महान योद्धा और समाज सुधारक परशुराम

Motivation| प्रेरणा: भगवान विष्णु के दशावतारों में से एक माने जाने वाले भगवान परशुराम के साथ भी कुछ अद्भुत हुआ माना जाता है। उनके आक्रोश और पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियविहीन करने की घटना को तो खूब प्रचारित कर वैमनस्य फैलाने का उपक्रम किया जाता है, पर उनके व्यक्तित्व के अन्य पक्षों को भुला दिया जाता है। पिता की आज्ञा पर माँ रेणुका का सिर धड़ से अलग करने की घटना को भी एक आज्ञाकारी पुत्र के रूप में प्रेरक आख्यान बनाकर सुनाया जाता है, किंतु सवाल खड़ा होता है कि क्या व्यक्ति केवल चरम हिंसा के बूते जननायक के रूप में स्थापित होकर लोकप्रिय हो सकता है? क्या हैहयवंश के नरेश कार्तवीर्य अर्जुन के वंश का समूल नाश करने के बावजूद पृथ्वी क्षत्रियों से विहीन हो पाई।
रामायण और महाभारतकाल में तो पृथ्वी पर क्षत्रिय राजाओं के ही राज्य रहे। वे ही उनके अधिपति हुए। इक्ष्वाकु वंश के मर्यादा पुरुषोत्तम राम को आशीर्वाद देने वाले, कौरव नरेश धृतराष्ट्र को पांडवों से संधि करने की सलाह देने वाले और सूत-पुत्र कर्ण को ब्रह्मशास्त्र की दीक्षा देने वाले परशुराम ही थे। ये सब क्षत्रिय थे। इस रूप में विवेचन किया जाए तो भगवान परशुराम क्षत्रियों के शत्रु नहीं, बल्कि शुभचिंतक ही थे। वास्तविकता में भगवान परशुराम आततायी शासकों के प्रबल विरोधी थे। पौराणिक आख्यानों का विवेचन-विश्लेषण किया जाए तो समाज-सुधार और जनता को स्वावलंबन से जोड़ने में भगवान परशुराम की अहम भूमिका अंतर्निहित है। केरल, कच्छ और कोंकण क्षेत्रों में जहाँ परशुराम ने समुद्र में डूबी खेती योग्य भूमि निकालने की तकनीक सुझाई तो वहीं अपने परशु का उपयोग कर जंगलों को साफ कर भूमि को कृषियोग्य बनाने का दायित्व भी निभाया।
इन्हीं परशुराम ने हेय माने जाने वाले दरिद्रनारायणों को शिक्षित व दीक्षित कर विप्र बनाया। उन्हें यज्ञोपवीत संस्कार से जोड़ा और उस समय जो दुराचारी व आचरणहीन थे, उनका सामाजिक बहिष्कार किया। परशुराम के अंत्योदय के प्रकल्प अनूठे व अनुकरणीय हैं। आज के दौर में उन्हें प्रेरणास्वरूप रेखांकित किए जाने की जरूरत है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार जमदग्निपुत्र परशुराम का जन्म हरिश्चंद्रकालीन विश्वामित्र से एक-दो पीढ़ी बाद का माना जाता है। यह समय प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में ‘अष्टादश परिवर्तन-युग’ के नाम से जाना गया है अर्थात यह 7500 विक्रम पूर्व का समय ऐसे संक्रमण काल के रूप में ज्ञात है, जिसे परिवर्तन का युग माना गया। इसी समय क्षत्रियों की शाखाएँ-दो कुलों में विभाजित हुईं।
एक सूर्यवंश और दूसरा चंद्रवंश। चंद्रवंशी पूरे भारतवर्ष में छाए हुए थे और उनका प्रताप चरमोत्कर्ष पर था। हैहय अर्जुन वंश चंद्रवंशी था। माहिष्मती नरेश कार्तवीर्य अर्जुन इसी कुल के वंशज थे। भृगु ऋषि इस वंश के राजगुरु थे। जमदग्नि राजगुरु-परंपरा का निर्वाह कार्तवीर्य अर्जुन के दरबार में कर रहे थे, किंतु अनीतियों का विरोध करने के कारण कार्तवीर्य अर्जुन और जमदग्नि में मतभेद हो गए। परिणामस्व छोड़ कर चले गए। इस गतिविधि से रुष्ट होकर सहस्रबाहु कार्तवीर्य अर्जुन आखेट का बहाना करके अनायास जमदग्नि के आश्रम में सेना सहित पहुँच गया। ऋषि जमदग्नि ने अतिथि सत्कार किया, लेकिन स्वेच्छाचारी और युद्धोन्मादी अर्जुन ने प्रतिहिंसास्वरूप जमदग्नि की हत्या कर दी। उसने पूरा आश्रम उजाड़ दिया और ऋषि की प्रिय कामधेनु गाय को छीनकर ले गया। आश्रम के अनेक ब्राह्मणों ने कान्यकुब्ज के राजा गाधि के राज्य में शरण ली।
परशुराम जब यात्रा से लौटे तो इस घटना से कुपित व क्रोधित होकर उन्होंने हैहयवंश के विनाश का संकल्प लिया और इस हेतु पूरी सामरिक राजनीति को अंजाम दिया। परशुराम ने दो वर्ष तक लगातार ऐसे सूर्यवंशी और यादववंशी राज्यों की यात्राएँ की जो हैहय चंद्रवंशियों के प्रबल विरोधी थे। नेतृत्व दक्षता के कारण परशुराम को ज्यादातर चंद्रवंशियों ने समर्थन दिया। उन्होंने अपनी सेनाएँ और शस्त्र परशुराम की अगुवाई में छोड़ महायुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की। अवन्तिका के यादव, विदर्भ के शर्यात यादव, पंचनद के द्रुह यादव, कान्यकुब्ज (कन्नौज) के गाधिचंद्रवंशी आर्यवर्त सम्राट सुदास सूर्यवंशी, गांगेय प्रदेश के काशीराज, गांधार नरेश मांधाता, अविस्थान (अफगानिस्तान), मुजावत (हिंदुकुश), मेरु (पामिर), श्री (सीरिया), परशुपुर (वर्तमान पारस), सुसर्तु (पंजक्षीर), उत्तर कुरु (चीनी सतुर्किस्तान), वल्क, आर्याण (ईरान), देवलोक (सप्तसिंधु), और अंग-बंग (बिहार के संथाल परगना से बंगाल व असम तक) के राजाओं ने परशुराम का नेतृत्व स्वीकारते हुए इस महायुद्ध में भागीदारी की। शेष रह गई जातियाँ चेदि (चंदेरी) नरेश, कौशिक यादव, रेवत तुर्वसु, अनूप, रोचमान इत्यादि कार्तवीर्य अर्जुन की ओर से लड़ीं।
इस भीषण युद्ध में कार्तवीर्य अर्जुन और उसके कुल के लोग तो मारे ही गए, अर्जुन का साथ देने वाली जातियों के वंशजों का भी नाश हुआ। भरतखंड के इस महायुद्ध में परशुराम ने अहंकारी व उन्मत्त क्षत्रिय राजाओं का अंत कर लोहित क्षेत्र अर्थात अरुणाचल पहुँचकर ब्रह्मपुत्र नदी में अपना फरसा धोया। बाद में यहाँ पाँच कुंड बनवाए गए। जिन्हें समंतपंचका रुधिर कुंड कहा जाता है। ये कुंड आज भी अस्तित्व में हैं। इन्हीं कुंडों में भृगुकुलभूषण परशुराम ने युद्ध में हताहत हुए भृगु व सूर्यवंशियों का तर्पण किया। इस विश्वयुद्ध का समय 7200 विक्रम संवत् पूर्व माना जाता है। जिसे उन्नीसवाँ युग कहा गया है। इस युद्ध के बाद परशुराम ने समाज-सुधार व कृषि के प्रकल्प अपने हाथ में लिए। उन्होंने केरल, कोंकण, मालाबार और कच्छ क्षेत्र में समुद्र में डूबी कृषियोग्य भूमि को बाहर निकाला था। इस समय कश्यप ऋषि और इंद्र समुद्री पानी को बाहर निकालने की तकनीक में निपुण थे। अगस्त्य को समुद्र का पानी पी जाने वाले ऋषि और इंद्र को जल का देवता इसीलिए माना जाता है।
परशुराम ने इस क्षेत्र में अपने परशु का उपयोग रचनात्मक कार्य के लिए किया। उपजाऊ कृषि भूमि तैयार की। परशुराम ने शूद्रों को भी शिक्षित व दीक्षित कर जनेऊ धारण कराए और अक्षय तृतीया के दिन एक साथ हजारों युवक युवतियों को परिणय सूत्र में बाँधा। परशुराम द्वारा अक्षय तृतीया के दिन सामूहिक विवाह किए जाने के कारण ही इस दिन को परिणय बंधन के लिए बिना किसी मुहर्त के शुभ मुहूर्त माना जाता है। दक्षिण भारत देश का वह क्षेत्र है, जहाँ परशुराम के सबसे ज्यादा मंदिर मिलते हैं और उनके अनुयायी उन्हें भगवान के रूप में पूजते हैं। इस प्रकार भगवान परशुराम ने अनीति का अंत किया और धरती में जीवनयोग्य कृषिभूमि का निर्माण किया।
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