सूक्ष्म में प्रवेश

MOTIVATION: विगत अंक में आपने पढ़ा कि अपनी मार्गदर्शक सत्ता द्वारा दिए गए संकेत के आधार पर पूज्य गुरुदेव ने क्षेत्रों में प्रवास कार्यक्रमों एवं भेंट के क्रम पर थोड़ी रोक लगाई थी व अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों को करने में जुट गए थे। अपने पूज्यवर के आगमन की आस सँजोए क्षेत्र के कार्यकर्त्तागणों का भावुक मन पूज्य गुरुदेव के इस क्रम में हुए परिवर्तन को स्वीकारने में समर्थ न हुआ। परिजनों में कुछ तो अनुनय लेकर शांतिकुंज आ पहुँचे। वर्तमान परिस्थितियों की विभीषिका के समुचित निराकरण के कार्यों को प्राथमिकता दिया जाना अधिक महत्त्वपूर्ण था और यही कारण था कि पूज्य गुरुदेव ने अब भेंट-परामर्श के क्रम को लगभग समाप्त कर दिया। आगंतुकों की मनोदशा से भली प्रकार परिचित पूज्य गुरुदेव ने प्रेम से उन्हें अपने अतिमहत्त्वपूर्ण दायित्वों से अवगत कराया। आश्वासनस्वरूप उन्होंने परिजनों से यह भी कहा कि आने वाले समय में वंदनीया माताजी के माध्यम से समस्त शुभ संकल्प निश्चित रूप से सफलतापूर्वक पूर्ण होंगे। आइए पढ़ते हैं इससे आगे का विवरण …..
शताब्दी अंत के संकट –
दो साल पहले सन् 1981 में अंतरराष्ट्रीय – जगत् में स्वास्थ्य विज्ञानियों ने एक नई बीमारी की – सूचना दी थी। ‘एड्स’ नामक इस संक्रामक बीमारी के बारे में कहा गया था कि अकेला यही रोग कुछ ही वर्षों में पूरी मानव जाति को नष्ट कर सकता है। रोग का कोई उपचार आज तक नहीं ढूँढ़ा जा सका है। सिर्फ परहेज ही उससे बचने का उपाय है। एक बार इसकी चपेट में आ जाए तो फिर परहेज भी कोई काम नहीं देगा। इस बीमारी पर अब तक कितने ही शोध प्रयोग किए गए, लेकिन कोई निवारक उपचार नहीं मिला। करीब चार साल पहले एक अंतरिक्ष यान अपनी कक्षा से भटक गया, वह पृथ्वी की ओर दौड़ने लगा। उसकी गति और संहारक क्षमता के आधार पर आशंका जताई गई कि यदि वह पृथ्वी के किसी भू-भाग पर गिरा तो खंडप्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। ध्रुव प्रदेशों में गिरा तो चारों ओर विनाश-ही- विनाश नाच उठेगा। जरूरी था कि वह समुद्र में ऐसी जगह गिरे, जहाँ का जलस्तर अत्यंत गहरा हो। उस गहराई में वरुण देव की शामक शक्ति ही उसे शांत कर सकती है। ग्यारह जुलाई की रात तक इस आकाशीय प्रयोगशाला ने लाखों लोगों का चैन उड़ा दिया। करीब छह महीने में पृथ्वी के लगभग 35000 चक्कर लगाकर स्काईलैब जब आस्ट्रेलिया के पास समुद्र में गिरा तो मनुष्य जाति ने चैन की साँस ली। स्काईलैब जिस गति और दिशा-धारा से घूमता दौड़ता हुआ पृथ्वी की ओर आ रहा था, उससे लगता था कि यह ठोस जमीन पर ही गिरेगा।
समुद्र में गिरने की संभावना पाँच प्रतिशत बताई जा रही थी। यह पाँच प्रतिशत संभावना कैसे सौ प्रतिशत में बदल गई ? इस प्रश्न का हल ढूँढ़ते हुए वैज्ञानिक अद्भुत संयोग और अध्यात्मविद् ईश्वरीय अनुग्रह अथवा किसी विराट आध्यात्मिक प्रयोग की परिणति बताते हैं। पिछले दस वर्षों में दुनिया ने इतने बड़े उतार-चढ़ाव देखे कि इतिहासकारों के मुताबिक पिछले दस हजार वर्षों में नहीं देखे होंगे। संयुक्त राष्ट्र की संस्कृति और इतिहास परिषद् द्वारा जारी विवरणों के मुताबिक सन् 1971 से 1980 के बीच दुनिया भर में अट्ठाईस-सौ छोटे-बड़े युद्ध लड़े गए। भारत, पाक, वियतनाम (दक्षिण), ईरान- इराक, इजराइल, मिस्त्र के बड़े युद्ध भी इनमें शामिल हैं, जिनमें हजारों लोगों की जानें गईं। परखनली शिशु और अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान के अलावा अंतरिक्ष यानों के प्रक्षेपण जैसी वैज्ञानिक सफलताएँ छोड़ दें तो मनुष्य जाति ने ऐसा कुछ भी हासिल नहीं किया, जो उसके सभ्य एवं संस्कारित तथा मेधावी होते जाने को सिद्ध कर सके। इस अवधि में शिक्षा, सुविधा और संपन्नता का एक नखलिस्तान जरूर उभरता दिखाई दिया किंतु दुनिया की अस्सी प्रतिशत से ज्यादा आबादी भूख और गरीबी के निम्नतम स्तर पर ही जीती दिखाई दी। इस बीच इकोरस जैसा क्षुद्र ग्रह सौर कलंक और आकाशीय उत्पात भी मनुष्य जाति को भयभीत करने में जुटे हुए थे।
पूज्य गुरुदेव ने सन् 1981 के बाद भारत के महाशक्ति बनने का आश्वासन दिया। सन् 1982 के आस-पास अपनी बाहरी गतिविधियों को समेटना शुरू किया तो परिजनों से कहा कि नया युग आरंभ होने से पहले कुछ कषाय-कल्मष भी ऊपर आएँगे। उनसे चिंतित नहीं होना है। समुद्रमंथन में भी तो पहले कूड़ा-करकट, अनीति-अमंगल और गरल विष निकला था। अमृत तो उस सबके बाद की – निष्पत्ति है। “भगवान अपनी दुनिया को हेय स्थिति में पड़े नहीं रहने देना चाहते। वे इसे उबारेंगे और उबारेंगे इसलिए कि भारत का उत्थान आवश्यक है। उसके बिना दुनिया भी नहीं उठेगी।” – गुरुदेव ने उन दिनों मुलाकात के लिए आई। एक संत विभूति से कहा था। इस पर उन संत ने कहा- “भगवान भारत को क्यों उठाना चाहते हैं गुरुदेव ? क्या उन्हें भारत से विशेष स्नेह है?” “विशेष स्नेह नहीं।”- गुरुदेव ने कहा। “भगवान प्रत्येक कल्प में एक देश को चुनते हैं। उसे सजाते-सँवारते और वहाँ प्रकाश उत्पन्न करते हैं। जब कभी वे मनुष्य को उसके किए का दंड देना चाहते हैं तो पहले चुने हुए देश को ही श्री और संपदा से हीन करते हैं। उस देश को कुछ समय के लिए दबा देते हैं।
“सन् 1971 से 1981 के बीच दुनिया में जो कुछ हुआ अब उसका उलटा चक्र घूमना है। प्रकृति का चक्र अब लोम गति से घूमेगा और आने वाले बीस वर्षों में (सन् 2000 तक) शुभ चिह्न दिखने लगेंगे। फिर वर्ष 2020 तक सुखद परिणाम आने लगेंगे। मनुष्य अपने वर्तमान और भविष्य के प्रति आश्वस्त दिखाई देगा।” उन्हीं संत से गुरुदेव ने अगले अन्य संदर्भ में कहा कि गायत्री परिवार के सदस्यों को इस तरह का आश्वासन और निर्देश पहले कई बार दिया गया है। सन् 1983 की रामनवमी के बाद गुरुदेव ने गायत्री नगर में आना-जाना भी कम कर दिया। वहाँ जाने पर भी परिजन घेर लेते थे। नगर के मुख्य द्वार पर बनी छतरियों का काम पूरा हो गया था। अभी तक परिजन सोच रहे थे कि उन्हें क्यों बनवाया जा रहा है? क्या उपयोग होगा? शून्य और निराकार की * प्रेरणा-प्रवाह उत्पन्न होगा। प्रतीक हैं या यहाँ से कोई रामनवमी पर उन्होंने मिलना-जुलना लगभग नब्बे प्रतिशत कम कर दिया।
उसी समय माताजी के माध्यम से संदेश पहुँचाया। गुरुदेव ने कहा- “शरीर छोड़ने के बाद भी वे यहीं रहेंगे। उनके पार्थिव अवशेष परिसर से बाहर नहीं जाएँगे। शरीर जिन पंचतत्त्वों से बना है, वे तत्त्व बदले हुए रूप में इसी तीर्थ में निवास करेंगे। “उनके जाने के पाँच वर्ष बाद माताजी को * भी इहलीला का संवरण कर लेना है और वे भी अपने पार्थिव अवशेषों सहित यहीं विद्यमान * रहेंगी।” संदेश सुनने के बाद परिजन व्यथित तो हुए, लेकिन मिलना-जुलना रुक जाने पर गुरुदेव की उपस्थिति और सघन अनुभव होने लगी। प्रतिदिन प्रणाम का क्रम ही तो बंद हुआ था। गुरुदेव जब मिलना चाहते या अपनी आवश्यकता जोर मारती तो बुलावा आ जाता, लेकिन यह सक्रिय और जीवंत होने का दौर था। गुरुदेव ने नैष्ठिक साधकों को उच्चस्तरीय साधनाएँ सिखाना आरंभ किया। प्रत्यक्ष उनसे भेंट नहीं होती थी, लेकिन साधना के समय कई परिजनों को लगता कि वे सामने बैठे ध्यान करा रहे हैं। अपने उच्चार का अनुकरण करने के लिए कहते हुए जप करा रहे हैं और कभी-कभार तो पलकों को भी ठीक से खोलना और बंद करना सिखा रहे हैं। सामने बैठे किसी शिक्षक या इंस्ट्रक्टर की तरह भी उस समय गुरुदेव के सान्निध्य की अनुभूति होती ।
प्रतीति की भावभूमि –
प्रतीति भाव जगत् में होती है या प्रत्यक्ष ? गुरुदेव के पास किसी ने लिखकर भेजा था। जैसा कि कभी-कभार होता था गुरुदेव उस समय गायत्री नगर में अपने परिजनों से कुछ कहने के लिए आए थे। प्रवचन देने का छिटपुट सिलसिला तब भी किसी रूप में जारी था, किंतु इस बार गुरुदेव ने मंच पर आने का निश्चय किया। उस संदर्भ को स्पष्ट करने से पहले गुरुदेव का उत्तर बता दें। लिखकर भेजे गये जवाब में गुरुदेव ने प्रवचन में कहा- ” यह प्रतीति करने वाले पर निर्भर है। भावशरीर के तल पर जाग्रत और चैतन्य साधक ने पुकारा हो तो प्रतीति प्रत्यक्ष हो सकती है। ठीक उसी तरह जैसे हम और आप आमने-सामने बैठकर मिल रहे हैं, लेकिन भावशरीर अभी स्वाभाविक स्थिति में है; प्रत्यक्ष और सूक्ष्म का अंतर बना हुआ है तो प्रतीति हृदयचक्र में ही होगी। स्वप्न की भाँति या गंध, रस और रूप की भाँति।
उस स्थिति में आप किसी को छूना चाहें तो कठिन है।” जल प्लावन के उदाहरण से और स्पष्ट करते हुए गुरुदेव ने समझाया कि मनु ने उस समय सृष्टि बीजों को नौका में रखकर सुमेरु पर्वत पर आसन जमा लिया। नौका बँधी हुई थी। चारों ओर जल- ही-जल, लेकिन जल से नोका बाँधी तो नहीं जा सकती। इसलिए मनु ने सुमेरु का आश्रय लिया, वह हिमगिरि के रूप में विद्यमान था। हिम और जल में सघनता और तरलता का ही अंतर है। हिम जल का ठोस रूप है और जल उसी हिम का तरल रूप। दोनों तत्त्वों या रूपों में से किसे सही कहें? बरफ को या पानी को ? यह प्रसंग पूरा करते हुए गुरुदेव ने कहा- “आपका मन कहे तो इस बारीकी में जाइए, अथवा जैसा अनुभव होता है, अपने लिए वही सही मानें। ध्यान रहे सिर्फ अपने ही लिए। उसे किसी दूसरे को परखने के लिए आधार न बनाएँ। जो जिस आत्मिक और आंतरिक स्थिति में जी रहा है, उसे वहीं से आगे बढ़ने दें। उसकी यात्रा में अपने अनुभवों का रोड़ा न अटकाएँ।” गुरुदेव ने तो उल्लेख नहीं किया, लेकिन उस उत्तर को समाचार और लेख का स्वरूप देते हुए पत्र-पत्रिकाओं में भगवद्गीता का हवाला भी दिया। अर्जुन को उपदेश देते हुए वहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि मुझे जो जिस रूप में भजते हैं, उन्हें उसी रूप में प्राप्त होता हूँ। ज्ञानी जनों को चाहिए कि कम समझदार और कम शिक्षित जनों को अपने अनुभव या निष्कर्षों से भ्रमित न करें।
अपवादों का क्षरण –
प्रसंगवश यह उल्लेख आवश्यक होगा कि मिलना-जुलना कम कर देने के कारण गुरुदेव के संबंध में कुछ अफवाहें फैलने लगी थीं। लोग यों अत्यंत आवश्यक होने पर उनसे मिलते ही थे, पर यह समय सीमित कर दिया गया था। साल-छह महीने पहले गुरुदेव सैकड़ों लोगों से एक साथ-एक ही बार में मिल लेते थे। उनसे किसी भी वक्त मिला जा सकता था। अब उन्होंने डेढ़-दो घंटे का समय ही नियत कर दिया था और वह भी चुने हुए व्यक्तियों के लिए ही। उन व्यक्तियों का चयन उनकी आवश्यकता, पात्रता और अभीप्सा के आधार पर किया जाता था। इस बदलाव का लाभ उठाने के लिए किसी समय गुरुदेव के निकट रहे लोगों ने अपने आप को उनका प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी बताना शुरू कर दिया। गुरुदेव ने हजारों बार स्पष्ट किया है कि वे कोई परंपरा नहीं शुरू कर रहे हैं। गायत्री परिवार के सभी परिजन और भारतीय धर्म-संस्कृति के अनुयायी, यहाँ तक कि धर्म विश्वास की अन्य धारा के व्यक्ति भी उन्हीं के अभिन्न रूप हैं। जहाँ तक उनकी आध्यात्मिक विरासत या उत्तराधिकार का सवाल है मठों और दूसरे आश्रमों की तरह किसी भी व्यक्ति को नहीं सौंप रहे हैं।
जो भी है महाकाल की सृजनसेना का समान भागीदार है, ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल है। पूज्य गुरुदेव की इन दो-टूक बातों के बावजूद कतिपय लोगों ने अपने आप को उनका एकमात्र उत्तराधिकारी बताना शुरू किया। भारत में तो ऐसे तत्त्वों की दाल कम ही गली । पश्चिमी देशों में वे कुछ कामयाब होने लगे। कुछ धर्मध्वजियों ने तो अपनी वल्दियत बदलकर भी काम शुरू कर दिया। धर्म के नाम पर लोगों को ठगने वाले ऐसे धर्मध्वजियों पर उनकी अपनी आत्मा के सिवा कोई और रोक नहीं लगा सकता था। उन लोगों ने गुरुदेव के संबंध में अशुभ और अप्रिय अफवाहें फैलाना शुरू किया तो वहीं के नैष्ठिक साधकों ने गुरुदेव से सामने आने का अनुरोध किया। गुरुदेव हमेशा की तरह प्रवचन मंच पर आए और परिचित शैली तथा स्वर में परिजनों को संबोधित करने लगे। यह शुरू करते ही किसी की आलोचना या खंडन किए बगैर ही अपवादों का अपने आप शमन हो गया। जब कहीं, कोई विपर्यय नहीं रहा तो गुरुदेव की एकांत साधना पहले की तरह फिर चलने लगी। परिवार और उसमें सम्मिलित होकर युग देवता की साधना कर रहे साधकों के मन में विक्षोभ दूर हुआ। फिर इसके बाद गुरुदेव ने उन तत्त्वों के लिए क्षमादान की घोषणा कर दी, जो उनके एकमात्र प्रतिनिधि होने का दावा कर रहे थे।
प्रतिभा और अमानत
मिलना-जुलना सीमित कर देने के बाद गायत्री परिवार के सदस्यों की संख्या बेतहाशा बढ़ने लगी। पर्व-त्योहारों पर यहाँ आने और प्रणाम करने के लिए कतार लगाने वालों की संख्या बीस-पच्चीस हजार तक पहुँच जाती। सभी गुरुदेव को प्रणाम करने, उनका चरणस्पर्श करने के लिए उत्सुक, लेकिन अपनी मार्गदर्शक सत्ता के निर्देश पर यह क्रम रुका तो रुक ही गया। प्रणाम, दर्शन के लिए उत्सुक जनों को दूर ही रहने और बहुत हुआ तो मन में अनुभव कर लेने का निर्देश था। गायत्री परिवार के अथवा बाहर के कुछ ऐसे महानुभाव भी थे, जिन्हें गुरुदेव की अनुमति मिल जाती। ऐसे आगंतुकों से गुरुदेव बातचीत कर लेते। उन्हीं दिनों इंडियन एक्सप्रेस पत्र समूह के एक वरिष्ठ पत्रकार गुरुदेव से मिले। उन्होंने राजनीति, अर्थ, समाज आदि विषयों पर लंबी बातचीत की।
गुरुदेव ने यही कहा कि मेरी राय में प्रतिभाओं को भगवान का न्यासी बनकर काम करना चाहिए। ईश्वर ने उन्हें यह संपत्ति सौंपी है। वे दी गई प्रतिभा के मालिक नहीं हैं, उसे भगवान के काम में उसकी विश्व-वसुंधरा को सुंदर बनाने के लिए इसका उपयोग करें। अगर अपनी सुख-सुविधाओं के लिए अपनी प्रतिभा को काम में लाते हैं तो ‘अमानत में खयानत’ के दोषी बनते हैं। उन पत्रकार ने कहा- “मैं आपके आदेश को जीवन में उतारने की कोशिश करूँगा गुरुदेव।” उन्हें बीच में ही रोकते हुए गुरुदेव ने कहा- “आदेश नहीं, निवेदन। इस निवेदन को औरों तक भी पहुँचाइएगा।” वरिष्ठ बुद्धिजीवी ने कहा- ” आप इस बात के लिए निवेदन शब्द चुन रहे हैं, यह आपका बड़प्पन है। मैं तो इसे आदेश ही मानता हूँ।” बातचीत का समय पूरा होने लगा तो उन पत्रकार ने स्वयं ही उठने का उपक्रम किया। गुरुदेव ने कहा- “बैठिए-बैठिए।” “आपका एक-एक क्षण महत्त्वपूर्ण है।”
वे कुछ रुके और बोले-“मैंने अब से करीब चालीस साल पहले आपको देवास जिले के एक गाँव में यज्ञ कराते हुए देखा था। तब आपके सामने पच्चीस तीस लोगों का समूह था। आज आपका यश चारों दिशाओं में फैल रहा है। पच्चीस-तीस हजार आदमी किसी भी पर्व-त्योहार पर आपको प्रणाम करने आ जाते हैं। आप अपने इस यश की एक झलक भी देखना नहीं चाहते। धन्य है गुरुदेव।” जिन दिनों गुरुदेव ने मिलना-जुलना अत्यंत सीमित कर दिया था और उनके दर्शन के लिए आने वालों की संख्या नित्य-निरंतर बढ़ रही थी, उन दिनों गुरुदेव ने अपनों के नाम एक पत्र लिखा। हजारों लोगों को संबोधित इस पत्र में लिखा था- “चलते समय काफिला इतना लंबा, किंतु मंजिल पर पहुँचने का समय आने तक साथी उँगलियों पर गिने जा सकने योग्य ही। इसे असफलता कहा जाए ? दुर्भाग्य ? विधि की विडंबना या उस मिट्टी – को दोष दें, जिससे यात्रियों की कतार तो गढ़ी थी, पर संरचना इतनी अनगढ़ कि दो कदम चलते- चलते यायावरों की तरह भटकी और मृगतृष्णा की आतुरता में विभ्रांत होकर कहीं-से-कहीं चली गई।”
एक और संदेश उसी पत्र के साथ लिखा, उसमें गुरुदेव ने कहा- “समूचा समाज और उसका मान्य प्रचलन दुष्टता और भ्रष्टता से भरा है। उसे सहन करते रहने की अभ्यस्त कुसंस्कारिता तभी उखड़ती है, जब उसके विरुद्ध विद्रोह का झंडा खड़ा कर लिया जाए। मनोरथ सफल नहीं होने की भविष्यवाणी कोई भी व्यवहार-बुद्धिवाला आदमी छाती ठोककर कर सकता है, किंतु वास्तविकता यही है कि साहसी लोगों ने आदर्शवादी निर्णय अपनी अंतःप्रेरणा से किए हैं। ईमान और भगवान का परामर्श लेने के अतिरिक्त किसी तीसरे से पूछताछ करने की आवश्यकता पड़ती ही नहीं।” ये पंक्तियाँ अखण्ड ज्योति के पन्नों पर भी छपी थीं। जितने लोगों ने इन्हें पढ़ा, उनसे ज्यादा लोगों ने अपने अंतःकरण में उसकी गूंज सुनी। उनमें से कितनों ने ही यहाँ आने का मन बनाया और जैसाकि श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता, 7/3 में कहा है- “जितने लोग मन बनाते हैं, उनमें से गिने-चुने ही पग बढ़ा पाते हैं, पग बढ़ाने वालों में कोई विरले ही अपने चुनाव पर स्थिर रहते और आगे बढ़ते हैं।
उन आगे बढ़ने वालों में भी कोई ही अपने लक्ष्य तक पहुँचता है।” पूज्य गुरुदेव के सपनों को साकार करने, उन्हें जीने और जीवन में उतारने वाले लोग कितने हैं यह तो वही जानें। यहाँ शांतिकुंज गायत्री नगर और गाँव-गाँव में फैले गुरुदेव के सपनों की छोटी-सी झलक पाना जरूरी है। यह झाँकी अप्रैल, 1984 के आखिरी सप्ताह से पहले की है। आश्रम को बने तब चौदह वर्ष हुए थे। इस अवधि में थोड़े समय के लिए आने और प्रशिक्षण प्राप्तकर लौट जाने वालों की संख्या बीस हजार के ऊपर थी। अपने आप को इस संस्था का अंग मानकर जीवनदानी की तरह स्थायी निवास का संकल्प लेने वालों की संख्या पाँच सौ से ज्यादा थी। भारतभूमि के छह सौ में से चार सौ पचास जिलों और तीन लाख गाँवों में युगशक्ति की उपासना करने वाले दो करोड़ साधक। भारत के बाहर देशों में 74 जाग्रति केंद्र और निरंतर प्रवास करती, युग साधना का संदेश पहुँचाती पच्चीस जीप मंडलियाँ । इस विस्तार के लिए हिमालय के प्रवेश द्वार पर तपस्यारत एक ऋषि आत्मा । श्वेत वस्त्रों से भूषित, अपने कक्ष और बरामदे में चहलकदमी करती हुई, लाखों हृदयों को जगाती, उनमें आलोक बिखेरती उस आत्मा ने संवत् दो हजार इकतालीस का पहला सूर्योदय होने से पहले ही वह खिड़की भी बंद कर दी, जहाँ से बाहर की झलक मिलती थी।
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स्कॉटलैंड के प्रसिद्ध व्यापारी रॉबर्ट इन्निस को एक बार व्यापार में इतना घाटा हुआ कि उनकी सारी जमा-पूँजी बिक गई। अन्य कोई आय का साधन न होने पर घर में दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति में भी दिक्कत पड़ने लगी। रॉबर्ट के मित्रों-संबंधियों को लगा कि इस विषमता की घड़ी में वह कहीं अपना आत्मविश्वास सदा के लिए न खो बैठे, परंतु रॉबर्ट किसी और मिट्टी का बना था। उसने बिना किसी संकोच के एक साधारण फर्म में पहरेदार की नौकरी ले ली। उस फर्म का मालिक रॉबर्ट को नहीं पहचानता था। एक दिन उसका एक मित्र उससे मिलने आया तो वह फर्म के मालिक से बोला- “तुम बड़े भाग्यशाली हो, जो रॉबर्ट इन्निस जैसा अमीर आदमी तुम्हारे यहाँ पर छोटी-सी नौकरी कर रहा है।” फर्म के मालिक को तो भान भी न था कि वह उसके यहाँ पहरेदार के पद पर है
तो उसने रॉबर्ट इन्निस से क्षमा माँगनी चाही। इस पर रॉबर्ट ने कहा – “आप मुझसे क्षमा न माँगें। आपका तो मैं शुक्रगुजार हूँ कि आपने मुझे नौकरी पर रखा। बाकी सब तो मुझे बड़ा आदमी समझकर कोई काम देने को तैयार ही न थे। रही बात छोटे काम की तो दुनिया में कोई कार्य छोटा नहीं होता। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मैं पुनः परिश्रम करके उन्हीं ऊँचाइयों पर पहुँच जाऊँगा।” फर्म का मालिक इन्निस की श्रमशीलता और आत्मविश्वास से प्रभावित हुए बिना न रह सका। उसने इन्निस को अवसर देने का निर्णय किया। रॉबर्ट इन्निस ने भी अपना कहा सत्य कर दिखाया और पुनः सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए उसी ऊँचाई को प्राप्त किया। कालांतर में उन्हें ‘सर’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।
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