करने वाले कार्यों से बचा जाता है। इस तरह हर पल का श्रेष्ठतम उपयोग करते हुए निर्धारित लक्ष्य को साकार करने की दिशा में बढ़ा जाता है। इसके साथ ही संभव होता है, सकारात्मक विचार एवं भावों का संप्रेषण, जिसमें स्वयं के साथ दूसरों का भी हित सधता हो; क्योंकि अपने ध्येय की ओर बढ़ते कदम व्यक्ति को रचनात्मकता के उर्वर स्रोत से जोड़ते हैं, जहाँ सृजन की असीम संभावनाएँ हिलोरें मार रही होती हैं। ऐसे में व्यक्ति जीवन के प्रति आशा, उत्साह से भरा होता है। स्वयं के साथ दूसरे सुपात्रों के उत्कर्ष की सोच रखता है, जरूरतमंदों की मदद करता है तथा एक उद्देश्यपूर्ण समुदाय का हिस्सा बनते हुए, अपना सार्थक योगदान देता है। इसी पृष्ठभूमि में संभव होता है दूसरों के प्रति संवेदनशील व्यवहार।
दूसरों की स्थिति को समझ पाना, उनके दुःख-दरद, वेदना व आवश्यकता का बोध तथा इनके निराकरण के लिए अपना यथासंभव योगदान देना और नहीं तो सांत्वना एवं उत्साहवर्द्धन के दो आत्मीय बोल पीड़ित के घाव पर मलहम का काम करते हैं; उसके मानसिक संताप को हलका करते हैं। व्यवहार में निष्काम सेवा के ऐसे प्रयोग चित्त को शुद्ध करते हैं, व्यक्ति की भाव-प्रवणता को और फिर प्राथमिकता के आधार पर इन्हें अंजाम दिया जाता है। महत्त्वपूर्ण एवं तात्कालिक कार्यों को पहले निपटाया जाता है, तात्कालिक रूप से कम महत्त्वपूर्ण किंतु दूरगामी परिणाम वाले कार्यों को इसके उपरांत स्थान दिया जाता है।
जो गैर-महत्त्वपूर्ण किंतु तात्कालिक कार्य आते हैं, उनमें दूसरों की मदद ली जा सकती हो, उन्हें दूसरों को सौंपा जा सकता है। गैर-महत्त्वपूर्ण एवं समय व ऊर्जा को नष्ट करने वाले कार्यों से बचा जाता है। इस तरह हर पल का श्रेष्ठतम उपयोग करते हुए निर्धारित लक्ष्य को साकार करने की दिशा में बढ़ा जाता है। इसके साथ ही संभव होता है, सकारात्मक विचार एवं भावों का संप्रेषण, जिसमें स्वयं के साथ दूसरों का भी हित सधता हो; क्योंकि अपने ध्येय की ओर बढ़ते कदम व्यक्ति को रचनात्मकता के उर्वर स्स्रोत से जोड़ते हैं, जहाँ सृजन की असीम संभावनाएँ हिलोरें मार रही होती हैं। ऐसे में व्यक्ति जीवन के प्रति आशा, उत्साह से भरा होता है। स्वयं के साथ दूसरे सुपात्रों के उत्कर्ष की सोच रखता है, जरूरतमंदों की मदद करता है तथा एक उद्देश्यपूर्ण समुदाय का हिस्सा बनते हुए, अपना सार्थक योगदान देता है।
इसी पृष्ठभूमि में संभव होता है दूसरों के प्रति संवेदनशील व्यवहार। दूसरों की स्थिति को समझ पाना, उनके दुःख-दरद, वेदना व आवश्यकता का बोध तथा इनके निराकरण के लिए अपना यथासंभव योगदान देना और नहीं तो सांत्वना एवं उत्साहवर्द्धन के दो आत्मीय बोल पीड़ित के घाव पर मलहम का काम करते हैं; उसके मानसिक संताप को पुष्ट करते हैं। एक तरह से उनकी इमोशनल इंटेलीजेंस बढ़ती है, समूह एवं समाज में स्वीकार्यता में वृद्धि होती है। व्यक्तित्व में विश्वसनीयता एवं प्रामाणिकता का पुट जीवन में सफलता के नए अवसरों का सृजन करता है। इस तरह व्यक्ति आत्मकल्याण एवं लोकसेवा के पथ पर बढ़ते हुए बाह्य उपलब्धियों के साथ आंतरिक उत्कृष्टता की राह पर अग्रसर होता है -तथा व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में सफलता एवं संतुष्टि के नए स्तर को प्राप्त होता है।
जीवन – की गुणवत्ता में वृद्धि होती है और व्यक्ति जीवन में – सार्थकता की गहरी अनुभूति के साथ अनुप्राणित होता है। अपने सजग प्रयास-पुरुषार्थ से वह जीवन के हर पक्ष को साधता है और व्यक्तित्व के हर आयाम को नित्य परिशोधित-परिष्कृत करता है। नित्य अपने शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक आयामों के प्रति जागरूकता, इनका सांगोपांग विश्लेषण एवं परिमार्जन जीवन को सफलता एवं प्रसन्नता की नई ऊँचाइयों की ओर ले जाता है। इनको लेकर किए गए नैष्ठिक प्रयास आंतरिक एवं बाह्य जीवन को उत्कर्ष के नए मुकाम की ओर ले जाते हैं, जो जीवन में सफलता के साथ आकांक्षित संतुष्टि एवं प्रसन्नता के संगम- समन्वय को सुनिश्चित करते हैं।
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अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा।
एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तम भून्मनः ॥
अर्थात अर्थ, काम और सुकृत कर्म बहुत हो जाने पर भी इस संसार रूपी जंगल में चित्त शांत नहीं होता। अर्थात चित्त मात्र निष्काम कर्म करने पर ही शांत होता है।
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