प्रेरणा

सुख शांति एवम आनंद प्राप्ति के स्वर्णिम सूत्र

  Motivation| प्रेरणा:  हिमाच्छादित कैलास पर्वत पर देवों के देव महादेव, भगवान भोलेनाथ अखंड समाधि में डूबे थे और उधर माता पार्वती लोक-कल्याण की इच्छा से अपनी कुछ लोकहितकारी जिज्ञासाओं व प्रश्नों को भोलेनाथ के समक्ष प्रकट कर उनका समाधान चाहती थीं। वैसे उन जिज्ञासाओं का समाधान तो उनके पास भी था, पर वे उन्हें अपने स्वामी भोलेनाथ के मुखारविंद से ही सुनना चाहती थीं। सबसे बड़ा धर्म क्या है ? सबसे बड़ा पाप क्या है ? कर्म करते समय मनुष्य को किस बात का ध्यान रखना चाहिए? जीवन में सफल होने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए ? मनुष्य को सुख और दुःख कब प्राप्त होता है ? आदि कई प्रश्न माता पार्वती के मन में थे। 

      आखिरकार लंबी प्रतीक्षा के बाद भोलेनाथ समाधि से बाहर आए और तब भोलेनाथ की सेवा कर सुअवसर जानकर माता पार्वती ने अपनी सारी जिज्ञासाएँ, सारे प्रश्न भोलेनाथ के समक्ष रखे और भोलेनाथ उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करते रहे। भोलेनाथ बोले- “देवी पार्वती ! मनुष्य के लिए सबसे बड़ा धर्म है सत्य बोलना अर्थात सत्यनिष्ठ होना, सत्य का साथ देना, सत्यवान होना, सत्य को अपने जीवन में जीना और असत्य बोलना या असत्य का साथ देना ही सबसे बड़ा अधर्म है। हर किसी को मन, वाणी और कर्म से सत्यवान होना चाहिए, सत्यनिष्ठ होना चाहिए। सत्य के समान कोई तप नहीं है, कोई धर्म नहीं है, कोई पुण्य नहीं है और असत्य के समान कोई अधर्म नहीं है, कोई पाप नहीं है। इसलिए मनुष्य के हर कर्म में सत्य ही प्रतिबिंबित होना चाहिए। मात्र जिह्वा से सत्य वाणी बोलना पर्याप्त नहीं, बल्कि आचरण से, कर्म से सत्य प्रस्तुत होना चाहिए।” अब अगला प्रश्न था-मनुष्य को कर्म करते समय किस बात का ध्यान रखना चाहिए? इस प्रश्न का समाधान देते हुए भोलेनाथ बोले- “देवी पार्वती ! कर्म करते समय मनुष्य को अपने हर कर्म का साक्षी होना चाहिए। उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि वह अच्छा या बुरा जो भी कर्म कर रहा है, उसका साक्षी ईश्वर है। 

         वह सर्वव्यापी ईश्वर उसके हर कर्म को देख रहा है। उस सर्वसाक्षी से कभी भी, कुछ भी नहीं छिपाया जा सकता है। अस्तु कर्म करते हुए मनुष्य को इस बात का अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि उसके हर कर्म का साक्षी सर्वसाक्षी, सर्वव्यापी ईश्वर है।” महादेव ने आगे कहा- “यह सोचकर मनुष्य को सदा शुभ कर्म, सत्य कर्म, पुण्य कर्म करने चाहिए, जिससे उसे सुख प्राप्त हो सके। जो मनुष्य यह सोचता है कि वह जो कुछ कर रहा है उसे उसके अलावा कोई नहीं देख रहा है, वह जीवन भर अशुभ कर्म, पाप कर्म करता जाता है और उसके परिणामस्वरूप वह दुःख पाता रहता है। किसी भी मनुष्य को मन, वाणी और कर्म से पाप करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए; क्योंकि मनुष्य जैसा सोचता है, वह वैसा ही कर्म करता है, उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है। मनुष्य को अपने मन में बुरे विचार नहीं; बल्कि शुभ विचार, सुविचार रखने चाहिए; जिनसे प्रेरित होकर वह सदा शुभ कर्म, सत्य कर्म कर सके। मन में अशुभ विचार, * कुविचार रखने से मनुष्य उन्हीं विचारों से प्रेरित, प्रभावित होकर पाप कर्म करता है।” 

                भोलेनाथ ने कहा- “मनुष्य को ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए, जिससे औरों को दुःख पहुँचे। पाप कर्म करने से मनुष्य न सिर्फ वर्तमान जीवन में, बल्कि अगले जीवन में, जन्म में भी दुःख पाता है। इसलिए शुभ कर्म, सत्य कर्म करने में ही समझदारी है। मन में सदा सुविचार रहे इस हेतु मनुष्य को शास्त्रों का स्वाध्याय व साधु पुरुषों का संग करना चाहिए। पापी और असाधु मनुष्यों का संग नहीं करना चाहिए; क्योंकि मनुष्य की जैसी संगति होती है वह वैसे ही विचार, सुविचार व गुण-दोष ग्रहण करता है, उनसे प्रभावित, प्रेरित होता है व तदनुरूप कर्म करता है।” माता पार्वती ने पुनः प्रश्न किया -“प्रभु ! सफल व सुखी होने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए ?” भोलेनाथ बोले- “देवी पार्वती ! संसार में हर मनुष्य का किसी-न-किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थिति, परिस्थिति से लगाव होता है, आसक्ति होती है। मोह, आसक्ति मनुष्य की सफलता में बड़ी बाधा हैं, इसलिए मनुष्य को मोह, आसक्ति से मुक्त होकर कर्म करना चाहिए।” महादेव बोले-“सफल होने के लिए मनुष्य को कभी भी अनुचित साधन या उपाय का सहारा नहीं लेना चाहिए। सफलता पाने के लिए साधन भी पवित्र ही होने चाहिए; क्योंकि अनुचित व गलत तरीके से प्राप्त सफलता अंततः दुःखदायी ही होती है और सच्चाई, ईमानदारी व पुरुषार्थ से प्राप्त सफलता सुखदायी होती है । 

                भोलेनाथ बोले – ” अब आपने जो प्रश्न किया है कि सबसे बड़ा सुख और दुःख क्या है ? तो हे देवी पार्वती ! इस संबंध में यह बात सत्य है कि मनुष्य की तृष्णाओं यानी इच्छाओं से बड़ा कोई दुःख नहीं होता और इच्छाओं को छोड़ देने से बड़ा सुख नहीं होता। क्यों ? क्योंकि इच्छाएँ ही बंधन हैं और इच्छाओं से मुक्त हो जाना ही मुक्ति है और उसी में सुख है।” महादेव ने प्रसन्नतापूर्वक माता पार्वती से कहा कि हे पार्वती ! लोक-कल्याण की इच्छा से आपने जो प्रश्न किए हैं उनसे मैं आपसे अतिशय प्रसन्न हूँ। इस प्रकार शिव-पार्वती संवाद समाप्त हुआ। सचमुच भगवान शिव और माता पार्वती के इस संवाद में हमारे लिए बड़ा ही अमूल्य संदेश है, प्रेरणा है, जिन्हें आत्मसात् कर हम लोक-परलोक दोनों में सुख-शांति व आनंद पा सकते हैं।

दूसरे देश से आया शिष्टमंडल महामात्य चाणक्य से मिलने पहुँचा। उन्हें आया देख चाणक्य ने कक्ष में रखा दीपक हटाकर दूसरा दीपक रख दिया। शिष्टमंडल के अगुवा ने उनके ऐसा करने का कारण पूछा तो चाणक्य ने उत्तर दिया “जब आप लोगों ने प्रवेश किया तब मैं व्यक्तिगत कार्यों में संलिप्त था और जो दीपक जल रहा था, वो मेरे निजी धन से लाए गए तेल से जल रहा था। अब जल रहा दीपक राजकोश के धन से जल रहा है; क्योंकि हमारा वार्तालाप शासकीय मुद्दों को लेकर है। न हमें राष्ट्रीय संपदा का व्यक्तिगत कार्यों में खरच करने का अधिकार है और न मैं ऐसा करूँगा।” शिष्टमंडल सदस्य चाणक्य की ईमानदारी से अभिभूत हो गए।

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