सघन आत्मीयता का विकास

Motivation| प्रेरणा: कितने ही शाकाहारी और मांसाहारी पशु वहाँ फिरा करते थे। पहले उनसे डर लगता था। अब नई दृष्टि से वे एक ही गाँव, मुहल्ले में रहने वाले साथी-सहचर से दिखने लगे। डरने की बात छूटी, विश्वास बढ़ा, परिचय के साथ ममत्व भी विकसित हुआ। जिनके निवास समीप थे, उनसे घनिष्ठता बढ़ी, उनके नाम रख लिए। यह देखा कि जिस आकृति वाले पशु को जो नाम दिया था, वह उसने बिना सिखाए-पढ़ाए जान लिया। अक्सर आवाज देकर बुलाने पर वही पशु समीप आ जाता, जिसका नाम लिया गया था। इस तरह छह सप्ताह व्यतीत होते-होते सारा पशु परिवार मनुष्य जैसा घनिष्ठ हो गया। वे आते घंटों पास बैठे रहते, धूप सेंकते रहते। उन्हें खुजलाने, सहलाने, नहाने में सहयोग दिया तो उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। हिंस्र पशु भी आने लगे।
एक मादा रीछ तो बहुत ही हिल गई। वह अपने छोटे बच्चों को झोंपड़ी के पास छोड़कर आहार की तलाश में चली जाती। बच्चे अपने पास खेलते-उछलते रहते। पहले उस क्षेत्र में मांसाहारी पशु, शाकाहारियों को आएदिन मारते-खाते रहते थे, पर जितने दिन अपना रहना उधर हुआ एक भी ऐसी घटना नहीं हुई। लगा कि उन सबने हमारे साथ ही नहीं, परस्पर भी कौटुंबिकता और सद्भावनाओं को अपना लिया है। पक्षियों के प्रति भी यही दृष्टि विकसित हुई तो वे भी उन छोटे बच्चों की तरह वहीं आस-पास फुदकने लगे। दूर रहने वालों ने अपने घोंसले पास की झाड़ियों में बना लिए। झोंपड़ी घोंसलों से भर गई, रात को उसमें दर्जनों पक्षी विश्राम करते। खरगोश, लोमड़ी जैसे छोटे जानवरों ने तो मानो इसे अपना घर ही मान लिया हो। रात को वे उसी में घुस पड़ते और शीत से बचने के लिए परस्पर ही सटकर बैठते। पशु-पक्षियों तक ही यह दृष्टि सीमित न रही, वरन मेंढ़क, गिरगिट, गिलहरी, चींटी, झींगुर, तितली जैसे छोटे जीवों ने भी इस आत्मीयता के दृष्टिकोण को पहचाना और स्वीकार किया। वे पास बैठते और इर्द-गिर्द चक्कर लगाने में प्रसन्नता अनुभव करते। पीछे तो वृक्ष और झाड़ियाँ भी भाई-भतीजे जैसे लगने लगे।
वे अपने स्थान पर से हट तो नहीं सकते थे, पर दीखते ऐसे थे मानो हमारी सुरक्षा के प्रहरी तथा शुभचिंतक के रूप में खड़े ड्यूटी दे रहे हों। सद्भावना उनमें भी प्रतिध्वनित होती देखी । झरने के पास जब बैठते तो तरह-तरह की भावुकता भरी दिव्य संवेदनाएँ अनायास ही मन में से उठतीं और लगता मानो वे कभी संत, तपस्वी, ब्रह्मज्ञानी की तरह अपनी मूक वाणी से हमें अंतःकरण को पुलकित करने की कवित्व जैसी संवेदनाएँ प्रदान कर रहे हैं। उन स्थानों से उठने को जी न करता। दृष्टिकोण के इस नए परिवर्तन से सारा वन्य प्रदेश सुनसान न रहकर कोलाहल भरा प्राणिसंकुल दिखने लगा। यह एक नया ही लोक था। मनुष्यों में पाई जाने वाली धूर्तता और दुष्टता का जहाँ नाम- निशान नहीं। सूनेपन के कारण जो भय पहले लगा करता था, इस बार तनिक भी नहीं लगा, वरन यह प्रतीत होता-दुष्ट मनुष्य की तुलना में यह वन्यलोक कहीं अधिक शांत, सात्त्विक एवं उत्कृष्ट है।
यह गाथा पुरानी है कि बालक भरत सिंहनी के बच्चों को खिलाने के लिए पकड़ ले जाता था। शिवाजी ने सिंहनी का दूध दुहा था। संत ज्ञानेश्वर ने भैंसे से वेदमंत्र भी उच्चारण कराए थे। ऋषियों के आश्रमों में गाय और सिंह एक ही घाट पर पानी पीते थे। नई अनुभूति गुरुदेव की है कि यदि अपनी आत्मा में भय, शंका, अविश्वास, द्वेष, परायापन न हो, आत्मीयता की निष्ठा अति प्रगाढ़ हो तो मनुष्य जैसे संवेदनशील प्राणी द्वारा अविकसित पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं में भी कौटुंबिकता विकसित की जा सकती है। उन दिनों जब वे लौटे तब मथुरा में भी यही कौतुक हजारों ने देखा। उनकी थाली में चिड़िया, चुहिया, गिलहरियाँ भोजन साथ-साथ करतीं। जहाँ उन्होंने आवाज लगाई कि यह सारा जंतु परिवार एकत्रित हुआ।
एक सज्जन साथ बैठे थे। छोटी चुहिया उन्हीं की थाली में घुस पड़ी। उनने चुहिया को तो नहीं भगाया, पर रोटी हाथ में लेने के लिए ऊपर उठाई। चुहिया रोटी से लटक गई, पर रोटी नहीं छोड़ी। इतनी निर्भयता और आत्मीयता तो * उन्होंने घरेलू प्राणियों में पैदा कर ली थी। वन में भी उन्हें वैसा ही कौटुंबिक वातावरण जीव-जंतुओं के साथ मिला इसमें आश्चर्य की कोई बात नही है। आत्मीयता का उत्कृष्ट प्रवाह अपने साथ किसी को कहीं बहा ले सकने में समर्थ हो सकता, फिर भले ही वे पशु-पक्षी या कीट-पतंग ही क्यों न हों। यह हिमालय पिता का ही अनुदान था, जिसने ज्ञानचक्षु खोले और आत्मा के सर्वव्यापी होने का आभास कराया। इस आभास के कारण सर्वत्र आत्मीयता बिखरी और उसकी प्रतिक्रिया समस्त चेतन जगत् की सद्भावना अपने प्रति बरसने लगी।
इससे आंतरिक आनंद एवं संतोष असंख्य गुना बढ़ गया और साथ ही आत्मबल भी विकसित होता चला गया। यह आत्मीयता का विकास ही है, जिसने लाखों व्यक्तियों को मजबूत रस्सी के साथ जकड़कर उनके साथ बाँध दिया है। विद्वत्ता, प्रतिभा, भाषण, लेखन, संगठन, आंदोलन, प्रतिपादन आदि बहुत छोटे आधार हैं। यह कला दूसरों को भी अच्छी तरह आती है, पर वे उतना सघन कुटुंब कहाँ बना पाते हैं? उनकी कला भर आकर्षण का केंद्र बनी रहती है। ऐसे व्यक्तित्व किसी को घनिष्ठ आत्मीयता में बाँध लेने और किसी से कोई साहसपूर्ण कार्य करा सकने में समर्थ नहीं होते। गुरुदेव ने हिमालय के वातावरण में अंतर्मुखी होकर प्रकृति के कण-कण में सन्निहित दिव्यता को पढ़ा, समझा और असली शिक्षा जिसने उन्हें मात्र विद्वान ही नहीं बना रहने दिया, वरन तत्त्वदर्शी के स्तर तक पहुँचा दिया।
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अध्यात्म बल का संपादन कठिन नहीं, वरन सरल है। उसके लिए आत्मशोधन एवं लोक-मंगल के क्रियाकलापों को जीवनचर्या का अंग बना लेने भर से काम चलता है। व्यक्तित्व में पैनापन और प्रखरता का समावेश इन्हीं दो आधारों पर बन पड़ता है। यह बन पड़े तो दैवी अनुग्रह अनायास बरसता है और आत्मबल अपने भीतर से ही प्रचुर परिमाण में उभर पड़ता है।
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