जंक फूड विज्ञापनों पर सख्ती की तैयारी, इकोनॉमिक सर्वे ने टाइम-बैन का सुझाव दिया

Senior Reporter India | देश में जंक फूड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (UPFs) की बढ़ती खपत को लेकर इकोनॉमिक सर्वे ने गंभीर चिंता जताई है। सर्वे में सुझाव दिया गया है कि अधिक फैट, चीनी और नमक वाले खाद्य उत्पादों के विज्ञापनों पर सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, ताकि बच्चों और युवाओं पर इसके दुष्प्रभाव को कम किया जा सके।
इसके अलावा शिशुओं और छोटे बच्चों के लिए दूध व पेय पदार्थों के प्रचार-प्रसार पर भी कड़े नियंत्रण लगाने की सिफारिश की गई है। सर्वे का कहना है कि भले ही सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी (CCPA) के दिशा-निर्देश भ्रामक हेल्थ क्लेम और बच्चों के शोषण को रोकते हैं, लेकिन इनमें स्पष्ट पोषण मानक (न्यूट्रिशनल लिमिट) तय नहीं की गई हैं।
इस रेगुलेटरी अस्पष्टता का फायदा कई प्रोसेस्ड फूड कंपनियां उठा रही हैं, जो अपने उत्पादों को स्वास्थ्य, ऊर्जा या पोषण से जोड़कर भ्रमित करने वाले दावे करती हैं। सर्वे ने इसे नीति स्तर की बड़ी कमी बताया है।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा गया है कि चिली में इस तरह के खाद्य पदार्थों को लेकर व्यापक कानून लागू हैं, जबकि नॉर्वे और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में जंक फूड के विज्ञापनों पर सख्त पाबंदियां हैं। यूके में बच्चों पर असर कम करने के लिए रात 9 बजे से पहले टीवी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जंक फूड के विज्ञापन दिखाने की अनुमति नहीं है।
भारत में UPFs का बाजार तेजी से बढ़ा है। 2009 से 2023 के बीच इसमें करीब 150 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की रिटेल बिक्री 2006 में जहां 900 मिलियन डॉलर थी, वह 2019 तक बढ़कर 38 बिलियन डॉलर हो गई, यानी 40 गुना से अधिक का उछाल।
सर्वे में यह भी सिफारिश की गई है कि अधिक फैट, चीनी और नमक वाले खाद्य उत्पादों पर चेतावनी लेबल अनिवार्य किए जाएं और बच्चों को लक्षित कर की जाने वाली मार्केटिंग पर पूरी तरह रोक लगाई जाए।
आंकड़ों के मुताबिक, पांच साल से कम उम्र के अधिक वजन वाले बच्चों की संख्या 2015-16 में 2.1 प्रतिशत थी, जो 2019-21 में बढ़कर 3.4 प्रतिशत हो गई। अनुमान है कि 2020 में भारत में 3.3 करोड़ से ज्यादा बच्चे मोटापे की समस्या से जूझ रहे थे और 2035 तक यह आंकड़ा 8.3 करोड़ तक पहुंच सकता है।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (2019-21) के अनुसार, देश में 24 प्रतिशत महिलाएं और 23 प्रतिशत पुरुष अधिक वजन या मोटापे की श्रेणी में आते हैं।
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