न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू

INDIA/NEW DELHI : सरकारी आवास से बेहिसाब जली हुई नकदी बरामद होने के मामले में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इससे संबंधित प्रस्तावों के नोटिस सोमवार को राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपे गए। लोकसभा में पेश किए गए प्रस्ताव पर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी हस्ताक्षर किए हैं।
लोकसभा के 152 और राज्यसभा के 63 सदस्यों ने नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं। अगर प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो दोनों सदनों के प्रमुख मिलकर एक जांच समिति बनाएंगे, जो न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच करेगी। साथ ही, दोनों सदनों में अलग-अलग महाभियोग प्रस्ताव भी पेश किए जाएंगे। राज्यसभा के सभापति उपराष्ट्रपति धनखड़ ने सदन को बताया कि उन्हें न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 217 (1बी), 218 और 124 (4) तथा न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 की धारा 31बी के तहत प्रस्ताव का नोटिस मिला है। इस नोटिस पर राज्यसभा के 50 से ज़्यादा सदस्यों के हस्ताक्षर हैं, इसलिए आवश्यक संख्या की शर्तें पूरी हो गई हैं। लोकसभा अध्यक्ष बिरला को सौंपे गए नोटिस पर 152 सदस्यों के हस्ताक्षर हैं।
आंतरिक समिति ने धन छिपाने की बात कही थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश न्यायमूर्ति वर्मा जब दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीश थे, तब उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास में जले हुए नोटों के बंडल मिले थे। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की जाँच के लिए एक आंतरिक समिति गठित की, जिसने अपनी रिपोर्ट में धन छिपाने और न्यायिक मर्यादा के उल्लंघन की बात कही। रिपोर्ट में इसे एक गंभीर अनियमितता बताया गया।
100 लोकसभा और 50 राज्यसभा सदस्यों का समर्थन आवश्यक- किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए नोटिस पर लोकसभा के कम से कम 100 और राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक हैं। न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को नोटिस स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार है। यदि प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो सदन के अध्यक्ष या सभापति एक तीन-सदस्यीय समिति का गठन करेंगे। इस समिति में सर्वोच्च न्यायालय के एक वरिष्ठ न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित वकील शामिल होंगे। समिति तीन महीने में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। यह जांच रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत की जाएगी। इस पर दोनों सदनों में चर्चा होगी। यदि आवश्यक हो, तो मतदान भी करवाना होगा।
चूँकि नोटिस दोनों सदनों में एक ही दिन दिया गया है, इसलिए आवश्यक संख्या में सांसदों के हस्ताक्षर भी आवश्यक हैं। ऐसी स्थिति में, प्रस्ताव को स्वीकृत कराना होगा। अब प्रस्ताव सदन की संपत्ति है। यदि प्रस्ताव अलग-अलग दिनों में प्रस्तुत किया जाता है, तो जिस दिन इसे पहले प्रस्तुत किया गया था, वह दिन मान्य होगा। प्रस्ताव का दोनों सदनों में पारित होना आवश्यक है। यदि प्रस्ताव किसी एक सदन में भी अस्वीकृत हो जाता है, तो प्रस्ताव अस्वीकृत हो जाएगा।
संसद के दोनों सदनों में किसी न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग का नोटिस स्वतंत्र भारत का पहला और अनूठा मामला है। दरअसल, भ्रष्टाचार के विरुद्ध सरकार और विपक्ष के बीच श्रेय लेने की जंग के चलते ऐसा हुआ है। लोकसभा में इस आशय के प्रस्ताव पर विपक्ष के प्रमुख नेताओं, जिनमें स्वयं विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी शामिल हैं, ने हस्ताक्षर किए हैं। सरकार लोकसभा में प्रस्ताव लाकर इसका सारा श्रेय लेना चाहती थी। इसके जवाब में, विपक्ष ने राज्यसभा में प्रस्ताव लाकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई का श्रेय लेने की कोशिश की है। श्रेय लेने की इस जंग ने महाभियोग की प्रक्रिया को ऐतिहासिक और रोचक बना दिया है।
नए खबरों के लिए बने रहे सटीकता न्यूज के साथ।




