संभवमी युगे युगे

संभवामि युगे युगे’ – संपूर्ण असंभव को सहज संभव करने वाले परमात्मा का वचन है। प्रकृति को परम पुरुष का वरदान है। भक्तों के रक्षण-संरक्षण के लिए भगवान का आश्वासन है। भू-देवी के कष्टों को दूर करने के लिए उनके स्वामी की प्रतिज्ञा है। सृष्टि को स्रष्टा का आशीष है। धर्म को धीरज देता हुआ परात्पर चेतना का संकल्प है। जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए जीवनदाता की जीवन-लीला है।मैं आऊँगा। युग-युग में आऊँगा। चेतना की उच्चतम कक्षा से सभी अवरोधों-प्रतिरोधों को नष्ट करता हुआ धरती पर अवतार लूँगा। सघन अँधेरों में ज्योतिर्मय प्रकाश बिखेरने के लिए, विष को अमृत में परिवर्तित करने के लिए, मरण-क्रंदन में जीवन महोत्सव रचाने के लिए मैं आऊँगा।मनुष्यों को जब मनुष्यता विस्मृत होने लगेगी, साधुओं को साधुता, साधकों को साधना की सुधि जब बिसर जाएगी; तब मेरा अवतरण होगा। असुरों पर अंकुश के लिए, दुष्टों के दमन के लिए, दुर्बलों की दुर्गति दूर करने के लिए निश्चत ही मेरा आगमन होगा।मेरा अवतरण मनुष्य में देवत्व के उदय को, धरती पर स्वर्ग के अवतरण को संभव बनाएगा। तब भय, भ्रम दूर होंगे। सद्बुद्धि का सन्मार्ग प्रशस्त होगा। परम शक्ति का प्रकाश ही अपने समस्त वचनों, वरदानों, आश्वासनों, आशीष एवं प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए प्रज्ञावतार के रूप में युगावतार बन प्रकाशित व प्रकट हुआ।
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