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फोर्टिफाइड चावल पर सवाल: पोषण या ज़हर? थैलेसीमिया-सिकलसेल मरीजों के लिए खतरा

कुपोषण और एनीमिया से लड़ने के नाम पर सरकार ने लोगों की थाली में फोर्टिफाइड चावल (FRK) परोस दिया है। कागजों पर इसे पोषण का हथियार बताया गया, लेकिन हकीकत में यही चावल लाखों मरीजों की सेहत के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। खासकर थैलेसीमिया और सिकलसेल जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर इस चावल का घातक असर हो सकता है। प्रशासन की लापरवाही देखिए। चावल की बोरी पर चेतावनी लिखी है, लेकिन वो भी अंग्रेजी में, छोटे-छोटे अक्षरों में। साफ लिखा है कि ‘थैलेसीमिया के मरीज डॉक्टर की देखरेख में ही इसका सेवन करें, सिकलसेल के मरीज आयरन फोर्टिफाइड उत्पाद बिल्कुल न खाएं।’ सवाल ये है कि क्या आम जनता अंग्रेजी में इतने छोटे शब्दों में लिखी चेतावनी पढ़ भी पाएगी? सच तो ये है कि न तो किसी को इसकी जानकारी दी गई और न ही कोई जागरूकता अभियान चलाया गया। 2.5 करोड़ लोगों की थाली में पोषण या जहर? राज्य के करीब 2 करोड़ 47 लाख लोग हर महीने पीडीएस से 25 लाख क्विंटल FRK मिश्रित चावल ले रहे हैं।

अकेले बिलासपुर ज़िले के 16 लाख से ज़्यादा लोग हर महीने 16 हज़ार मीट्रिक टन यह चावल खा रहे हैं। सरकार कुपोषण दूर करने का दावा कर रही है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह उन मरीज़ों के लिए जानलेवा है जो पहले से ही आयरन की कमी से जूझ रहे हैं। बिलासपुर ज़िले की राशन दुकानों में पहुँचाए जा रहे बोरों पर लिखा है कि इस चावल में आयरन, फोलिक और विटामिन बी12 माइक्रोन्यूट्रिएंट्स मिलाए गए हैं, जिससे यह कुपोषण और एनीमिया से लड़ने में मदद करता है। इस बोरी में दिए जा रहे हर 100 ग्राम फोर्टिफाइड चावल में 4.25 ग्राम आयरन और 12.5 मिलीग्राम फोलिक एसिड मिलाया गया है।

जनता को जानकारी क्यों नहीं दी गई? सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार जानती थी कि यह चावल सबके लिए सुरक्षित नहीं है, तो फिर बिना किसी चेतावनी के इसे करोड़ों लोगों पर थोपने की क्या वजह थी? कोई जागरूकता अभियान क्यों नहीं चलाया गया और मरीज़ों को सचेत क्यों नहीं किया गया? डॉक्टर साफ़ चेतावनी दे रहे हैं कि यह चावल थैलेसीमिया, सिकल सेल और आयरन भंडारण से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित मरीज़ों के लिए सीधा ख़तरा है। उनके शरीर में आयरन पहले से ही जमा होता है, इसलिए एफआरके खाने से आयरन की अधिकता हो सकती है। नतीजा- हार्ट फ़ेल, लिवर सिरोसिस और हार्मोनल सिस्टम पर गंभीर असर। गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए दिशा-निर्देशों का अभाव प्रशासन की घोर लापरवाही है।

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