प्रेरणा

देवशक्तियां

 Motivation| प्रेरणा:  देवशक्तियाँ वस्तुतः प्राण-ऊर्जा का ही एक रूप हैं। भौतिक जगत् में व्याप्त क्रियाशीलता उनकी आधिभौतिक अभिव्यक्ति है तो वहीं परोक्ष जगत् में प्रसारित चेतनात्मक ऊर्जा उनकी आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है। किसी भी वस्तु की उपस्थिति तीन आयामों में होती है। जिस तरह मानवीय शरीर को स्थूल, सूक्ष्म व कारण रूपों में विद्यमान माना गया है, उसी तरह से देवशक्तियाँ भी आधिदैविक, आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक आयामों में अपना कार्यक्षेत्र बनाती हैं। देवों को प्रजापति की अतिसृष्टि कहा गया है; क्योंकि सृष्टि का क्रम इनके उपरांत हुआ माना जाता है। अमृतों की पाँच कोटियाँ हैं और इन पंचामृत के पाँच देव वर्ग हैं। 

           पहला वर्ग वसुगण का है और वे अग्निमुख द्वारा अमृत धारण करते हैं। रुद्रगण- इंद्र के माध्यम से, आदित्यगण – वरुणदेव के माध्यम से, मरुद्गण- सोमदेव के माध्यम से एवं साध्यगण-ब्रह्मरूपी मुख से उस अमृत-वर्षा को प्राप्त करते हैं जो देवशक्तियों को चेतनता प्रदान करती है। इन पाँच प्रद्यप देव वर्गों के अतिरिक्त अश्विनीकुमारों को और विश्वेदेवा को भी इसी श्रेणी में लिया जाता है। अश्विनीकुमार देवताओं के वैद्य हैं तो वहीं विश्वेदेवा देवताओं की सबसे ऊँची कोटि है, जिन्हें अतिसूक्ष्म चिन्मय शक्तियों के रूप में स्वीकारा जाता है। आदित्य को विश्व का नेत्र कहकर पुकारा गया है तो वहीं वसु-शब्द-संवाहक एवं शब्द- प्रदाता के रूप में गिने जाते हैं। अपनी तेजस्विता से भस्मीभूत कर देने वाली शक्ति रुद्रगणों की है तो वहीं तीक्ष्ण भेदन की सामर्थ्य से संपन्न वायु के देवता मरुद्गण हैं।

                  साध्यगण और भी अधिक सूक्ष्मतर ऊर्जा के स्वामी हैं। अश्विनीकुमारों का कार्य प्रसरण, विसरण या फैलना है और वे देवगणों की श्रेष्ठता के स्तर को सुरक्षित रखने का कार्य करते हैं। विश्वेदेवा, वस्तुतः श्रेष्ठतम देवशक्तियाँ हैं, जो अंतरिक्ष के अज्ञात प्रदेशों से आती हैं। इस तरह देवशक्तियाँ अंतरिक्ष में व्याप्त -चेतनता का प्रतीक हैं। बिना श्रद्धा के उन – देवसत्ताओं की अनुभूति कर पाना संभव नहीं हो पाता और न ही उनके अनुदानों को प्राप्त कर पाना संभव हो पाता है। श्रद्धा ही उन देवशक्तियों – से हमें जोड़ती है। 

  अतीतानागतान् सर्वान् पितृवंशांस्तु तारयेत् । 

कान्तारे वृक्षरोपी यस्तस्माद् वृक्षांस्तु रोपयेत् ॥

     अर्थात जो वीरान एवं दुर्लभ स्थानों में वृक्ष लगाता है, वह अपनी बीती और आने वाली पीढ़ियों को तार देता है। इसलिए वृक्ष अवश्य लगाना चाहिए।

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