भारत-अमेरिका ट्रेड फ्रेमवर्क पर सियासी संग्राम, तेल आयात और निगरानी को लेकर टकराव तेज

नई दिल्ली से राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी दलों ने अमेरिका के साथ प्रस्तावित Trade Framework को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। विपक्ष का आरोप है कि इस समझौते से देश की ऊर्जा स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है और तेल खरीद से जुड़े फैसलों पर बाहरी दबाव बढ़ेगा।
विपक्षी नेताओं का कहना है कि अगर अमेरिका यह तय करने लगे कि भारत किस देश से कच्चा तेल खरीदे, तो यह राष्ट्रीय हित के खिलाफ होगा। इस मुद्दे पर बयानबाजी के बीच BJP ने पलटवार करते हुए 2005-06 के भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर समझौते का हवाला दिया है। पार्टी का तर्क है कि उस समय UPA सरकार ने भी कुछ शर्तों को स्वीकार किया था, जिनमें मिलिट्री और सिविल न्यूक्लियर कार्यक्रमों को अलग करना और सिविल परमाणु प्रतिष्ठानों को IAEA की निगरानी के दायरे में लाना शामिल था।
दरअसल, भारत-अमेरिका संयुक्त बयान के बाद व्हाइट हाउस की ओर से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हवाले से एक Executive Order जारी किए जाने की खबर सामने आई। इसमें उल्लेख किया गया कि भारत ने रूस से सीधे या परोक्ष रूप से तेल आयात रोकने का आश्वासन दिया है। साथ ही यह भी कहा गया कि अमेरिकी अधिकारी इस बात पर नजर रखेंगे कि भारत दोबारा रूसी तेल खरीद शुरू करता है या नहीं। यदि ऐसा होता है, तो वे राष्ट्रपति को आगे की कार्रवाई की सिफारिश कर सकते हैं।
भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अमेरिका से ऊर्जा उत्पाद खरीदेगा और रक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए अगले दस वर्षों के एक ढांचे पर सहमति बनी है। हालांकि, रूसी तेल पर संभावित निगरानी को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इस डील से देश की Energy Security खतरे में पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि अगर उनकी सरकार होती, तो अमेरिका के साथ बातचीत बराबरी के आधार पर होती। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या कोई दूसरा देश यह तय करेगा कि भारत किससे ऊर्जा खरीदे।
राजनीतिक बयानबाजी के बीच यह मुद्दा अब राष्ट्रीय बहस का रूप लेता दिख रहा है, जहां एक ओर सरकार इसे रणनीतिक साझेदारी बता रही है, वहीं विपक्ष इसे संप्रभुता से जुड़ा प्रश्न मान रहा है।
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