प्रेरणा

भारत और इंडोनेशिया का सांस्कृतिक संबंध

 Motivation| प्रेरणा:   वेदों में उद्धृत मंत्र-सा प्रथमा संस्कृति- र्विश्ववारा भारतीय संस्कृति की पुरातनता का उद्घोष करता है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि मनुष्य को संस्कारित करने वाली देव संस्कृति का उद्भव इस पुण्यभूमि से हुआ और इसका विस्तार विश्वव्यापी रहा। काल के थपेड़ों के बीच यह प्रभाव अवश्य सिमटता गया, लेकिन इसके अवशेष अभी भी अपनी पुख्ता उपस्थिति दर्ज करते हैं। विश्व में सबसे अधिक मुसलिम आबादी वाला देश इंडोनेशिया इसका एक जीवंत उदाहरण है।  लगभग 17 हजार छोटे-बड़े द्वीप समूह से बना यह देश, 28 करोड़ आबादी और 19 लाख वर्गकिमी क्षेत्रफल के साथ विश्व का चौथा सबसे अधिक आबादी वाला देश तथा तीसरा सबसे बड़ा लोकतंत्र है। साथ ही 87 प्रतिशत मुसलिम आबादी के साथ विश्व का सबसे बड़ा मुसलिम देश भी है।

                 इस सबके बावजूद इस देश के जीवन में भारतीय संस्कृति की अंतर्धारा को प्रवाहित देखा जा सकता है। इंडोनेशिया और भारत के बीच रामायणकाल से संबंध माने जाते हैं। यवद्वीप अर्थात जावा का उल्लेख भारत के महाकाव्य रामायण में मिलता है। भगवान राम की सेना के प्रमुख सुग्रीव ने अपनी सेना को सीता माता की खोज के लिए यवद्वीप भेजा था। इसके साथ प्राचीनकाल से इंडोनेशिया और भारत के बीच समुद्री व्यापार होता रहा है। इंडोनेशियाई भाषाओं में बड़ी संख्या  में संस्कृत शब्दों की उपस्थिति भारतीय प्रभाव को स्पष्ट करती है। वस्तुतः भारत से पल्लव लिपि और संस्कृत भाषा को अपनाने के बाद इंडोनेशिया ने अपने ऐतिहासिक काल में प्रवेश किया, जो कि इंडोनेशिया के सबसे पुराने राज्यों जैसे कुताई के यूपा, तरुमानगर के तुगु और कलिंग के ऐतिहासिक अभिलेखों से प्राप्त हुए कुछ प्रारंभिक शिलालेखों से प्रमाणित होता है। 

              इंडोनेशिया शब्द देश के स्वतंत्र गठन से बहुत पहले 18वीं शताब्दी का है। इंडोनेशिया का नाम ग्रीक भाषा का है, जो इंडो और नेसो शब्दों को जोड़कर बनाया गया है। इंडो लैटिन शब्द इंडस से बना है, जिसका अर्थ है- भारत और नेसो ग्रीक शब्द है, जिसका अर्थ है- द्वीप । इस तरह इंडोनेशिया का अर्थ भारत के द्वीप के रूप में है, जहाँ चिरकाल तक भारतीय सभ्यता की जड़ गहराई तक जमी रही है। इन द्वीपसमूहों का इतिहास पिछले दिनों तक ईस्ट इंडीज कहा जाता रहा है। ईस्ट इंडीज अर्थात पूर्वी भारत। जिस प्रकार अब उत्तर भारत और दक्षिण भारत एक होते हुए भी उसकी भौगोलिक जानकारी के लिए उत्तर-दक्षिण का प्रयोग करते हैं, उसी तरह किसी समय विशाल भारत का पूर्वी छोर इंडोनेशिया तक फैला हुआ था। उनके मध्य में आने वाले देश भी भारत के ही अंग थे और इंडोनेशिया के भारत के साथ प्रगाढ़ संबंध थे।

            इंडोनेशिया में श्रीविजय युग के दौरान कई इंडोनेशियाई लोगों ने भारत में नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था। पूज्य गुरुदेव के शब्दों में, इस द्वीपसमूह की पुरातत्त्व उपलब्धियों और अर्वाचीन परंपराओं को देखने से स्पष्ट है कि वहाँ भारतीय संस्कृति की गहरी छाप है। * वहाँ के इतिहास से ही यह तथ्य सामने आता है कि किसी जमाने में यह देश भारतीय उपनिवेश रहा है। वहाँ भारतीय पहुँचे हैं, उन्होंने अपना वंश- विस्तार किया है और इस भूमि को खोजा, बसाया और विकसित किया है। पीछे भारत से संबंध छूट जाने के कारण वहाँ पहुँचे अरबों के प्रभाव और दबाव में आकर वहाँ के निवासियों ने इसलाम धर्म स्वीकार कर लिया।

                      फिर भी संस्कृति में भारतीयता का गहरा पुट बना ही रहा, जो अब तक विद्यमान है। पूज्यवर के शब्दों में, ईसा से लगभग 300 वर्ष पूर्व पाटलिपुत्र का कोई राजकुमार वहाँ पहुँचा और इन द्वीपसमूहों में से कितने ही द्वीपों को उसने नए सिरे और नए ढंग से बसाया था। तब से भारतीयों का उस क्षेत्र में आना-जाना बना ही रहा। पीछे भगवान बुद्ध के शिष्यों ने वहाँ पहुँचकर बौद्ध धर्म का प्रचार किया, किंतु इससे पहले शताब्दियों तक हिंदू धर्म का ही प्रसार-विस्तार होता रहा और उस द्वीपसमूह के प्रायः सभी निवासी हिंदू धर्मावलंबी बने रहे। धर्म से मुसलिम होते हुए भी इंडोनेशियावासियों की संस्कृति में रामायण और महाभारत के लिए श्रद्धा का गहरा पुट है। उनके नाम अभी भी रत्नदेवी, लक्ष्मी, सीता, द्रौपदी, मेघवती, कार्तिकेय, सुकर्ण, सुव्रत, सुजय आदि पाए जाते हैं। 

                  मुसलमान होते हुए भी यहाँ इनके रामायण नाम से होटल विद्यमान हैं। इंडोनेशिया के प्रथम शिक्षामंत्री यासीन ने उस देश का विस्तृत इतिहास ताता नगरा मजहित सप्त पर्व नाम से लिखा है, जिसमें रामायण को उस देश की सांस्कृतिक गरिमा के रूप में स्वीकार किया है। इसी तरह महाभारत इंडोनेशिया के जनमानस में विशिष्ट स्थान रखता है। महाभारत पर आधारित देवरुचि, अर्जुन-विवाह, काकविन, द्रौपदी स्वयंवर, अभिमन्यु-वध आदि कितने ही कथानक भी यहाँ की नाट्य परंपराओं में सम्मिलित हैं। आश्चर्य नहीं कि इंडोनेशिया के अनेक नगरों के नाम अभी भी भारतीय नगरों के समान हैं, जैसे- अयोध्या, हस्तिनापुर, तक्षशिला, गांधार, विष्णुलोक, लवपुरी, नगर प्रथम आदि । भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ इंडोनेशिया निवासियों के श्रद्धापात्र हैं। उनके नाम से गरुड़ एयरवेज कंपनी चलती है। 

                  यहाँ के पंडान कस्बे की दुकानों के नाम अर्जुन, नकुल, लक्ष्मण आदि पर हैं। एक एक्सप्रेस गाड़ी का नाम भीम है। हनुमान, रावण, जटायु आदि के मुखौटे जहाँ-तहाँ बिकते देखे जा सकते हैं। जोग्या कार्ता का प्राचीन शिवालय 140 फुट ऊँचा है। इसमें 16 बड़े और 240 छोटे मंदिर सम्मिलित हैं, भूचाल से ध्वंस होने पर भी जो कुछ बचा है, वह भी अत्यधिक हृदयग्राही है। रामायण अभिनयों में जोग्या के सुल्तान की पुत्रियाँ सीता और त्रिजटा का अभिनय करती हैं। इस तरह दोनों देशों के संबंध लगभग हजारों वर्ष पुराने हैं। सन् 1927 में जावा और बाली की यात्रा के दौरान भारतीय कवि रवींद्रनाथ टैगोर, बाली के मंदिरों को देख इतने अविभूत हुए थे कि उन्होंने कहा था कि मैं जहाँ भी द्वीप पर जाता हूँ, मुझे भगवान दिखाई देते हैं। इसके 23 वर्ष बाद सन् 1950 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बाली को दुनिया की सुबह कहा था। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्ण ने एक समय पं. जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र में लिखा था- इंडोनेशिया और भारत की जनता रक्त और संस्कृति के पवित्र एवं सुदृढ़ धागों से परस्पर मजबूती के साथ बँधी है। आश्चर्य नहीं कि सन् 1950 में भारत के वार्षिक गणतंत्र परेड में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो पहले मुख्य अतिथि थे। भारत और इंडोनेशिया के बीच आधिकारिक रूप से 3 मार्च, 1951 से राजनयिक संबंध खुलते हैं। 

             सन् 1955 में भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंडोनेशियाई राष्ट्रपति सुकर्णो गुटनिरपेक्ष आंदोलन के पाँच संस्थापकों में से थे। सन् 1950 में इंडोनेशिया के पहले राष्ट्रपति सुकर्णो ने इंडोनेशिया और भारत के लोगों से सौहार्दपूर्ण संबंधों को प्रगाढ़ करने का आवाह्न किया था, जो औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा बाधित होने से पहले दोनों देशों के बीच हजारों वर्षों से विद्यमान थे। 7 सितंबर, 1971 में इंडोनेशिया ने विश्व का सर्वप्रथम अंतरराष्ट्रीय रामायण महोत्सव आयोजित किया और जिसमें राष्ट्रसंघ का पूरा सहयोग रहा। इसमें दर्जनों देशों की भागीदारी रही। रामलीला की कितनी शैलियाँ प्रचलित हैं और उनकी अपनी-अपनी कितनी विशेषताएँ हैं, उसे देखकर आगंतुक मंत्रमुग्ध रह गए। इस विश्व मेले में 300 कलाकारों और 20 हजार दर्शकों ने भाग लिया। आज भारत और इंडोनेशिया विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से हैं। दोनों जी-20, जी-7 देशों, गुट निरपेक्ष आंदोलन और संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश हैं। हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार, इंडोनेशिया के अधिकांश नागरिक भारत के प्रभाव को सकारात्मक रूप से देखते हैं। दोनों देशों में कई समानताएँ हैं। मुसलिम बहुल आबादी होने के बावजूद इंडोनेशिया भारत के समान एक धर्मनिरपेक्ष देश है। इंडोनेशिया के लोग रामायण, महाभारत के प्रति श्रद्धाभाव रखते हैं और योगेश्वर श्रीकृष्ण, धनुर्धर अर्जुन तथा वैदिक साहित्य में वर्णित विभूतियों के प्रति श्रद्धा रखते हैं। इंडोनेशिया का द्वीप बाली तो हिंदू बहुल है, जहाँ के निवासी भारत से उस देश में आकर बसे लोगों की संतानें नहीं हैं, अपितु वहाँ के मूल निवासी हैं, जिन्होंने सैकड़ों वर्ष पहले हिंदू या बौद्ध धर्म अपनाया। 

       दोनों देशों के बीच हजारों वर्षों से चले आ रहे सांस्कृतिक संबंधों का एक प्रमाण यहाँ की राजभाषा है, जो मलय और भारतीय भाषाओं के मिश्रण से उत्पन्न मानी जाती है। यहाँ की मुख्य मुद्रा भी रुपिया है, जो भारत के रुपये के अनुरूप है। उनकी भाषा को भाषा इंडोनेशिया कहा जाता है। स्वर्ग, नरक जैसे उनके कई शब्द भारत से मिलते हैं। इंडोनेशिया के पारिवारिक और सामुदायिक जीवन के अनेक परंपरागत रीति-रिवाजों का प्रेरणास्त्रोत सनातन धर्म ही है। बाली में हिंदू मंदिरों की संख्या लगभग 5-6 हजार बताई जाती है। यहाँ की महिलाओं में धर्म के प्रति आस्था का भाव भारत जैसा ही है। आज भी दोनों देशों के सुदृढ़ राजनयिक संबंधों के साथ यहाँ के सांस्कृतिक संबंध सूत्र प्रगाढ़ हैं। निस्संदेह सांस्कृतिक टकराहट से भरे इस युग में धर्म की भिन्नता के बावजूद इंडोनेशिया और भारत की सांस्कृतिक एकता के संबंध सूत्र विश्वशांति एवं सौहार्द की दिशा में मानक एवं प्रेरक हैं।  

इक्कीसवीं सदी नारीप्रधान होगी। उसकी भूमिका हर क्षेत्र में नर से कहीं अधिक बढ़-चढ़कर होगी। अतएव प्रयत्न यह होना चाहिए कि उसे शिक्षा, स्वास्थ्य और तेजस्विता की दृष्टि से उपयुक्त स्तर तक पहुँचाया जाए। – परमपूज्य गुरुदेव

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