ओम तत – सत है परमात्मा

Motivation| प्रेरणा: (श्रीमद्भगवद्गीता के श्रद्धात्रयविभागयोग नामक सत्रहवें अध्याय की बाईसवीं किस्त)
[ विगत किस्त में श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय के बाईसवें श्लोक पर चर्चा की गई थी। इस श्लोक में श्रीभगवान कहते हैं कि जो दान बिना सत्कार के तथा अवज्ञापूर्वक अयोग्य देश और काल में कुपात्र को दिया जाता है, वह दान तामस कहलाता है। दान देते समय यदि भावना अपमान की है अर्थात ऐसा भाव है कि हम दान नहीं दे रहे हैं, वरन किसी अन्य व्यक्ति के ऊपर एहसान कर रहे हैं तो वो असत्कार की भावना, अवज्ञा की भावना तामसिक दान का पहला आधार बनती है। भगवान कृष्ण ऐसी भावना को ‘असत्कृतम्’ एवं ‘अवज्ञातम्’ कहकर पुकारते हैं। कई लोग दान देते तो हैं, परंतु उनके मन में कहीं यह भावना होती है कि जिसे दान दिया जा रहा है, वो हमसे तुच्छ एवं हीन है और वो उनको दान कुछ इस तरह देने का प्रयत्न करते हैं, मानो भिक्षा दी जा रही हो।
इस भावना – को भगवान कृष्ण तामसिक भावना कहते हैं। इसके साथ ही कुछ लोग दान देते समय काल, समय, परिस्थितियाँ इत्यादि नहीं देखते- इस भावना को भी भगवान कृष्ण तामसिक दान मानते हैं। भगवान कृष्ण कहते हैं कि इस तरह का दान देने वाला व्यक्ति शास्त्रोक्त समीकरणों एवं सिद्धांतों को भी नहीं मानता और कुपात्र को देने में, कुसमय देने में एवं गलत उद्देश्य के लिए भी दान देने में संकोच नहीं करता। ऐसे दान को भगवान कृष्ण तामसिक दान की श्रेणी में रखते हैं। इस तरह कुपात्र को देने वाला, असत्कार, अवज्ञा से देने वाला दान तामसिक दान कहलाता है।]
ॐ तत्-सत्-इन तीन प्रकार के नामों से जिस परमात्मा का संकेत किया गया है, उसी परमात्मा से सृष्टि के आदि में वेदों तथा ब्राह्मणों और यज्ञों की रचना हुई है और इसीलिए वैदिक सिद्धांतों को मानने वाले पुरुषों की शास्त्रविधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा ‘ॐ’ इस परमात्मा के नाम का उच्चारण करके ही आरंभ होती हैं। बड़ा ही अद्भुत एवं अलौकिक सूत्र है यह। यहाँ भगवान कहते हैं वो शुद्ध, चैतन्य, निर्विकार, शाश्वत चैतन्य सत्ता जिन्हें हम परमात्मा के नाम से जानते हैं-वे परमात्मा तीन प्रकार के नामों से जाने जाते हैं, ॐ, तत् एवं सत्।
उन्हीं परमात्मा ने सृष्टि के प्रारंभ में वेदों, ब्राह्मणों एवं यज्ञों को बनाया। इसी भाव को समाहित करते हुए महानिर्वाण तंत्र में एक श्लोक आता है कि जो भी व्यक्ति ॐ तत्-सत्-इस मंत्र से कर्म का आरंभ करता है, उसको इससे अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। जप, होम, प्रतिष्ठा, संस्कार आदि संपूर्ण क्रियाएँ- ॐ तत्-सत्-इस मंत्र से सफल हो जाती हैं, इसमें संदेह नहीं है। श्रीभगवान कहते हैं कि यही कारण है कि वेदों को और वैदिक सिद्धांतों को मानने वालों के लिए ॐ का उच्चारण करके कार्य को करना मुख्य हो जाता है। ऐसा करने के पीछे का निहित कारण शब्द नहीं, बल्कि भाव की प्रधानता है और वह भाव ही उस कार्य को सफल बनाता है।
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कौरवों और पांडवों की सेनाएँ आमने-सामने आ गईं। शंख बजने लगे। कुरुक्षेत्र में युद्ध की पूरी तैयारी हो चुकी थी। ठीक तभी एक टिटिहरी का आर्त्तनाद गूँजा । दोनों शिविरों के मध्य एक खोह में उसका घोंसला था। उसे स्वजीवन की तो चिंता – नहीं थी, परंतु अपने बच्चों की थी। उसकी निस्सहाय पुकार सारे वातावरण में बिखर गई थी।
श्रीकृष्ण के कानों तक यह पुकार पहुँची, वे दौड़ पड़े। एक पत्थर उठाकर घोंसले के द्वार पर रख दिया और वापस आकर सेनापति से कहा- “अब तुम युद्ध का बिगुल बजा सकते हो।” महापुरुष विषम परिस्थितियों में भी मानवता का साथ नहीं छोड़ते ।
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