प्रेरणा

मोक्ष प्राप्ति का मार्ग

 Motivation| प्रेरणा:  श्रीमद्भगवद्‌गीता के सत्रहवें अध्याय के तेईसवें एवं चौबीसवें श्लोक पर चर्चा इससे – पूर्व की किस्त में की गई थी। इस श्लोक में श्रीभगवान कहते हैं कि ॐ, तत्, सत् इन तीन प्रकार के नामों से जिस परमात्मा का संकेत किया गया। है, उसी परमात्मा से सृष्टि के आदि में वेदों तथा – ब्राह्मणों की रचना हुई है और इसीलिए वैदिक सिद्धांतों को मानने वाले पुरुषों की शास्त्र-विधि से नियत यज्ञ, दान और तप रूप क्रियाएँ’ ‘ॐ’ – इस परमात्मा के नाम का उच्चारण करके ही – आरंभ होती हैं। इस श्लोक में भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि वह शुद्ध, चैतन्य, निर्विकार, – शाश्वत, चैतन्य सत्ता- जिसे हम परमात्मा के नाम से जानते एवं पुकारते हैं, वे परमात्मा ॐ, तत् – एवं सत् – इन तीन नामों से जाने जाते हैं। जप, होम, संस्कार आदि संपूर्ण क्रियाओं की सफलता – का आधार ये ही तीन नाम हैं- इसमें कोई संदेह नहीं है। वे कहते हैं कि यह भी कारण है कि – वेदों को और वैदिक सिद्धांतों को मानने वालों के लिए ॐ का उच्चारण करके कार्य को करना मुख्य हो जाता है। ऐसा करने के पीछे कारण शब्द नहीं, वरन भाव की प्रधानता है।]

   तत् नाम से कहे जाने वाले परमात्मा के लिए ही सब कुछ है – ऐसा मानकर मुक्ति चाहने वाले मनुष्यों द्वारा फल की इच्छा से रहित होकर अनेकों प्रकार की यज्ञ और तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ की जाती हैं। ऐसा कहने के पीछे के कारण दो हैं। पहला, यह संसार नित-निरंतर परिवर्तनशील है एवं नाशवान है। इस नष्ट होने वाले संसार में अविनाशी सत्ता तो मात्र शुद्ध, चैतन्य, निर्विकार ईश्वर की है, वो परमात्मा ही एकमात्र अजर, अमर, अविनाशी हैं तो हमारी क्रियाओं का केंद्र भी ऐसी ही शक्ति व चेतना हो सकती है एवं होनी चाहिए।

                  दूसरा कारण, ऐसा कहने के पीछे यह है कि समस्त कर्मों को ईश्वर को अर्पण कर देने से ही निरहंकारिता व निष्कामता विकसित हो पाती हैं। इस नाशवान संसार को अनित्य मानना ही अविद्याकरना चाहिए, जो मोक्ष की इच्छा रखते हों। जो संसार की, सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति की आकांक्षा रखें, उनके लिए यह पथ नहीं है।

तत्’ का अर्थ ही ‘मैं’ भाव को त्याग देने से है, तत् का अर्थ ही उस परमात्मा के प्रति अपना सर्वस्व अर्पित कर देने से है तो ऐसा वह ही कर सकता है, जिसने मोक्ष की कामना धारण कर ली हो। ऐसे लोगों के लिए क्रियाओं को करने का आध्यात्मिक आधार निष्कामता हो जाता है।

इसीलिए भगवान इस श्लोक में कहते हैं कि ‘फलम् अनभिसंधाय’ अर्थात ‘फल की आसक्ति न रखते हुए’ ये सारी क्रियाएँ संपन्न की जाएँ। जो ऐसा कर पाने में सफल हो पाते हैं- वे ही ईश्वरप्राप्ति के अधिकारी बन पाते हैं। भगवान कृष्ण के द्वारा अर्जुन को दिया गया यह संकेत, हर उस साधक के लिए दिशा-निर्देश है, जो मोक्षप्राप्ति के मार्ग का पथिक है। 

नए खबरों के लिए बने रहे सटीकता न्यूज के साथ।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
गले की खराश से तुरंत राहत: अपनाएं ये असरदार घरेलू नुस्खे सर्दियों में कपड़े सुखाने की टेंशन खत्म: बिना बदबू और फफूंदी के अपनाएं ये स्मार्ट हैक्स सनाय की पत्तियों का चमत्कार: कब्ज से लेकर पेट और त्वचा रोगों तक रामबाण पानी के नीचे बसाया गया अनोखा शहर—मैक्सिको का अंडरवाटर म्यूजियम बना दुनिया की नई हैरानी सुबह खाली पेट मेथी की चाय—छोटी आदत, बड़े स्वास्थ्य फायदे कई बीमारियों से बचाते हैं बेल के पत्ते