प्रेरणा

ध्यान से आनंद की ओर motivation

 Motivation| प्रेरणा:  महायोगी श्री अरविंद ने यह स्पष्ट किया है कि ‘केवल मन आधारित मनुष्य संतुष्ट और समृद्ध नहीं हो सकता। संतुष्टि, समृद्धि और आनंद की प्राप्ति के लिए मनुष्य को मन से आत्मा की ओर  जाना होगा। व्यक्तिगत चेतना को दिव्य चेतना से   समाहित होना होगा।’ वास्तव में यह सत्य है कि मन आधारित जीवन संकुचित जीवन है, संकीर्ण जीवन है। मन आधारित मनुष्य मन के इशारे पर ही नाचता, गाता, हँसता, रोता और जगत् व्यवहार, लोक-व्यवहार करता है। इसलिए मनुष्य को वास्तविक सुख, शांति, समृद्धि और आनंद की उपलब्धि नहीं हो पाती। शाश्वत सुख-शांति, समृद्धि  व आनंद का स्त्रोत मन नहीं, वरन आत्मा है।  

                   इसलिए जब साधना के निरंतर अभ्यास से मन नियंत्रित होकर आत्मा से समाहित हो जाता है, तब मनुष्य को हर पल आत्मसंतुष्टि, आत्मसुख व आत्मिक आनंद की उपलब्धि, अनुभूति होने लगती है। जब तक मन आत्मा से युक्त नहीं, आत्मा से संचालित नहीं, तब तक वह चंचल और अनियंत्रित ही होता है, फलस्वरूप वह मनुष्य के जीवन में नानाविध द्वंद्वों, दुःखों, कष्टों को आकर्षित और आमंत्रित करता है। फलस्वरूप मनुष्य का जीवन कष्टों और कठिनाइयों से भर जाता है। सारा खेल ही मन का है। मन के खेल को  समझना आवश्यक है। हमारे अचेतन मन में कर्म संस्कारों, स्मृतियों का संसार है और जब तक हमारे मन में यह संसार समाया हुआ है, तब हमें शांति, समृद्धि और संतुष्टि नहीं मिल सकतीं। मन में बसा यह संसार बड़ा विचित्र है। इसमें अनेक कडुई और मीठी स्मृतियाँ होती हैं, अच्छे-बुरे कर्मों कै संस्कारों का जखीरा है। इसलिए जब हम एकांत में बैठकर शांत चित्त होने का प्रयास करते हैं तो मन में बसा हुआ संसार चलचित्र की भाँति हमारे सम्मुख एक-एक करके दृश्यमान होने लगता है, जिसे हम मन की आँखों से देखते जाते हैं। किसी दृश्य को देखकर हमें दुःख होता है तो किसी दृश्य को देखकर सुख होता है, किसी को देखकर घृणा होती है तो किसी को देखकर लज्जा आती है। किसी बात को याद कर हम रोने लगते हैं तो किसी घटना को याद कर हम हँसने लगते हैं। किसी घटना को याद कर हम लज्जित होते हैं तो किसी घटना को याद कर हम सुखी होते हैं तो किसी को याद कर दुःखी होते हैं। 

                            इस प्रकार किसी घटना को याद कर हम क्रोध से भर जाते हैं और उस घटना से जुड़े व्यक्ति से बदला लेने की सोचने लगते हैं। किसी मधुर स्मृति का स्मरण होते ही हम उन स्मृतियों से जुड़े व्यक्तियों, वस्तुओं के प्रति पुनः आकर्षित हो उन्हें पाने को आकुल हो उठते हैं व उन व्यक्तियों, वस्तुओं के प्रति आसक्त हो जाते हैं। एक संसार वह है, जो हमें बाहर दिखाई पड़ता है; जिसमें मकान, दुकान, रेल, सड़क, वायुयान, आकाश, नदी, समुद्र, वन-उपवन, खेत- खलिहान, सूर्य-चंद्र, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि दिखाई देते हैं और एक संसार वह है, जो हमारे मन में समाया हुआ है, बसा हुआ है और जिसका हमारे ऊपर आधिपत्य है, अधिकार है और हमें अपने असर से, प्रभाव से वह कभी रोने तो कभी हँसने,  कभी सुखी तो कभी दुःखी होने को विवश करता है। कभी अच्छे तो कभी बुरे, कभी शुभ तो कभी अशुभ, कभी पुण्य तो कभी पापकर्म करने को विवश करता है। 

          इसलिए हम वास्तविक सुख- शांति, समृद्धि और आनंद से वंचित हैं। कभी हम लाखों की भीड़ के बीच भी स्वयं को अकेला पाते हैं तो कभी अकेला, एकांत में होते हुए भी अपने आप को अपने मन में बसे संस्कारों, स्मृतियों की भीड़ में पाते हैं और परेशान होते हैं। जब तक मन में यह संसार बसा है, तब तक हम सुख-दुःख,  हर्ष-विषाद, मान-अपमान के द्वंद्वों से घिरे रहेंगे  और दुःखी तथा परेशान रहेंगे। इन द्वंद्वों से मुक्त हो जाने पर ही वास्तविक सुख-शांति और समृद्धि को पाना संभव है, पर यह  तभी संभव है, जब मन में बसा यह संसार सदैव के  लिए समाप्त हो जाए और संस्कारों के संसार से  मुक्त होकर मन आत्मा से युक्त हो जाए। तभी हमें आत्मा से निस्सृत आनंद और ज्ञान की उपलब्धि हो सकेगी और मन को संस्कारों के संसार से मुक्त कर आत्मा से युक्त करने का बड़ा ही प्रभावशाली साधन है- ध्यान । 

         मन से परमात्मा का ध्यान करते रहने से मन में बसे कर्म-संस्कारों का संसार विलुप्त होने लगता है, मन निर्मल होने लगता है, फिर उस निर्मल मन  से आत्मा में परमात्मा का साक्षात्कार होने लगता  है। आत्मा से आनंद, ज्ञान, प्रेम निस्सृत होने लगता  है। ध्यान के अभ्यास से अहम् का विसर्जन, चेतना  का जागरण और जीवन का रूपांतरण होने लगता है। आत्मा-परमात्मा के मिलन संयोग को ही परमानंद कहा गया है। 

   परमपूज्य गुरुदेव ने यह स्पष्ट किया है कि ‘आत्मा-परमात्मा के मिलन संयोग से ही मनुष्य को परमानंद की अनुभूति होती है। विषयों से मिलने वाले क्षणिक सुख से मनुष्य कभी अघाता नहीं, कभी भी उसे तृप्ति मिलती नहीं और उसकी शक्ति सदैव नष्ट होती रहती है, पर आत्मा में ब्रह्म का सतत ध्यान करते-करते साधक को सहज ही आत्मा में ब्रह्म के संस्पर्श से परमानंद की अनुभूति होती है और वह तृप्ति, तुष्टि और शांति पाता है। मैं देह मात्र नहीं हूँ। मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ, मैं ब्रह्म हूँ, इस भाव का सतत अभ्यास, स्मरण, ध्यान करते- करते साधक उसी ब्रह्म में स्थित हो जाता है। अभिन्न भाव से सतत ब्रह्म में स्थित साधक को ब्रह्मभूत कहते हैं।’ अस्तु यह स्पष्ट है कि परमात्मा का सतत चिंतन, ध्यान करते रहने से ही मन आधारित मनुष्य आत्मा की ओर अग्रसर हो सकता है और परमानंद की प्राप्ति कर सकता है। परमानंद की प्राप्ति तभी संभव है, 

                      जब मन चंचल होकर इधर-उधर न भटके, मन में किसी तरह के विकार उत्पन्न न हों, मन पूरी तरह निर्मल हो और मन ब्रह्ममय हो और ब्रह्ममय हो जाने पर मन जब एक बार ब्रह्म के परम सौंदर्य और परमानंद का रसास्वादन कर लेता है, तब उसे सारे विषयभोग फीके और तुच्छ लगने लगते हैं और मन की सहज वृत्ति ब्रह्ममय हो जाती है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि ‘जिसने एक बार ब्रह्मानंदरस का स्वाद चख लिया, उसे रंभा और तिलोत्तमा भी चिता की भस्म के समान प्रतीत होती हैं।’ अस्तु यह स्पष्ट है कि ब्रह्म का ध्यान, सुमिरन, भजन, भक्ति करते रहने से ही मन की वृत्तियाँ मिटती हैं, सांसारिक आसक्तियाँ मिटती हैं और मन में भगवान के प्रति प्रेम और अनुराग पैदा होता है। इसलिए मन को ब्रह्ममय करने के लिए मन को आत्मा से युक्त करना आवश्यक है। 

          गीताकार भगवान श्रीकृष्ण गीता (6.28) में कहते हैं- युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ 

                अर्थात इस प्रकार पापरहित योगी अपने मन को सदा के लिए आत्मा के साथ युक्त करके निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सहज ही ब्रह्म संस्पर्श अर्थात परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनंत आनंद का अनुभव करता है। ध्यान के फलस्वरूप साधक को परमानंद की प्राप्ति के साथ-साथ भौतिक सुखों की भी प्राप्ति होती है। ध्यान के प्रभाव से मनुष्य का मन व तन, दोनों स्वस्थ होते हैं। मनोबल, आत्मबल की वृद्धि होती है, जिससे उसे भौतिक क्षेत्र में भी सर्वत्र सफलता प्राप्त होती है। वह कुंठा, तनाव, अवसाद, चिंता, उद्विग्नता आदि मानसिक व्याधियों एवं नानाविध मनोकायिक रोगों से भी मुक्त होकर उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त कर भौतिक सुख  प्राप्त करता है।  

             मनोचिकित्सक फ्रायड के अनुसार अचेतन मन में दमित, उपेक्षित और अव्यवस्थित विचारों का जमाव होने के कारण विध्वंसक और कुंठित भावनाओं का ध्रुवीकरण होने लगता है, पर ध्यान के निरंतर अभ्यास से अचेतन मन में दफन व दमित विचार चेतना के तल पर आकर विसर्जित और विलीन होने लगते हैं। अचेतन मन में दमित, उपेक्षित विचारों, विकारों, इच्छाओं के कारण विध्वंसक व कुंठित भावनाओं का ध्रुवीकरण होने लगता है, जिसके प्रभाव में आकर मनुष्य नानाविध बुरे कर्म करने को प्रेरित होता है। नानाविध मानसिक, शारीरिक व्याधियों का शिकार होता है, इसलिए ध्यान के  प्रभाव से अचेतन मन का परिष्कार होने से मनुष्य  मानसिक व शारीरिक व्याधियों से भी मुक्त होकर शरीर व मन से स्वस्थ व प्रसन्न हो उठता है।                                             इसलिए ध्यान से शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य की उपलब्धि के साथ-साथ, आत्मिक ज्ञान व आत्मिक आनंद की उपलब्धि भी होती है। – मन के आत्मा में समाहित होते ही साधक स्वयं को सत्-चित्-आनंदस्वरूप आत्मा में अवस्थित पाता है और आत्मा में अवस्थित होने के कारण अर्थात अपने वास्तविक स्वरूप में अवस्थित होने के कारण वह पूरी तरह निर्भय हो जाता है। वह यह अनुभव करने लगता है कि आत्मा परमात्मा का अंश है। आत्मा सत्य-सनातन और पुरातन है। फलस्वरूप वह मृत्यु के भय से भी मुक्त हो जाता है। संत कबीर ने कहा है- जिस मरने से जग डरे, मेरे मन आनंद । मरने ही ते पाइए पूरन परमानंद ॥ तब ध्यान साधक के लिए ‘आत्मा का अजर, अमर होना, आत्मा का आनंद और सौंदर्य का स्रोत होना’ आदि कोई सुनी-सुनाई बात नहीं रह जाती; क्योंकि वह आत्मा में अवस्थित होकर आनंद और सौंदर्य को हर पल जीता और अनुभव करता है। सामान्य मनुष्य को हर पल कुछ खोने, धन खोने, बीमार होने या मरने का भय सताता रहता है, पर आत्मा के अमर होने का अनुभव होते ही साधक को कोई भय नहीं रह जाता। वह निर्भय हो जाता है। ध्यान के निरंतर अभ्यास से आत्मा और ब्रह्म की एकता का अनुभव पा लेने के कारण साधक को जीवन में किसी प्रकार का कोई भय नहीं रह जाता है। वह निर्भय होकर इस संसार में जीता है और हर पल आत्मिक सुख-शांति और आनंद की अनुभूति करता है।

               स्वामी विवेकानंद के अनुसार – ‘ध्यान मन को सभी आने वाली विचार-तरंगों और दुनिया भर के माया-मोह से निजात दिलाता है। मन को आत्मा से समाहित करता है। इससे हमारी चेतना का * विस्तार होता है और हमें आत्मबोध की उपलब्धि होती है।’ अस्तु हमें भी नित्य 10 से 15 मिनट तक ध्यान करना चाहिए। अपने मन में नित्य परमात्मा का ध्यान करते रहना चाहिए। जैसे-जैसे मन ध्यान में डूबता  जाएगा, आत्मा में परमात्मा का अनुभव स्वयं ही उतरता जाएगा। हाँ ! 

                 धीरे-धीरे ध्यान के अभ्यास को 15 मिनट से बढ़ाकर घंटों तक किया जा सकता है। किसी सरोवर, नदी, तीर्थस्थान, पवित्र स्थान या प्रकृति की गोद में बैठकर ध्यान का अभ्यास किया जा सकता है। अपनी रुचि अनुसार सगुण या निर्गुण ब्रह्म का अपने हृदय में ध्यान किया जा सकता है और ध्यान के निरंतर अभ्यास से निश्चित ही शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ शाश्वत सुख, शांति, आनंद और भगवत्प्राप्ति की जा सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं, संशय नहीं। हम भी क्यों न ध्यान से आनंद की ओर चल पड़ें। 

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  देवता और दैत्य अपना-अपना प्रतिनिधिमंडल लेकर भगवान के पास पहुँचे। उन्होंने भगवान के सम्मुख अपना निवेदन रखा और बोले – “प्रभु! सृष्टि के चक्र से मुक्त होने के लिए आपने जो साधना का विधान बनाया है, वह बड़ा कष्टसाध्य है। कृपया यह व्यवस्था हमें दे दें, ताकि हम थोड़ा सरल मार्ग निकाल सकें।” भगवान ने सहजता से यह व्यवस्था उनको प्रदान कर दी। कुछ दिनों तक सब ठीक चला, बाद में समूह ने देखा कि बिना कष्टसाध्य प्रयास के जो आत्माएँ जीवनमुक्त हो रही हैं जनसामान्य के मन से जीवन के प्रति सम्मान की भावना जा रही है। लोग बे-मन से थोड़ी-बहुत साधना में रत होते और उसका त्वरित प्रभाव मिलने पर पुनः भोग-विलास में लिप्त हो जाते। 

          सृष्टि में धीरे-धीरे अव्यवस्था फैलने लगी। चिंतातुर प्रतिनिधिमंडल पुनः भगवान के पास पहुँचा और प्रस्तुत स्थिति का विवरण उन्हें प्रदान किया। भगवान हँसे और बोले – “साधना का अर्थ ही संघर्ष है। बीज पृथ्वी के साथ संघर्ष करता है, तभी उसमें से अंकुर निकल पाता है। भ्रूण शरीर के साथ संघर्ष करता है तो जन्म पाता है। तुमने साधना में से संघर्ष निकाल लिया तो वह मूल्यहीन हो गई।” प्रतिनिधिमंडल को अपनी भूल का भान हुआ और साधना का पथ पुनः तपस्वियों के लिए सुरक्षित हो गया।

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