प्रेरणा

सामगान की देन हैं संगीत

  Motivation| प्रेरणा:  भारतीय संस्कृति वेदों को अपौरुषेय मानती है, वैदिक परंपरा को ही भारतीय संस्कृति का आधार माना जाता है। वेद शुद्ध ज्ञान का स्वरूप हैं और आर्षमान्यता के अनुसार चेतना की उच्चतम अवस्था में आत्मसत्ता की प्रयोगशाला में बैठकर अनुभव किया गया ज्ञान वैदिक ज्ञान है- यही वेदों का समवेत संदेश है। वेद चार माने गए हैं, जिनमें सामवेद मूल रूप से वैदिक संगीत एवं दैवी गानों के लिए जाना जाता है। सामवेद ही भारतीय संगीत का मूल आधार भी है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने सामवेद के प्रति अपने इस प्रेम को इन्हीं शब्दों में अभिव्यक्त किया है कि ‘वेदानां सामवेदोऽस्मि ।’ अर्थात वेदों में मैं सामवेद हूँ या यों कहें कि प्रभु संगीत को और विशेष रूप से वैदिक संगीत को अपना कलात्मक ऐश्वर्य मानते हैं। 

                  वेद-ज्ञाताओं के अनुसार, वेदों की उत्पत्ति गायत्री से हुई और ओंकार का शब्द वेदों का मूल प्रतीक बना। इसीलिए चिंतक एवं विचारक ओऽम् (ॐ) को वर्णमाला में स्थान न देते हुए इसे सबसे अलग, सबसे ऊपर एवं सबसे श्रेष्ठ मानते हैं तथा सृष्टि का प्रतीक बतलाते हैं। ॐ से निकला नाद स्वर की उत्पत्ति का हेतु बना और वही स्वर भारतीय संगीत का आधार है। इसीलिए भारतीय संगीत को देवज्ञान की संज्ञा दी जाती रही है; क्योंकि इसमें उत्पन्न एवं रचित स्मृतियाँ ॐ को, सृष्टि को, परमेश्वर को आधार बनाकर ही लिखी गई हैं। इसीलिए सामवेद को भारतीय संगीत कला का प्राचीनतम दर्शन माना गया है

                  वैदिक मान्यता के अनुसार, प्रजापति ब्रह्मा ने संगीत का निर्माण सामवेद से ही किया। इसीलिए सामगान में वैदिक मंत्रों का बाहुल्य है; क्योंकि जो मंत्र गाए जाते हैं, वे ही साम कहलाते हैं। इनका उद्देश्य भावना की प्रगाढ़ता द्वारा रचे गए गीतों को सुमधुर रूप में परमपिता परमेश्वर की आराधना करना था और इसी कारण से सामगान का ईश्वरीय आराधना का प्रभावशाली माध्यम मात्र गद्य है। ऋषि कहते हैं- ‘स्वरः सामशब्देन लोकोऽभिधीयते’ अर्थात साम का प्रयोगात्मक अर्थ स्वर है और स्वरलहरियों के आधार पर ही सामगानों की रचना की गई है। 

         ऐसा नहीं है कि सामगान मात्र सामवेद में ही उपलब्ध हैं, अपितु ऋग्वेद में आए अनेक सूक्त, स्तुतियाँ तथा ऋचाएँ भी इसी वैदिक संगीत के नियमों पर आश्रित हैं; क्योंकि उन स्तुतियों का मूल उद्देश्य भी प्रभु को अपनी श्रद्धा का अर्पण करना ही था। साम शब्द का सामान्य अर्थ गीत ही माना जाता है और ऐसा नहीं है कि यह शब्द मात्र वैदिक परंपरा में अपना स्थान रखता है। ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल में आई ईश्वर- स्तुतियाँ भी साम (Psalm) कहलाती हैं, जो समानता कहीं-न-कहीं एक ही आधार की ओर इशारा करती है। संगीत मूलरूप से स्वर और लय, दो तत्त्वों पर आधारित होता है। वेदों में लय को ‘छंद’ से संबोधित किया जाता है और विभिन्न वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ गायत्री छंद, अनुष्टुप छंद इत्यादि छंदों को प्रयुक्त किया जाता रहा है। 

                      साम के मूलरूप से दो भाग किए गए हैं – पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक । दोनों ही तरह के आर्चिक ग्रंथों में ऋचाएँ संगृहीत हैं। पूर्वार्चिक की ऋचाओं पर जो सामगान  आधारित हैं उन्हें गेयगान या प्रकृतिगान तथा उत्तरार्चिक पर आधारित सामगान उहगान कहलाते हैं। आर्चिक ग्रंथों में तीन तरह के स्वर मूल रूप से प्रयुक्त होते रहे हैं; जिन्हें उदात्त, अनुदात्त और स्वरित कहते हैं, परंतु समय के साथ-साथ प्रचय और सन्नतर नामक स्वर भी इस श्रृंखला में समाविष्ट हो गए। एक स्वर के साथ युक्त सामगान आर्चिक, दो स्वरों वाले सामगान को गाधिक तथा तीन स्वरों वाले सामगान को सामिक कहने का प्रचलन रहा है। बिना विषय की गूढ़ता में प्रवेश करे, यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान संगीत का स्वरूप वैदिक परंपरा से प्रारंभ हुआ और यज्ञ-अनुष्ठानों के समय आश्रम में लिए जाने वाले स्वर क्रमशः वर्तमान शैली में विकसित होते चले गए। जिन सप्तकों को वर्तमान भारतीय संगीत का आधार माना जाता है, सामगान भी ऐसे ही स्वरसप्तकों से बद्ध था, मात्र उनके नाम भिन्न थे। इन्हें क्रमशः क्रुष्ट, प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, मंद्र, अतिस्वार कहा जाता था और आज भी संगीत गायन में इसी शैली के आधार पर अभ्यास किया जाता है। 

    नारदीय शिक्षा में उद्धरण मिलता है कि- 

  यस्सामगानां प्रथमस्त ववेणोमर्थ्यमः स्वरः । 

 यो द्वितीयस्य गान्धारः तृतीयस्त्वृषभः स्मृतः

  चतुर्थष्षड्ज इत्याहुः पंचमो धैवतो भवेत।

 षष्ठो निषादो विज्ञेयः सप्तमः पंचमः स्मृतः ॥ 

       अर्थात स्वरों में प्रथम स्वर मध्यम स्वर (वंशी का), द्वितीय स्वर वेणु का गंधार, तृतीय स्वर वेणु का ऋषभ, चतुर्थ स्वर वेणु का षड्ज, पंचम स्वर वेणु का धैवत, षष्ठ स्वर वेणु का निषाद एवं सप्तम स्वर वेणु का पंचम है। इस दृष्टि से देखें तो सामगान का क्रम म ग रे साधनिप होना चाहिए। यही क्रम धीरे-धीरे विकसित होते हुए वर्तमान स्वरसप्तक में परिवर्तित हुआ प्रतीत होता है। प्रचलित मान्यताओं, विशेषज्ञों के मत एवं विखरे हुए प्रमाणों का समुचित दृष्टि से अध्ययन करने पर यही प्रतीत होता है कि वर्तमान भारतीय शास्त्रीय संगीत वैदिक साम गायन अथवा सामगान की ही देन है।

      इसीलिए बहुत लंबे समय तक शास्त्रीय संगीत को संगीतज्ञ वैदिक कर्मकांडों की तरह वंदनीय- – 

         तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके ।

      तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥

                                   – ईशावास्योपनिषद्-5 अर्थात वे (परमात्मा) चलते हैं, वे नहीं भी चलते; वे दूर हैं और समीप भी। वे प्रभु इस समस्त जगत् से परिपूर्ण भी हैं और इससे बाहर भी। –

         पूजनीय मानते रहे; क्योंकि इसका आधार वैदिक ज्ञान एवं दिव्य चिंतन ही था। कालांतर में इसका स्वरूप विकृत हुआ और इसको कतिपय लोगों ने व्यवसाय का स्वरूप देने की चेष्टा की, जिससे न केवल संगीत की दिव्यता प्रभावित हुई, वरन इसमें निहित मूल्यों का भी ह्रास हुआ है। प्राचीनकालीन मंत्र रागों में परिवर्तित हुए हैं और यदि उन्हीं मूल्यों को संरक्षित रखते हुए भारतीय संगीत प्रगति करता रहेगा तो यह सांस्कृतिक विरासत अक्षुण्ण रहेगी अन्यथा हम इस विराट संपदा को व्यर्थ ही गवां बैठेंगे।

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