प्रेरणा

समर्पण से सिद्धि की ओर

 Motivation| प्रेरणा: लए इन हैं। हमें बसे लने अपने आराध्य व गुरु के प्रति साधक के  मन में यदि सच्ची श्रद्धा व भक्ति हो तो साधक,  शिष्य निस्संदेह साधना के शीर्ष तक पहुँचकर भगवत्कृपा व गुरुकृपा का अधिकारी बन जाता  है। वहीं श्रद्धा व भक्ति के अभाव में साधक की, शिष्य की साधना सफल नहीं हो पाती, पूर्ण नहीं  हो पाती। 

        भगवान की नजर में, गुरु की नजर में सभी  साधक, शिष्य, भक्त समान ही होते हैं, पर अपनी  सच्ची साधना, भक्ति व निश्छल प्रेम के कारण कोई साधक या शिष्य अपने आराध्य व गुरु की कृपा  का विशेष पात्र बन जाता है तो वहीं सच्ची साधना  व श्रद्धा के अभाव में कोई साधक व शिष्य अपने  आराध्य का, गुरु का कृपापात्र, प्रियपात्र नहीं बन पाता। अपनी कमियों को दूर कर अपने आराध्य व गुरु का प्रियपात्र, कृपापात्र निस्संदेह कोई भी साधक, कोई भी शिष्य अवश्य ही बन सकता है। पर समस्या तब खड़ी हो जाती है, जब हम अपनी कमियों को दूर करने के बजाय साधना में सफल * हो रहे, अपने गुरु के प्रियपात्र बन रहे अन्य साधकों, शिष्यों व भक्तों से ईर्ष्या करने लगते हैं।

                   उनसे प्रेरणा पाने के बजाय हम उनसे ईर्ष्या  करने लगते हैं। इससे हमारी साधना तो बाधित होती ही है, हम अपने आराध्य, अपने गुरु के  साथ-साथ अपनी नजरों से भी गिरने लगते हैं। तब महान गुरु से जुड़े होने के बावजूद हम साधना में  अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर पाते हैं और उलटे अपने आराध्य, अपने गुरु पर ही पक्षपाती होने की शंका, आशंका, कुशंका आदि के शिकार होते हैं और पाप के भागी बनते हैं। 

                                 इस संबंध में हमें ऐसे कई दृष्टांत पढ़ने व सुनने को मिलते हैं। एक ऐसा ही दृष्टांत आचार्य शंकर के शिष्यों से जुड़ा हुआ है। आचार्य शंकर के कई शिष्य उनके साथ ही रहते थे। आचार्य शंकर उन शिष्यों व साधकों को निरंतर योग-साधना का उपदेश दिया करते थे। आचार्य शंकर अपने द्वारा रचित ग्रंथों व भाष्यों को अपने शिष्यों को पढ़ाते थे और उन्हें साधना करने को प्रेरित करते थे, जिससे कि वे शास्त्रों में वर्णित साधना से होने वाले लाभ को स्वयं के जीवन में अनुभव कर सकें। 

                            भाष्य पाठ, शास्त्र मीमांसा और योग-साधना के उपदेश से शंकराचार्य के शिष्यों के मन उच्च आध्यात्मिक भावना में लीन रहने लगे थे। उन सभी शिष्यों में सनंदन नाम का शिष्य अधिक उच्चकोटि का साधक था। वह आचार्य शंकर की सेवा में सदैव तत्पर रहता था। उसकी सच्ची गुरुभक्ति व साधना के कारण शंकराचार्य भी उससे अधिक प्रेम करते थे। फलस्वरूप अन्य शिष्य सनंदन से ईर्ष्या करने लगे और हमेशा सनंदन को शंकराचार्य की दृष्टि में नीचा दिखाने की फिराक में रहने लगे।

                  एक दिन शंकराचार्य स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर अपने शिष्यों को साधना संबंधी विशेष उपदेश दे रहे थे, जिससे कि सभी शिष्यों को आध्यात्मिक क्षेत्र में पूर्णता प्राप्त हो सके, पर कई शिष्य आचार्य शंकर के बार-बार उपदेश सुनने के बाद भी ईर्ष्या-द्वेष नहीं छोड़ सके थे। शंकराचार्य की सनंदन पर विशेष कृपा है, अधिक कृपा है; ऐसा सोचकर वे सनंदन से ईर्ष्या करने लगे थे। 

                                            अंतर्यामी आचार्य शंकर ने अपने शिष्यों के मन में सनंदन के प्रति उभर रहे ईर्ष्या के भाव को भाँप लिया था। इसलिए वे उनके मन से ईर्ष्या भाव निकालने की युक्ति पर विचार करने लगे। अस्तु वे शिष्यों को ब्रह्मसूत्र, द्वादश उपनिषद्, भगवद्गीता, विष्णु सहस्त्रनाम आदि ग्रंथों के नित्य स्वाध्याय के महत्त्व को बताते हुए यह समझने लगे कि धारणा, ध्यान, एकाग्रता व सच्ची लगन से साधक कुछ भी प्राप्त कर सकता है; इसमें जरा भी संदेह नहीं है। 

                        उस समय संयोग से वहाँ सनंदन नहीं था। वह किसी आवश्यक कार्य से अलकनंदा के दूसरे तट पर गया हुआ था। अलकनंदा पर पुल बना हुआ था। पुल पर से ही दूसरे तट पर जाना होता था; क्योंकि अलकनंदा में तो हिमखंड पड़े रहते थे, जिससे अलकनंदा में तैरकर दूसरे तट पर जा पाना असंभव सा जान पड़ता था। शंकराचार्य के शिष्य अपने गुरु से साधना संबंधी उपदेश सुन रहे थे, पर उनके मन में और ही विचार आ रहे थे। वे सोच रहे थे कि सनंदन आज गुरुसेवा छोड़कर अलकनंदा के दूसरे तट पर क्यों गया है, इसमें अवश्य ही कोई भेद है। गुरुदेव हमारे से अधिक सनंदन को ही योग्य समझते हैं। गुरुदेव की जितनी कृपादृष्टि सनंदन पर है, उतनी कृपादृष्टि हम पर नहीं है। 

                              शंकराचार्य शिष्यों के मन में उभर रहे भावों को भली भाँति जान रहे थे और विचार कर रहे थे कि सनंदन इन सबसे श्रेष्ठ है- ये नादान यह नहीं जानते, नाहक उससे ईर्ष्या करते हैं। आचार्य शंकर ने विचार किया कि इन शिष्यों के मन से ईर्ष्या के भाव नष्ट करने ही होंगे और इस हेतु सनंदन की श्रेष्ठता की परीक्षा लेनी होगी। जब शिष्यों ने ध्यान-साधना के विषय में उनसे उपदेश पा लिया तब अचानक ही शंकराचार्य ने सनंदन को  पुकारा – “सनंदन! सनंदन !! तुम कहाँ हो, यहाँ आ जाओ।” 

                                               पर वहाँ उपस्थित शिष्यों ने कहा “गुरुदेव! सनंदन तो अलकनंदा के दूसरे तट पर किसी कार्य से गया है। वह यहाँ नहीं है। आप हमें बताइए, क्या कार्य करना है ?” पर शंकराचार्य ने उन शिष्यों की बात अनसुनी कर दी और फिर बाहर की ओर मुख करके सनंदन को आवाज दी-“सनंदन! सनंदन!! तुम कहाँ हो, तुम आ जाओ। सनंदन जल्दी आ जाओ।” “न जाने गुरुजी को क्या हो गया है” शिष्यों ने एकदूसरे की ओर देखते हुए कहा। सनंदन बहुत दूर है, गुरुजी की आवाज वहाँ तक नहीं पहुँच सकती। पर सनंदन में साधना और गुरुकृपा से इतनी सिद्धि और शक्ति आ गई थी जिसके कारण अपने गुरु शंकराचार्य की इतनी दूर की आवाज भी उसने सुन ली। 

                         उसे अंत: प्रेरणा हुई कि उसके गुरु उसे आवाज दे रहे हैं। गुरु की आवाज उसके कानों में गूंजने लगी- ‘सनंदन आ जाओ! सनंदन तुम कहाँ हो ?’ सनंदन ने सोचा अवश्य ही गुरुजी को कोई विशेष कार्य है। इसी कारण वे मुझे शीघ्र बुला रहे हैं, पर अलकनंदा के पुल पर से जाने में तो अधिक समय लगेगा और अलकनंदा में तैरकर भी नहीं जा सकते; क्योंकि अलकनंदा की धारा बहुत तेज है और अलकनंदा के अंदर हिमखंड पड़े हैं, जिसके कारण शरीर को ठंढ और चोट भी लग सकती है, मगर इस समय यह क्या सोचना। गुरुजी ने जल्दी बुलाया है तो मुझे जल्दी ही जाना चाहिए।

                      यह सोचते हुए सनंदन अलकनंदा के हिमखंड से भरे गहरे अथाह शीतल जल में कूद पड़ा। पास में खड़े श्रद्धालु, साधक, शिष्य चिल्लाए -“सनंदन नदी में हिमखंड पड़े हैं, अथाह शीतल जल है, उसके अंदर मत जाओ।” ” पर सनंदन ने किसी की नहीं सुनी। उसे अपने गुरुजी की आवाज ही अपने कानों में गूँजती हुई सुनाई पड़ रही थी – “सनंदन तुम कहाँ हो, तुम आ जाओ।”

                                   सनंदन ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना अलकनंदा की विशाल जलराशि में छलाँग लगा  दी। वह तैरकर आगे बढ़ने लगा। बरफ के टुकड़े  और शीतल जल उसके शरीर को सुन्न कर रहे थे,  पर वह तैरता हुआ दूसरे तट पर जाने का यत्न कर : रहा था। सच्ची लगन से साधना में तत्पर साधक को  प्रकृति भी अपना यथायोग्य सहयोग देती है। प्रकृति  भी परिस्थितिगत अनुकूलता प्रदान करती है। अचानक अलकनंदा के अंदर कमल पुष्प तैरने लगे। 

                   सनंदन ने उन पर पाँव रखकर नदी पार कर ली और तेजी से भागता हुआ आकर गुरु के चरणों में गिर पड़ा। “क्या आज्ञा है गुरुदेव !”-सनंदन ने शंकराचार्य के चरण छूते हुए कहा। “दूर होने के कारण आने में थोड़ा बिलंब हो गया गुरुदेव ! इस विलंब के लिए मुझे क्षमा करें।” “तुम ठीक समय पर आ गए सनंदन।”  कहते हुए शंकराचार्य ने दूसरे शिष्यों की ओर देखा, वे सभी लज्जा से गरदन झुकाए बैठे थे। “देखा तुमने !” शिष्यों की ओर देखते हुए शंकराचार्य ने कहा- “क्या तुममें ऐसा कार्य करने का साहस  है, क्या तुम ऐसा कार्य कर सकते हो, जिसमें प्राण संकट में आ जाएँ?” “गुरुनिर्दिष्ट साधना में इसकी (सनंदन की) सच्ची लगन ने ही उसे यह सिद्धि दिलाई है। 

           इतने प्रवाह से बहने वाली, हिमखंडों से भरी, शीतल * जल की नदी अलकनंदा को सनंदन पार करके • यहाँ आ गया।” सनंदन के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए शंकराचार्य ने कहा- “इसकी सच्ची साधना, श्रद्धा, समर्पण व लगन के कारण ही इस पर भगवती की कृपा है।” “क्षमा करें गुरुदेव ! सचमुच हम सनंदन की साधना, समर्पण, लगन व  गुरुभक्ति की शक्ति से परिचित नहीं थे। हमें खेद  है, ऐसे महान साधक, महान शिष्य व महान गुरुभक्त से हमने ईर्ष्या की।”

         “मात्र क्षमा माँगने भर से काम नहीं बनेगा साधको ! इतनी साधना-तपस्या के पश्चात भी यदि ईर्ष्या का अंकुर हृदय में पनपने लगा तो तपस्या, साधना का सारा परिश्रम व्यर्थ चला जाएगा। सच्चा साधक भूलकर भी कभी दूसरों से ईर्ष्या-द्वेष का भाव नहीं रखता। इसका जीवंत उदाहरण शिष्य सनंदन है। तुम सब इसकी बुराई करते रहे, पर यह कभी किसी की बुराई नहीं करता।”-शंकराचार्य ने मुस्कराते हुए कहा। सनंदन के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाई और कहने लगे- “इसके विशेष गुण के कारण ही मैं इसका नाम पद्मपाद रखता हूँ और सभी शिष्यगण इसे पद्मपाद नाम से ही बुलाएँगे।” शिष्यों को यह ज्ञात हो गया कि सच्ची साधना व गुरुभक्ति से ही साधक को गुरुकृपा प्राप्त होती है और गुरुकृपा से साधक के लिए असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। 

                   शंकराचार्य जैसे महापुरुष का शिष्य बनना, हमें शुभकर्मों के पुण्यफल से ही प्राप्त हुआ है। पद्मपाद ने अपने गुरु की स्तुति करते हुए उनके चरण छुए और शिष्यों ने शंकराचार्य के चरण छूकर क्षमा माँगी। शंकराचार्य ने सभी के सिर पर प्यार से हाथ फेरकर आशीर्वाद दिया और कहा- “जो मन में ईर्ष्या-भावनाएँ हैं, उन्हें मिटा दो और पद्मपाद जैसे बनने का प्रयत्न करो। तभी तुम्हारा यह दुर्लभ मनुष्य-जीवन सार्थक होगा।” गुरु के उपदेश को सुनकर सभी शिष्यों के मन में सच्ची साधना करने व गुरुसेवा करने की प्रेरणा जाग उठी। हममें से हरेक साधक-शिष्य पद्मपाद की तरह समर्पण व लगन के द्वारा साधना में सिद्धि व सफलता अवश्य ही प्राप्त कर सकता है। समर्पण से सिद्धि की ओर अग्रसर होने का यही राजमार्ग है, जिस पर चलकर कोई भी साधक सिद्धि को प्राप्त कर सकता है।

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