स्लीप एपनिया के इलाज में नई उम्मीद: दवा से सोते समय सांस रुकने की समस्या में मिल सकती है राहत
नई स्टडी में सामने आया कि मिर्गी की एक पुरानी दवा स्लीप एपनिया के मरीजों में रात के दौरान सांस रुकने की घटनाओं को काफी हद तक कम कर सकती है।

स्लीप एपनिया से पीड़ित कई लोगों के लिए रात में भारी-भरकम मशीन के साथ सोना आसान नहीं होता। लेकिन वैज्ञानिकों की नई research से संकेत मिल रहे हैं कि भविष्य में इस समस्या का इलाज दवाओं के जरिए भी संभव हो सकता है।
यूरोप में हुए एक हालिया क्लिनिकल ट्रायल में पाया गया कि मिर्गी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एक दवा स्लीप एपनिया के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकती है। इस ट्रायल में जिन प्रतिभागियों को दवा की अधिक मात्रा दी गई, उनमें सोते समय सांस रुकने की समस्या लगभग 50 प्रतिशत तक कम देखी गई।
स्वीडन की University of Gothenburg के पल्मोनरी मेडिसिन विशेषज्ञ जैन हेडनर के अनुसार, वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसी दवाओं पर काम कर रहे हैं जो स्लीप एपनिया के मूल कारणों को प्रभावित कर सकें। उनके मुताबिक इस स्टडी के नतीजे बताते हैं कि दवाओं के जरिए इस बीमारी पर प्रभाव डालना संभव हो सकता है।
स्लीप एपनिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें सोते समय व्यक्ति की ऊपरी श्वास नली अचानक बंद हो जाती है। इससे सांस लेने का पैटर्न बाधित हो जाता है और शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जिसके कारण नींद की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है।
अब तक इस बीमारी के इलाज के लिए CPAP मशीन को सबसे प्रभावी माना जाता रहा है। यह मशीन रात भर एयरवे को खुला रखने में मदद करती है। हालांकि, कई मरीजों को इसे इस्तेमाल करना असुविधाजनक लगता है।
हाल के वर्षों में दवाओं के जरिए इलाज की दिशा में भी प्रयास शुरू हुए हैं। 2024 में अमेरिकी नियामक संस्था U.S. Food and Drug Administration ने मोटापे से जुड़े मध्यम से गंभीर स्लीप एपनिया के मरीजों के लिए टिरज़ेपेटाइड नामक दवा को मंजूरी दी थी। यह दवा मुख्य रूप से वजन कम करने में मदद करती है, जिससे गर्दन के आसपास की चर्बी कम होकर एयरवे थोड़ा खुला हो जाता है।
हालांकि यह दवा स्लीप एपनिया की सभी आंतरिक समस्याओं को ठीक नहीं करती। इसलिए वैज्ञानिक ऐसी दवा की तलाश में हैं जो सीधे सांस लेने के नियंत्रण और मांसपेशियों की मजबूती पर असर डाल सके।
इसी दिशा में वैज्ञानिकों ने सुल्टियाम नाम की एक एंटीकॉन्वल्सेंट दवा पर clinical trial किया। यह दवा 1950 के दशक में विकसित हुई थी और कई यूरोपीय देशों में मिर्गी के कुछ प्रकारों के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाती है।
स्टडी में 240 प्रतिभागियों को चार समूहों में बांटा गया। एक समूह को प्लेसबो दिया गया, जबकि बाकी समूहों को रोजाना 100 mg, 200 mg और 300 mg सुल्टियाम दी गई। यह ट्रायल बेल्जियम, चेकिया, फ्रांस, जर्मनी और स्पेन के मेडिकल संस्थानों में किया गया।
नतीजों में सामने आया कि दवा लेने वाले प्रतिभागियों में रात के दौरान सांस लेने की समस्या कम हुई, शरीर में ऑक्सीजन का स्तर बेहतर रहा और दिन में नींद आने की शिकायत भी घटी।
विशेष रूप से 200 mg और 300 mg डोज़ लेने वाले मरीजों में सबसे ज्यादा सुधार देखा गया। इन दोनों डोज़ से स्लीप एपनिया की गंभीरता करीब 30 से 50 प्रतिशत तक कम हो गई।
हालांकि दवा की अधिक मात्रा के साथ कुछ साइड इफेक्ट भी देखे गए, इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि 200 mg की मात्रा सबसे संतुलित हो सकती है।
अनुमान है कि स्लीप एपनिया दुनिया भर में करोड़ों लोगों को प्रभावित करता है और यह कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा है, जैसे हृदय रोग, याददाश्त से जुड़ी दिक्कतें और इंसुलिन से संबंधित समस्याएं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में ऐसी दवाएं विकसित हो जाती हैं जो इस बीमारी के असली कारणों को ठीक कर सकें, तो इससे इलाज अधिक सस्ता, आसान और मरीजों के लिए आरामदायक बन सकता है।
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