हिमालय की दिव्यता

Motivation| प्रेरणा: हिमालय को वे जड़ नहीं चेतन मानते हैं। उमा-महेश से लेकर अन्य देवताओं की सघनता उस क्षेत्र में विद्यमान है, ऐसा वे अनुभव करतें हैं। जब-जब वे वहाँ जाते हैं कुछ ऐसे विचित्र अनुभव सुनाते हैं, जिससे वहाँ देवसत्ता की प्रत्यक्ष उपस्थिति पर विश्वास करना पड़ता है। एक बार कुछ जड़ी-बूटियों की खोज में रास्ता भटक गए और अपने स्थान से बहुत दूर संभवतः 20 मील आगे निकल गए। रात हो गई। हिंस्र पशुओं की आवाज गूंजने लगी। ऐसे समय में एक मनुष्य जैसा शरीर उन्हें हाथ पकड़कर आधे घंटे में ही यथास्थान पहुँचा गया। एक बार वर्षा के पानी से उनका निवास एक ओर से घिर गया। खाद्य पदार्थ समाप्त। इसी समय एक मनुष्य का दिखना और हाथ के इशारे से – जमीन खोदने का इशारा करना। –
खोदा जाना और वहाँ से एक बीस सेर भारी – एक ऐसे मीठे और स्वादिष्ट कंद का निकलना, – जिस पर भली प्रकार निर्वाह किया जा सके। हिंस्त्र – जंतुओं से आएदिन मुकाबला होते रहना, पर कुछ दुर्घटना न घटना। एक बार किसी विपत्तिग्रस्त को सारे पैसे दे – दिए। पास में कुछ भी न रहा। दूसरे दिन सिरहाने कामचलाऊ धन मिल जाना। उस क्षेत्र में निवास करने वाली दिव्य आत्माओं का आभास और उनसे भेंट करने का सुयोग आदि एक-से-एक बढ़कर ऐसे अद्भुत अनुभवों की श्रृंखला उस हिमप्रदेश की है, जिसे सुनते जादू-तिलस्म जैसे कथा-प्रसंग का रस आता है; पर उसमें अत्युक्ति की बात तनिक भी नहींउनका उच्च व्यक्तित्व, कुतूहलवर्द्धक गाथाएँ गढ़कर किसी को भ्रमित करने की चेष्टा करेगा यह तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिर भी वे प्रसंग उन्होंने किसी को बताए भी तो नहीं।
वे सिर्फ उन्हें ही विदित थे, जिनमें से कुछ की एक हलकी-सी झाँकी इसलिए प्रस्तुत करनी पड़ी – कि हिमालय की दिव्यता को समझा जा सके और उस खदान से बहुमूल्य रत्नों को उत्खनन करने का अन्य आत्मविद्या प्रेमियों को भी लाभ मिल सके। इन दिनों वे फिर इसी क्षेत्र में हैं। लगता है वे भविष्य में भी वहीं से निरंतर दिव्य उपलब्धियाँ प्राप्त करने और सर्वसाधारण तक पहुँचाने का कार्य करेंगे। प्रतिबंधित अवधि तो वसंत पर्व तक की थी। इसके बाद उनका उभयपक्षीय कार्यक्रम यही है-बादलों की तरह समुद्र से पानी लाना और खेतों पर बरसाना। हरिद्वार का मध्य केंद्र उनके इस ध्येय को पूरा करते रहने के लिए ही तो बना है। वे हर वसंत पर बहुत कुछ प्राप्त करते रहे हैं और आगे के लिए अधिक दुस्साहसपूर्ण कदम बढ़ाते रहे हैं। उन्हें अपने पिता पर, हिमालय पर कितना गर्व, कितना विश्वास और कितना अवलंबन है, इसे समझने पर ही उनकी हिमालय प्रीति का अनुमान लगा सकना संभव हो सकता है।
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