धर्म-अध्यात्म

शरद पूर्णिमा 2025: चंद्रमा की अमृतवर्षा, लक्ष्मी पूजन और श्रीकृष्ण रासलीला का पावन पर्व

शरद पूर्णिमा का पर्व आध्यात्मिक, धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस दिन चंद्रमा की कृपा, देवी लक्ष्मी की पूजा और भगवान कृष्ण की रास लीलाओं का स्मरण लोगों के जीवन को भक्ति और आनंद से भर देता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से यह तिथि अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ धरती पर अमृत की वर्षा करते हैं। इसी कारण इसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। यह पर्व भारत के विभिन्न भागों में अलग-अलग रीति-रिवाजों और मान्यताओं के साथ मनाया जाता है। शास्त्रों में उल्लेख है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणों में अमृत होता है। यह अमृत मानव जीवन के लिए स्वास्थ्यवर्धक और स्फूर्तिदायक माना जाता है। इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा का भी विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि पूरी रात जागकर देवी लक्ष्मी का स्मरण करने से घर में धन-धान्य और समृद्धि आती है। वैष्णव परंपरा में शरद पूर्णिमा का और भी अधिक महत्व है। कहा जाता है कि इसी दिन भगवान कृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महान आनंदमय रास रचाया था। इसलिए इसे रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

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