प्रेरणा

सादा जीवन उच्च विचार

 Motivation| प्रेरणा: सादा जीवन उच्च विचार भारतीय संस्कृति  का मूलभूत सूत्र रहा है। भारतीय संस्कृति के प्रणेता ऋषिगण सादा जीवन उच्च विचार के हिमायती थे; क्योंकि उन्होंने जीवन के तत्त्व को समझ लिया था तथा वे बाह्य जीवन की सापेक्ष सत्यता से भली  भाँति परिचित थे। मानवीय चेतना के मर्मज्ञ ऋषिगण आत्मसत्ता के सत्य से जीवन व समाज के संचालन में विश्वास  करते थे। वे आरण्यकों में प्रकृति की गोद में, आश्रम में रहते थे तथा अपने गुरुकुल से लोक- परलोक को सिद्ध करने वाली शिक्षा एवं विद्या के ज्ञानयज्ञ का संचालन करते थे। उनके त्याग-तपस्या एवं सादगी भरे सादा जीवन-उच्च विचार का प्रताप ही था कि जनमानस के हृदय में उनके प्रति विशिष्ट श्रद्धा रहती थी तथा सामान्य घर से लेकर राजघराने के बच्चे शिक्षा एवं विद्या अर्जन के लिए उनके पास आते थे।

                       हर युग में ऋषियों के ऐसे गुरुकुलों-आश्रमों का वर्णन आता है। त्रेतायुग में राजकुमार राम सहित भाई लक्ष्मण,  भरत, शत्रुघ्न वन में महर्षि विश्वामित्र के गुरुकुल में विद्या-अर्जन के लिए गए। इसी प्रकार द्वापर युग में सुदामा से लेकर राजकुमार श्रीकृष्ण-बलराम ने संदीपनि ऋषि के गुरुकुल में वास किया। आज परिस्थितियाँ भिन्न हैं, लेकिन शांतिकुंज आश्रम में परमपूज्य गुरुदेव ने अखिल विश्व गायत्री परिवार को सादा जीवन उच्च विचार की विरासत पर खड़ा किया है। युगऋषि पूज्यवर पुरातन ऋषि परंपरा के संवाहक रहे, जो जंगलों में कुटिया में रहकर साधना करते थे, न्यूनतम में निर्वाह करते हुए मानव चेतना के अनुसंधान व लोकसेवा में तल्लीन रहते थे। आज लाखों-करोड़ों लोग इसी ऋषि-परंपरा के अंतर्गत ऋषियुग्म से जुड़कर गायत्री परिवार का अंभिन्न अंग बनते हुए अपनी क्षमता एवं योग्यता के अनुरूप गुरुकार्य में, ईश्वरीय कार्य में अपना योगदान दे रहे हैं। 

                  पूज्य गुरुदेव स्वयं सादा जीवन-उच्च विचार की मूर्तिमान प्रतिमा थे। एक औसत भारतीय स्तर का जीवन उनका आदर्श था, जिसका जीवनपर्यंत हर स्तर पर उन्होंने पालन किया। परमवंदनीया माताजी के साथ गृहस्थ तपोवन में उन्होंने न्यूनतम में निर्वाह करते हुए इस मंत्र को साधा। जो भी उनसे मिलते गए, वे उनकी सादगी के कायल होते गए। अपनी आत्मकथा हमारी वसीयत विरासत में पूज्यवर ने जीवन के सार को तीन सूत्रों में समेटते हुए, इनको रेखांकित किया है-मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत् और आत्मवत् सर्वभूतेषु। इसमें सादा जीवन उच्च विचार की ही बानगी मिलती है। यह गुरुदेव की हमारे लिए एक महान विरासत है, जिसके पीछे गहरा दर्शन छिपा है, जिसका अपना गहरा मनोविज्ञान है। वे कहते थे-हम गरीब नहीं हैं, यह हमारी ओढ़ी हुई गरीबी है। कैसे न्यूनतम में भी निर्वाह हो सकता है, इसका प्रशिक्षण-उदाहरण के साथ हम अपने जीवन से दे रहे हैं; क्योंकि बाहर जमाना अनावश्यक दिखावे, तड़क-भड़क, फजूलखरची, फैशन व आडंबर का है, जिसके कारण जीवन नारकीय बना हुआ है, परिवार व समाज में गलत रीतियों का प्रचलन बढ़ रहा है और वहाँ लोगों को लगता नहीं कि सादगी से भरा जीवन भी संभव है। 

           आज चलन दूसरों के साथ अनावश्यक प्रतिद्वंद्विता का है। धन इष्ट बन गया है, किसी भी कीमत पर रातोंरात धनवान बनने की होड़ लगी हुई है। बिना कीमत चुकाए धन-ऐश्वर्य, रोब-दाब, रुतबे व सुख-भोग को पाने का क्रम निर्बाध रूप से चल रहा है। ऐसे में पता भी नहीं चलता कि कब व्यक्ति भ्रष्टाचार में लिप्त हो गया। रोज समाचारपत्रों के पहले पन्नों में भ्रष्टाचार के नित नए रिकॉर्ड की ब्रेकिंग न्यूज आती रहती है। क्या नेता, क्या अधिकारी व कर्मचारी, हर वर्ग इनमें संलिप्त पाए जा रहे हैं। पारिवारिक स्तर पर खरचीली शादियाँ ऐसे ही दिखावटी आडंबर का एक बड़ा उदाहरण हैं। जिसमें पड़ोसी की देखा-  देखी लाखों-करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए  जाते हैं। 

             इसके साथ शराब, मांसाहार जैसे आसुरी चलन और प्रोत्साहित किए जाते हैं। हर किसी के लिए ऐसी खरचीली शादियाँ अपने बूते संभव नहीं। इसके लिए जमीन को गिरवी रखने से लेकर बैंक से भारी लोन व कर्ज उठाने पड़ते हैं और फिर इनकी भरपाई किस तरह से होती है, यह भुक्तभोगी ही जानते हैं। जीवन तनाव, अवसाद से भरी नारकीय  यंत्रणा से गुजरने के लिए विवश बाध्य हो जाता है। सादगीपूर्ण जीवन का आदर्श अपनाया होता तो ऐसी नौबत नहीं आती। पूज्य गुरुदेव ने गायत्री परिवार के साधक परिकर को ऐसे आडंबरों से मुक्त रखा है। यहाँ न्यूनतम खरचे में, सादगी भरे माहौल में विधि-विधान के साथ विवाह संस्कार  ‘का चलन प्रारंभ किया। 

           बाहर तो पता भी नहीं चलता कि पंडित जी ने क्या मंत्र बोला व उसका अर्थ क्या है और फिर जनता को भी इसमें अधिक रुचि नहीं रहती। उनका पूरा-का-पूरा ध्यान तो विवाह संस्कार की मूल प्रेरणा से अधिक मात्र दूलहा-दुलहन की साज-सज्जा एवं दहेज में दी जा रही विभिन्न बहुमूल्य सामग्री व साथ ही बाहरी चकाचौंध पर अधिक रहता है। वास्तव में सादे जीवन में चुनौती दो स्तर से आती है। एक होती है परिस्थितिजन्य, जिसमें समाज का दबाव प्रधान होता है। इसके चलते समाज में प्रचलित खोटे चलनों के बीच आम इनसान तिनके की भाँति उड़ने के लिए स्वयं को विवश अनुभव करता है। उसे लगता है कि जब दुनिया में सब ऐसा ही कुछ कर रहे हैं तो हम क्यों न करें और दूसरी चुनौती आंतरिक मनःस्थितिजन्य है, जिसमें अपनी ही इच्छाएँ, आकांक्षाएँ, महत्त्वाकांक्षाएँ, भय व दुर्बलताएँ आती हैं, जिनके चलते अनौचित्य के विरोध का साहस नहीं कर पाते। फिर मन की तृष्णा, मोह-आकांक्षा तथा अहंता का कोई अंत भी नहीं। 

                     पूरा जीवन भी इनमें झोंक दिया जाए तो भी ये पूरी होने वाली नहीं। लोगों को इनकी चपेट में अपनी आत्मा, ईमान और स्वाभिमान को झोंकते देखा जाता है और अपने ईमान को खोकर, आत्मा को बेचकर, स्वाभिमान को गिरवी रखकर यदि इनको पूरा करना पड़े तो इसे एक बहुत महँगा सौदा माना जाएगा। स्वयं को खोकर संसार में कुछ पाया, तो क्या पाया। इसमें तात्कालिक सुख-समृद्धि, रोब-दाब और वाहवाही के दिखावे का भ्रम जरूर हो सकता है, लेकिन इसके साथ जो कर्मों का बोझ लदता है, पुण्य क्षय होता है, जीवन में तनाव-अवसाद, भय, अशांति घर कर जाते हैं, इनके बीच दीर्घकाल में रोग-शोक, तिरस्कार एवं पतन-पराभव की पृष्ठभूमि ही तैयार होती है। 

                     पारिवारिक स्तर पर कलह-क्लेश, तनाव- अशांति तथा सामाजिक स्तर पर ईर्ष्या-द्वेष, भ्रष्टाचार,  अपराध तथा अवांछनीय चलन के शुरुआत की विडंबना साथ जुड़ती है, जो किसी सभ्य-सुसंस्कृत समाज के लिए उपयुक्त नहीं कही जा सकती । इसके चलते कितने-कितने बड़े नेता, अधिकारी, भ्रष्ट कर्मचारी जेलों की चक्की पीस रहे हैं, अपनी इज्जत खो बैठे हैं और इस सुरदुर्लभ मानव जीवन को दो कौड़ी के भाव गँवा बैठे हैं। इस विडंबना एवं त्रासदी से उबरने का मार्ग परमपूज्य गुरुदेव ने सादा जीवन उच्च विचार के दर्शन के अंतर्गत दिया है, जिसे उन्होंने जीवनपर्यंत जीकर दिखाया तथा इसका खुलकर स्थान-स्थान पर मार्मिक प्रतिपादन किया। शाँति, सुकून और आनंद के साथ एक सफल-सार्थक जीवनयापन इसी आधार पर संभव है और इसके साथ जो समय, ऊर्जा और मनोयोग की बचत होती है, उनके आधार पर जीवन के महत्तर कार्य संभव होते हैं, समाजसेवा का प्रयोजन सिद्ध होता है और लोकसेवा के साथ आध्यात्मिक लाभ एवं जीवन के समग्र उत्कर्ष का उच्चस्तरीय उद्देश्य पूरा होता है। 

                इनको देखते हुए हमारा पावन कर्त्तव्य बनता है कि गुरुदेव के जीवन व संदेश को हृदयंगम करते हुए, ऋषियुग्म द्वारा प्रवर्तित सादा जीवन उच्च विचार की परंपरा के संवाहक बनें तथा इस सुरदुर्लभ जीवन को एक अनुकरणीय मिसाल के रूप में प्रस्तुत करें।

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स्वामी रामकृष्ण परमहंस केशवसेन से मिलने गए तो उन्हें देखकर बोले-“अरे! इसकी पूँछ गिर गई है।” यह सुनकर वहाँ बैठे सभी लोग हँस पड़े। पर केशवसेन जानते थे कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस कोई भी बात अन्यथा नहीं कहते सो उन्होंने उनसे उनके कहे का अर्थ पूछा। परमहंस जी – ने उत्तर दिया- “जब तक मेंढ़क के बच्चे की पूँछ नहीं गिर जाती, तब तक उसे पानी में ही रहना पड़ता है; वह किनारे से चढ़कर सूखी जमीन में विचर नहीं सकता। पर ज्यों ही उसकी पूँछ गिर जाती है, त्यों ही वह उछलकर जमीन पर आ जाता है, तब वह पानी में भी रह सकता है और जमीन पर भी। 

                      उसी तरह आदमी की जब तक अविद्या की पूँछ नहीं गिर जाती, तब तक वह संसाररूपी जल में ही पड़ा रहता है; उसके गिर जाने पर-ज्ञान होने पर, मुक्तभाव से मनुष्य विचरण कर सकता है और इच्छा होने पर संसार में भी रह सकता है।” स्वामी रामकृष्ण परमहंस के कृपाभाव का अर्थ सबको समझ आ गया।

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