राष्ट्र जागरण का आधार है-परिष्कृत भावना

Motivation| प्रेरणा: राष्ट्रजागरण का आधार भावनात्मक शक्ति का सुनियोजन एवं क्रियान्वयन है। स्थिर एवं पवित्र भावनाओं से असंभव कार्य संभव हो सकते हैं। जो कार्य बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाने, बहुत समय और धन लगाने पर भी ठीक तरह नहीं हो सकते, वे भावनाएँ जाग्रत होने पर सहज ही पूरे हो सकते हैं। भावनाएँ जन-जन को जोड़ती हैं और जनशक्ति के सहयोग से असाधारण कार्य संपन्न हो सकते हैं। भावनाओं का जागरण ही राष्ट्र का वास्तविक जागरण है।
जब तक जनमानस में कर्त्तव्यबुद्धि और सामूहिकता के प्रति निष्ठा नहीं होगी, तब तक अन्य प्रयास उतने सार्थक सिद्ध नहीं हो सकते। जनभावनाओं के अभाव में हम प्रदर्शनात्मक और प्रचारात्मक तो बहुत कुछ कर सकते हैं, पर समुचित कार्य तभी होता है, जब उसे करने वाले की भावनाएँ सच्चे मन से कार्य करती हों। हमारी समस्त दुर्बलताएँ तभी समाप्त होंगी, जन भावनाएँ परिष्कृत होंगी। उस जागरण के साथ ही हमारा सर्वतोमुखी जागरण होगा। इस जाग्रति की स्थिति में कोई भी हमें चुनौती देने का साहस नहीं करेगा। कोई लुटेरा अपने मनसूबे में सफल नहीं हो सकेगा। सुरक्षा के लिए जागरण आवश्यक है।
राष्ट्रीय जागरण का अर्थ है- जनभावनाओं की प्रखरता, तेजस्विता और जाग्रति। सुरक्षा का सशक्त मोर्चा सेना सँभालती है और प्रगति का दूसरा मोर्चा प्रबुद्ध लोकसेवकों को सँभालना पड़ता है। सुरक्षा से प्रगति होती है। यदि जनता का मनोबल जाग्रत है और वह अपनी त्रुटियों का समाधान करती हुई प्रगति की दिशा में अग्रसर हो रही है, तो यह विश्वास किया जा सकता है कि इसकी सुरक्षा स्थिर रहेगी, प्रतिष्ठा पर कोई आँच न आने पाएगी और सुख-शांति की परिस्थितियाँ आगे बढ़ेंगी। किंतु यदि जनमानस का झुकाव पतनोन्मुख चरित्र की ओर है, मनोबल और प्रयत्न शिथिल हो रहे हैं, तो यही समझना – चाहिए कि बाहर का शत्रु हमारा भले कुछ न बिगाड़ सके, पर भीतरी दुर्बलताएँ बनी हुई हैं तथा – वे ही नाश का कारण बनेंगी।
चुनौती की इस महत्त्वपूर्ण वेला में भारतमाता के सपूत अपने प्राण हथेली पर रखकर सीमा की – रक्षा के लिए खड़े हैं। कितने ही प्राण विसर्जित कर – चुके हैं, और कितनों को ही करने हैं। ये राष्ट्र के – प्रहरी हमसे पूछते हैं कि हम इतना कर रहे हैं- = प्रत्युत्तर में आप क्या कर रहे हैं? हमें उसका उत्तर प्रखर तेजस्विता के साथ देना चाहिए। भावना के अभाव में प्रगति की सारी प्रक्रियाएँ निर्जीव, निष्क्रिय और निस्तेज बनी रहती हैं। – हमें जनमानस में कर्तव्यपालन की नीति, – धर्म और सदाचार के प्रति आस्तिकता और परमार्थ की प्रचंड भावनाएँ उत्पन्न करनी चाहिए। ज्ञान से = कर्म और कर्म से समृद्धि की उपलब्धि होती है। – जैसे विचार मन में उठेंगे, शरीर में वैसे ही कर्म बन – पड़ेंगे और जैसे कर्म होंगे, वैसा ही परिणाम सामने – उपस्थित होगा। इसलिए हमें ज्ञान का, भावना का महत्त्व समझना चाहिए और उसके विकास का समुचित प्रयत्न करना चाहिए। संसार में जब भी भले या बुरे परिवर्तन हुए हैं, तब उनके मूल में विचार-परिवर्तन की प्रक्रिया ही मुख्य आधार रही है।
बुद्ध, विवेकानंद, महावीर, ईसा, मुहम्मद, गांधी, दयानंद जैसी प्रखर विचारधाराएँ आँधी और तूफान की तरह होती हैं। मनुष्य उनके प्रभाव में सूखे पत्तों की तरह इधर-उधर उड़ते रहते हैं। हमें मनुष्य-को-मनुष्य बनाने की विचारधारा को जनमानस में गहराई तक प्रवेश कराते हुए परिवर्तन की महान प्रक्रिया को सफल बनाना चाहिए। देशव्यापी अगणित बुराइयों, दुर्बलताओं और कुरीतियों का उन्मूलन करने के लिए भागीरथी प्रयास की आवश्यकता होती है। मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने के लिए आगे चलकर हमें अनेक विशाल कार्यक्रम बनाने पड़ेंगे। जहाँ आवश्यक होगा, वहाँ संघर्ष की भूमिका में भी उतरना पड़ेगा। सबसे पहला कार्य यह है कि लोग इस परिवर्तन की आवश्यकता को समझें और उसके लिए आवश्यक त्याग करने के लिए स्वयं जागरूक हों। ऐसी बौद्धिक पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए हमें आज से ही प्रवृत्त हो जाना चाहिए।
यह कार्य जितना सरल है, उतना ही महत्त्वपूर्ण भी है। छोटे कार्य को आज आरंभ करें, बड़े काम कल करने के लिए अपने आप ही सामने प्रस्तुत होंगे। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रांति का कार्य संपन्न होने पर ही स्वतंत्रता का सर्वांगपूर्ण परिदृश्य दृष्टिगोचर होगा। स्वराज्य का महत्त्व इसलिए होता है कि उसके उपरांत प्रजा को अपने भाग्य को जगाने, बिगाड़ने की स्वाधीनता मिल जाती है। जिन लोगों ने स्वाधीनता संग्राम का यज्ञ रचा था, उनकी कल्पना यही थी कि भारतीय समाज सभी दिशाओं में गई-गुजरी स्थिति में पड़ा है, पर स्वराज्य के बाद उन सबको ठीक करना सरल हो जाएगा।
जितना त्याग इस मोर्चे पर करना पड़ रहा है, उतना उन मोर्चों पर नहीं करना पड़ेगा। इसलिए राष्ट्रनिर्माण के कार्यों को करने के लिए अनेक गुना लोकसेवी आ खड़े होंगे। प्रथम मोर्चे पर सफलता मिलने के उपरांत लोगों का उत्साह भी बहुत बढ़ेगा और वे अधिक तत्परतापूर्वक देश को समुन्नत बनाने में लग जाएँगे। आज परिस्थिति अत्यंत विपन्न एवं विपरीत है। देशभक्ति के लिए, पिछड़े हुए राष्ट्र को ऊँचा उठाने के लिए, अधिक-से-अधिक त्याग करने की जो होड़ परस्पर लगी हुई थी, वह स्वराज्य के बाद और भी अधिक तीव्र होनी चाहिए थी। हमें खेदपूर्वक स्वीकार करना पड़ता है कि वह भावना पूरी तरह समाप्त तो नहीं हुई है, परंतु बुरी तरह शिथिल अवश्य हो गई है।
यह उन बलिदानी शहीदों की अवमानना एवं उनका अपमान है, जो हमारे ऊपर क्रांति के एक भारी अंश को पूरा करने का उत्तरदायित्व सौंपकर गए हैं। उन्हें यह संपूर्ण विश्वास था कि हमारे बाद की पीढ़ी हमसे भी अधिक देशभक्त एवं भावनाशील होगी। जो कार्य हमसे शेष रहेगा, उसे वह सहज ही पूरा कर लेगी और समुन्नत भारत का मनोरम चित्र कल्पना मात्र न रहकर अगले दिनों साकार होकर रहेगा। आज राष्ट्रनिर्माण का बहुत बड़ा भाग पूरा करने के लिए बाकी पड़ा है। ऐसे में इस प्रकार की शिथिलता एवं उदासीनता अत्यंत दुःखदायक प्रतीत होती है। विचारक्रांति का महान कार्य अभी तक लगभग बिलकुल अधूरा पड़ा है। सामाजिक क्रांति होनी शेष है।
शहीद जो जिम्मेदारियाँ छोड़ गए हैं, उनको पूरा करने के लिए अब किसी को जेल जाने, फाँसी पर लटकने, घर छोड़ने या अपनी अर्थव्यवस्था नष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। केवल इतना करना है कि अपनी भावनाओं को शांत, स्थिर एवं पावन बनाए रखना है। अपने व्यक्तिगत कार्यों में, व्यावसायिक, पारिवारिक कार्यों में लगे रहने के बावजूद लोक-कल्याण के लिए कुछ समय निरंतर लगाते रहने का व्रत ग्रहण कर लेना चाहिए। आवश्यक है कि जैसे दैनिक जीवन के अन्य कार्यों और उत्तरदायित्वों का निरंतर ध्यान रखा जाता है, इसी प्रकार समाज के नवनिर्माण के लिए भी प्रयत्नशील रहा जाए। शरीर और मन की शक्तियों का कुछ अंश भी इस दिशा में हम लोग लगाए रखें। बौद्धिक और सामाजिक क्रांति के सपने बुनकर विदा होने वाले जीवित और स्वर्गीय स्वतंत्रता सेनानियों की आत्माएँ जहाँ कहीं भी हों, हमारे सत्प्रयत्नों को देखकर वे संतोष प्राप्त कर सकें। भविष्य के कदमों की आहट जिन्होंने भी सुनी है, उन सबका प्रायः यही कहना है कि कल की दुनिया शहरों की नहीं, गाँवों की होगी।
हमारी स्वार्थ एवं अहंकार से सनी भोगपरायण मनोवृत्ति ने शहरों की तो अंधाधुंध बढ़ोत्तरी की, पर पर्यावरण संतुलन को इस सीमा तक बिगाड़ दिया कि पर्यावरण संकट खड़ा हो गया। यह सबसे भयावह संकट बन गया। इसके सामने परमाणविक विभीषिका भी नगण्य लगने लगी है। अपने सुख-साधनों को बढ़ाने के फेर में हमने गाँवों को तो उजाड़ फेंका पर साथ ही पारिस्थितिकीय संतुलन भी नष्ट कर बैठे। स्वयं को विचारशील एवं बुद्धिमान समझने वाले सभी यह भूल गए कि प्रकृति तो समग्रता में है।
स्वार्थयुक्त बुद्धि और संकीर्ण मानसिकता ने जिस विश्व की रचना की है, उससे अकेले मानवीय अस्तित्व की ही नहीं, बल्कि प्राणिमात्र व वनस्पति जगत् आदि सबके संपूर्ण विनाश का खतरा है। यदि हम जीवित रहना चाहते हैं तो फिर से गाँवों की ओर लौटना पड़ेगा। आज परिस्थितियों ने मानवता को इस मोड़ पर ला खड़ा किया है कि ग्राम्य जीवन को पुनर्जीवित करने, उसका नवोत्थान करने के अलावा और कोई उपाय शेष नहीं बचा है। संयम और सादगी से ओत-प्रोत ग्रामीण संस्कृति ही मानव को उसके वर्तमान अँधेरे से निकालकर उज्ज्वल भविष्य की डगर पर चला सकती है।
प्रकृति एवं पर्यावरण को सुरक्षित एवं संरक्षित करके ही जीवन की परिकल्पना की जा सकती है। जीवन के लिए आवश्यक हवा, पानी एवं भूमि को परिष्कृत एवं स्वच्छ करना जरूरी है। प्रकृति एवं मानव के बीच संवाद का आधार हमारी संवेदना है। हमारी संवेदना जब संवेदित होगी, भावना परिष्कृत होगी तभी राष्ट्रनिर्माण का भागीरथ प्रयास अवश्य सफल हो सकेगा।
नए खबरों के लिए बने रहे सटीकता न्यूज के साथ।




