ऐतिहासिक कदम: सूअरों से इंसानों में गुर्दा प्रत्यारोपण की राह खुली

अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में विज्ञान ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। अब मनुष्यों में सूअरों के जीन-संपादित गुर्दे प्रत्यारोपित करने के लिए बड़े पैमाने पर नैदानिक परीक्षणों को मंज़ूरी मिल गई है। अमेरिकी कंपनी ईजेनेसिस ने बताया कि अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने मानव परीक्षणों की अनुमति दे दी है। नैदानिक परीक्षणों की मंज़ूरी नवीनतम क्रिस्पर तकनीक पर आधारित है, जिसकी मदद से सूअरों के डीएनए को मनुष्यों के अनुकूल बनाने के लिए उसमें बदलाव किया गया है। विशेष रूप से, अल्फा-गैल नामक कार्बोहाइड्रेट उत्पन्न करने वाले जीन को हटा दिया गया है, जो आमतौर पर मानव शरीर को सूअर के अंग को तुरंत अस्वीकार करने के लिए मजबूर करता है। अगले ढाई साल में 33 मरीज़ों पर परीक्षण ईजेनेसिस अगले ढाई साल में 33 मरीज़ों पर परीक्षण करेगी। एक अन्य अमेरिकी कंपनी यूनाइटेड बेराप्यूटिक्स इसी साल से 50 मरीज़ों पर अपने परीक्षण शुरू करने जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये मानव परीक्षण सफल रहे, तो आने वाले दशक में अंग संकट हमेशा के लिए खत्म हो सकता है।
अब तक अमेरिका में इस तरह के प्रयोग कुछ ही मरीज़ों पर किए गए हैं- रिक स्लेमन (62) को मार्च 2024 में सुअर की किडनी दी गई। वे दुनिया के पहले जीवित प्राप्तकर्ता बने। दो महीने बाद हृदय की समस्या से उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन किडनी सामान्य रूप से काम कर रही थी। लिसा पिसानो (54) को अप्रैल 2024 में न्यूयॉर्क के एनवाईयू लैंगोन अस्पताल में हृदय पंप और सुअर की किडनी दोनों दी गईं। किडनी कुछ ही हफ़्तों में निकालनी पड़ी और जुलाई में उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन इस प्रयोग से डॉक्टरों को बहुमूल्य जानकारी मिली। टिम एंड्रयूज़ (67) अब तक के सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाले सुअर की किडनी प्राप्तकर्ता हैं। सबसे ताज़ा मामला बिल स्टीवर्ट (54) का है, जिन्हें जून 2025 में मैसाचुसेट्स जनरल अस्पताल में किडनी दी गई थी। अब वे घर लौट आए हैं और उन्होंने फिर से काम करना भी शुरू कर दिया है। हर मामले ने विज्ञान को एक नया सबक सिखाया है और अगले मरीज़ के लिए उम्मीद की एक किरण खोली है।
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