प्रेरणा

समाधान परक आध्यात्मिक पथ

 Motivation| प्रेरणा: जीवन एक कर्मक्षेत्र है, युद्धक्षेत्र है और एक पहेली भी। इसे परिपूर्णता से जीने के लिए जीवन को हर तल पर, हर स्तर पर मुस्तैदी से जीना पड़ता है। इसी आधार पर जीवन का समग्र विकास सुनिश्चित होता है, इसके रहस्य का अनावरण होता है, हालाँकि यह एक समयसाध्य प्रक्रिया है, जो धीरे-धीरे रूपाकार लेती है व समय के साथ परिपक्व होती है। व्यक्ति की प्रकृति, स्वभाव एवं संस्कार आदि के अनुरूप सबका अपना समाधान पथ निर्धारित  होता है, लेकिन इसके मोटे नियम तय हैं। 

                     ऋषियों ने धर्म-अध्यात्म के रूप में इनका समग्र विवेचन  किया, जिस पर परमपूज्य गुरुदेव ने आज के संदर्भ में व्यापक प्रकाश डाला है। इनके आलोक में आज की परिस्थतियों पर विचार अभीष्ट हो जाता है। विशेषकर तब, जब धर्म-अध्यात्म के नाम भ्रम- भ्रांतियों का कुहासा चहुँओर सघन रूप से छाया  हुआ हो।  धर्म-अध्यात्म का क्षेत्र स्वयं में एक विज्ञान  है, दर्शन है, जिसका अपना मनोविज्ञान है, अपना विधान है। चेतना के विकास की क्रमिक अवस्था के साथ इसमें प्रवेश होता है। परमपूज्य गुरुदेव ने इसे धार्मिकता, आस्तिकता और आध्यात्मिकता के रूप में क्रमबद्ध किया है। 

              इसका पहला पक्ष कर्मकांड प्रधान कहा जा सकता है, दूसरा भाव प्रधान और तीसरा परिपक्व *ज्ञान से युक्त समाधान प्रधान। इस तरह क्रमिक रूप  से कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग साधक के जीवन के अंग बनते जाते हैं और ध्यान की अंतर्धारा इनके मध्य परिपक्व पुष्ट होती जाती है, जिसकी चरम परिणति जीवन के पूर्ण समाधान की अवस्था अर्थात समाधि के नाम से मानी गई है। इसमें। चित्त की गहराइयों में जड़ जमाए संस्कार सबसे प्रमुख व्यवधान के रूप में सामने आते। हैं, जो बाह्य जीवन की बढ़ी-चढ़ी कामनाओं, इच्छाओं, वासनाओं व महत्त्वाकांक्षाओं के रूप में प्रकट होते हैं। ऐसे में धर्म-अध्यात्म के नाम पर जो साधनात्मक पुरुषार्थ होते हैं, वे अपनी प्रारंभिक अवस्था में प्रायः सकाम रूप लिए होते हैं, लेकिन आध्यात्मिक अभीप्सा के साथ, चेतना के विकास के साथ ये परिमार्जित होते हैं, परिष्कृत होते हैं तथा व्यक्ति क्रमशः निष्कामता की ओर अग्रसर होता है।

                    इस क्रम को चेतना की त्रिगुणात्मक प्रकृति के आधार पर भी समझा जा सकता है। तमोगुण चेतना की जड़ अवस्था है, जिसमें व्यक्ति आलस्य, मूढ़ता, घोर मोह व अज्ञान की अवस्था में होता है। रजोगुण व्यक्ति में इच्छाओं व कामनाओं के उद्दाम आवेग से भरी सक्रियता की अवस्था है। वास्तव में तमोगुण परिष्कृत होकर रजोगुण का रूप लेता है और यह क्रमिक रूप से परिष्कृत होकर सतोगुण में रूपांतरित होता है, जो ज्ञान, हलकेपन व चेतना की उन्नत अवस्था के रूप में जीवन को प्रकाशित करता है। जीवन का परम लक्ष्य इसके भी पार गुणातीत अवस्था में स्थिर होना माना गया है। आश्चर्य नहीं कि एक औसत इनसान के प्रायः हर कार्य स्वार्थ व कामना से प्रेरित होते हैं। 

                           वे आशा-अपेक्षाओं से भरे होते हैं, लेकिन साथ अंतःकरण में श्रेष्ठ जीवन के प्रति अभीप्सा के नहीं लगती। इस पृष्ठभूमि में जिन कार्यों को हम समाजरूपी विराट ब्रहा, इष्ट या गुरु को अर्पित कर संपन्न करते हैं, वे निष्कामता की श्रेणी में आ जाते हैं। अन्यथा वे सकाम रहते हैं व इनके साथ राग-द्वेष, स्वार्थ अहं से जुड़ी क्रिया-प्रतिक्रियाएँ भी जुड़ी रहती हैं। शनैः शनैः इनकी निस्सारता समझते हुए इनसे ऊपर उठने का क्रम बनता है और क्रमिक रूप से चित्त की शुद्धि होती है। इसके बाद ही धर्म-अध्यात्म की गहराइयों में प्रवेश होता है। आज धर्म-अध्यात्म के क्षेत्र में भ्रांतियों का कुहासा छाया हुआ है, इसमें ऐसे लोगों की भरमार है, जिनका उपरोक्त वर्णित धर्म-अध्यात्म से कोई लेना-देना नहीं। 

                     कुछ पलायन मार्ग से इसमें प्रवेश कर बैठे हैं, संसार में कुछ कर न पाए, तो साधु वेश में अपना भाग्य आजमा रहे हैं। आज इनकी संख्या बढ़ी-चढ़ी है। आत्मकल्याण के लिए समाज पर बोझा बने इस वर्ग के स्वयं के उत्कर्ष को लेकर क्या प्रयास चल रहे हैं तथा समाज के उत्थान के लिए इनका क्या योगदान है, ये सब शोध का विषय है। ऐसे तथाकथित साधु-महात्माओं की संख्या इस समय लाखों में है। यदि ये एक-एक गाँव को भी गोद में ले लेते, तो देश व समाज का कायाकल्प हो जाता। धर्म- अध्यात्म का पलायन से दूर-दूर का भी रिश्ता नहीं। यह तो जीवन की सबसे बड़ी चुनौती का सामना करते हुए स्वयं पर विजय का परम शौर्य मार्ग है, जिसके साथ समाज, विश्व एवं प्राणिमात्र के कल्याण का मार्ग सुनिश्चित होता है। 

            यह क्षेत्र सत्य-धर्म के प्रति निष्ठा तथा आदर्शों के प्रति असीम प्रेम से जुड़ा हुआ है। यह परमार्थ एवं निरहंकारिता का पथ है, जिसमें दया, करुणा, प्रेम, संवेदना जैसे भाव सहज रूप से हिलोरें ले रहे होते हैं, यह विराट के हित क्षुद्र स्वार्थ-अहंकार के उत्सर्ग का बलिदानी मार्ग है। अपने साथ समूह तथा प्राणिमात्र का कल्याण इसमें निहित रहता है। किसी समाज व राष्ट्र का उत्कर्ष ऐसे ही – सत्यनिष्ठ, धर्मपरायण व सच्चरित्र व्यक्तियों के तप- पुण्य के आधार पर संभव होता है। इनका कट्टरता, अंधविश्वास, सांप्रदायिक हिंसा, द्वेष आदि से कोई लेना-देना नहीं होता है, जो कि समय के साथ तमाम तरह की समस्याओं व विसंगतियों को जन्म देते हैं। यह समाधान का हिस्सा बनकर जीने का नाम है।         

        उपकारकरस्यैव यत् पुण्यं जायते त्विह ।

         तत् पुण्यं शक्यते नैव वक्तुं वर्ष शतैरपि ॥ 

             अर्थात उपकार करने वाले को जो पुण्य प्राप्त होता है, उसका वर्णन सौ वर्षों तक नहीं किया जा सकता। 

                 परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनपर्यंत इसी अध्यात्म : की चर्चा की तथा वे स्वयं इसके जीवंत प्रतिमान रहे। पूरा गायत्री परिवार इसी की धुरी पर खड़ा है-जिसका साधक परिवार कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग व ध्यानयोग की समग्रता को व्यावहारिक अध्यात्म के रूप में जीवन में धारण करते हुए समाजसेवा के माध्यम से आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर है। इनके लिए गृहस्थ एक तपोवन है, जहाँ वे संयम, सेवा और सहिष्णुता की साधना कर रहे हैं. तथा एक संस्कारित परिवार के साथ एक सभ्य समाज की परिकल्पना साकार करने की दिशा में अग्रसर हैं तथा अपनी रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से युग निर्माण के महत्तर कार्य में भावभरा योगदान दे रहे हैं। अपना भावभरा योगदान दे रहे है 

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