स्वयं में ‘स्व’ की खोज का मार्ग

motivation| प्रेरणा: मनुष्य जबसे इस संसार में आया है, तभी से एक मूल प्रश्न उसके समक्ष सदैव खड़ा रहा है, वह यह कि उसका अपना वास्तविक स्वरूप क्या है? वर्तमान से लेकर भविष्य में भी जब तक इस दुनिया में मनुष्य का अस्तित्व रहेगा, तब तक प्रत्येक युग और उसके कालखंडों में यह प्रश्न सदैव मनुष्य के सामने उपस्थित रहेगा। निर्माता ने मनुष्य के अस्तित्व को कुछ मौलिक प्रश्नों की चादर में लपेटकर ही इस संसार में भेजा है।जब तक इन प्रश्नों की चादर को न उघाड़ा जाए, स्वयं का अस्तित्व प्राप्त नहीं होता है। हरेक मनुष्य के लिए यह प्रश्न शाश्वत है कि वह स्वयं से पूछे कि उसके भीतर का वास्तविक ‘स्व’ क्या है? जिसे वह बार-बार ‘मैं’ कहता है, वह ‘मैं’ क्या है ? इस धरा पर स्वयं के जीवन का उद्देश्य क्या है? वह यहाँ क्यों आया है? इन प्रश्नों के आवरण को तोड़े बिना किसी के लिए भी स्वयं में ‘स्व’ की उपलब्धि असंभव है।ये ऐसे प्रश्न हैं, जो आदिकाल से अब तक, सदैव मनुष्य के समक्ष उपस्थित रहे हैं और आगे – भी अनंत काल तक बने रहेंगे। इन्हीं के समाधान – की खोज हर काल में, प्रत्येक युग-युगांतर में, सर्वत्र होती आ रही है और होती रहेगी। इन प्रश्नों – की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये हरेक के – अस्तित्व की मौलिकता के साथ स्वतंत्र रूप से – जुड़े हैं।इनकी खोज स्वयं को ही करनी होती है। – कोई दूसरा चाहकर भी अन्यों के लिए इन प्रश्नों – का जवाब नहीं खोज सकता ता है।
स्वयं से ही खोजकरइन मौलिक प्रश्नों के जवाबों को प्राप्त कर लेना जीवन की सार्थकता है। मनुष्य जीवन का यही उद्देश्य है। अपने स्वरूप की, अपने ‘स्व’ की खोज कर लेना ही परम पुरुषार्थ है।हमारे शास्त्रों एवं आप्तवचनों में जो सबसे मूल्यवान उपदेश है, वह यह कि स्वयं को जानो, ‘आत्मानम् विद्धिः’, ‘अप्प दीपो भव।’ स्वयं को जाने बिना सब कुछ जाना हुआ बेकार है और स्वयं को जान लेने के बाद और कुछ जानना शेष नहीं रह जाता। ऋषियों का यही अनुभूत सत्य है। मनुष्य जीवन की संपूर्ण यात्रा का सार – स्वयं को जान लेना ही है।अद्यतन इतिहास का सृजन करने वाली मानवता के शिखर – मूल्य-आदर्श और कुछ नहीं, इसी ‘स्व’ की खोज और उपलब्धि की कहानी हैं। जीवन की वास्तविक सफलता और सार्थकता के लिए प्रत्येक मनुष्य के लिए स्वयं के भीतर ‘स्व’ की खोज एक अनिवार्यता है।स्वयं की खोज का मार्ग सबका अपना- अपना, अलग-अलग है और हमेशा ऐसा ही रहेगा। एक का मार्ग, दूसरे का कभी नहीं हो सकता। इसलिए जिसने भी अपनी भीतर की यात्रा पूरी कर ‘स्व’ को खोजा, उसने सर्वथा भिन्न और नवीन व्याख्या की है। इस खोज की उपलब्धि कराने वाले कोई भी दो मार्ग कभी समान नहीं रहे हैं। ऋषि-मुनि हों या महापुरुष, सिद्ध-योगी हों या साधु-संत-सभी ने इस खोज को पूरा किया है, परंतु उनकी यात्रा एकदूसरे से सर्वथा भिन्न और अद्वितीय रही है। इनमें से जिसने जब भी कुछ कहा है, वह अक्षरशः सत्य है, परंतु यह सत्य उनका अपना है। शंकर का ब्रह्म, बुद्ध का निर्वाण उनका अपना है, हमारा नहीं।
हमारा सत्य हमारे भीतर से, हमारी यात्रा से ही प्रकट होगा।इस सत्य के प्रकट हुए बिना जीवन के मौलिक * प्रश्न सदैव अनुत्तरित ही रहेंगे। बाहरी संसार का * सारा ज्ञान, संपूर्ण जानकारी मिलकर भी इन प्रश्नों *का समाधान नहीं कर सकते। ‘मैं’, मेरा स्वरूप, मेरा उद्देश्य, मेरी वास्तविकता – इन सब प्रश्नों *को प्रकाशित और परिभाषित करने का एकमात्र उपाय है- स्वयं के भीतर की यात्रा को पूरा करना।इस यात्रा पर जो भी चले हैं, जिन्होंने भी स्वयं में ‘स्व’ की खोज के लिए कदम बढ़ाए हैं उनका अनुभव अत्यंत विस्मयकारी, अद्भुत और रोमांचक रहा है। शास्त्रों के हजारोंहजार पृष्ठों में * ‘स्व’ की खोज का अनुभूत सत्य सँजोया मिलता *है। जो भी इस मार्ग पर चले, उन सभी ने इ इस यात्रा * पर प्रमुखता से प्रकाश डाला है।परमपूज्य गुरुदेव ने भी हम सभी के लिए इस दुर्लभ यात्रा के अनुभूतिपूर्ण सत्य एवं तथ्य को अत्यंत सरल ढंग से ‘गागर में सागर’ बनाकर हमारे समक्ष रख दिया है। है। ‘मैं क्या हूँ’ पूज्यवर का ऐसा लघु ग्रंथ है, जिसमें स्वयं की खोज का ज्ञान विज्ञान अत्यंत सरल, सार और सूत्र रूप में प्रस्तुत है।स्वयं के भीतर ‘स्व’ की उपलब्धि के लिए – चलने वालों के लिए ऐसा जीवनोपनिषद्घ्रकाश – अन्यत्र कहीं नहीं दिखाई देता है। अपने वास्तविक स्वरूप को, जीवन-उद्देश्य को प्राप्त करने की यात्रा का सटीक मार्गदर्शन करने वाला अद्भुत ग्रंथ है- मैं क्या हूँ।इसके प्रथम सोपान में इस अनुभूत सत्य का उद्घाटन है कि व्यक्ति के जीवन की संरचना में जड़ और चेतन-इन दोनों तत्त्वों का समन्वय है। सभी इन दोनों के होने की सत्यता को स्वीकारते भी हैं, लेकिन यदि किसी ने यह पूछा कि आप कौन हैं, तो भीतर से जो उत्तर बाहर आता है, वह कुछ और ही होता है।इस उत्तर में कोई नाम विशेष, कुल, वर्ण, संप्रदाय आदि का तो परिचय मिलता है, परंतु इससे परे भी हमारे अस्तित्व में कुछ है, जो अनुत्तरित ही रहता है। वह अनुत्तरित ही हमारा मूल स्वरूप है, जिसे चैतन्य तत्त्व आत्मा के नाम से जाना जाता है। हम अपना जो परिचय देते हैं- नाम, पद, कुल, धर्म जो कुछ भी, इस परिचय का संबंध हमारे चैतन्य आत्मस्वरूप से नहीं, अपितु शरीर और उससे जुड़ी विशेषताओं से होता है।
चूँकि शरीर हमारे जीवन में जड़ों का प्रतिनिधित्व करता है और जीवन चेतना को थामे रखने का साधन मात्र है, अतः वह हमारा स्वरूप या लक्ष्य नहीं हो सकता। इस यात्रा के प्रथम सोपान में इस सत्य को स्वीकारने की और समझने की आवश्यकता है कि हमारे जीवन का अस्तित्व जड़ व चेतन, दो सर्वथा विरोधी तत्त्वों से बना है।हमारे जीवन की वास्तविक शक्ति व सत्ता का केंद्र जड़ शरीर नहीं, अपितु चेतन आत्मा है। मनुष्य की सबसे बड़ी भ्रांति यही है कि वह समस्त जीवन का ध्येय शरीर और उसकी इंद्रियों की पूर्ति, शरीर के सुख, भोग, सुविधाओं पर ही केंद्रित रखता है। अनेक लोग भौतिक संपदाएँ और भोग सामग्रियों के एकत्रित करने में पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं।दूसरा पक्ष चैतन्य आत्मा का एकदम उपेक्षित पड़ा रहता है। यही कारण है कि संसार में बहुत कुछ जान-समझ लेने के बावजूद भी व्यक्ति स्वयं के स्वरूप से, अपनी ही अंतरात्मा से सर्वथा अनभिज्ञ बना रहता है। इसलिए पूज्य गुरुदेव यहाँ निर्देश देते हैं कि जीवन में मौजूद दोनों परस्पर विरोधी सत्ताओं में से जब किसी एक के चयन की बात आती है तो सभी प्रायः भौतिक पक्ष को ही चुन लेते हैं और सारा जीवन उसी दिशा में भटक जाता है; जबकि • चैतन्य पक्ष का चयन करना चाहिए था। चैतन्य का * चयन ही ‘स्व’ की उपलब्धि और यथार्थ जीवनलक्ष्य *की प्राप्ति का एकमात्र विकल्प है। इस चयन के उपरांत ही मैं कौन हूँ? प्रश्न का वास्तविक उत्तर* प्राप्त होता है कि मैं चैतन्य तत्त्व आत्मा हूँ।यहाँ से स्वयं की यात्रा का दूसरा सोपान प्रारंभ होता है। प्रथम सोपान में हम भौतिक और * आत्मिक जीवन के भेद को समझकर आत्मिक * पक्ष का चयन करते हैं। दूसरे सोपान में यह पता* लगाते हैं कि इस आत्मिक पक्ष में कदम रखने के *बाद किस तरह अपने मूलस्वरूप को प्राप्त किया * जा सकता है।परमपूज्य गुरुदेव के अनुसार अपने मूल * स्वरूप को पहचानने के लिए मानसलोक अर्थात * चित्त, अंतःकरण, मन, बुद्धि आदि साधनों का *विकास आवश्यक होता है। जीवन के इन्हीं आंतरिक * आयामों में हमारी सूक्ष्मचेतना अंतर्निहित रहती है।
मानसलोक में स्थित सूक्ष्मचेतना को विकसित बनाने के लिए ही ध्यान, जप, तप, योग, समाधि आदि तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। उच्चस्तरीय आध्यात्मिक चेतनाओं की प्रथम झलक विकसित मानसलोक में ही अवतरित हो पाती है।ध्यान आदि से कल्पनाशक्ति और मंत्र, * स्वाध्याय, शास्त्र आदि से विचारशक्ति- ये दोनों * मिलकर सूक्ष्मचेतना को आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त करने के योग्य बनाते हैं। ऐसी योग्यता की प्राप्ति के लिए पूज्यवर ने जो अभ्यास एवं अनुशासन कहे हैं, वे ये हैं कि सर्वप्रथम नैसर्गिक, सुरम्य, शांत और सत्त्वयुक्त स्थान का चयन करना। इसके पश्चात सोये, बैठे, लेटे सभी अवस्थाओं में सजगता का ध्यान। ध्यान सिद्धि की उपलब्धि । ध्यान में स्वयं के आत्म का चिंतन। स्वप्रेरण, स्वसंकेतन के अभ्यास से ‘स्व’ का अनुभव, स्वयं की अनुभूति। भौतिक शरीर से पृथकता की सिद्धि। पंचतत्त्वों से अलग आत्मचेतना के क्षेत्र में प्रवेश। आत्मक्षेत्र में पहुँचकर ‘मैं’ का अपने ‘स्व’ का अनुसंधान। ‘स्व’ की अखंड, अविनाशी, परम चैतन्य की अवस्था का बोध। यही हमारा वास्तविक स्वरूप है।यात्रा का तृतीय सोपान आत्मचेतना में समग्र चेतना के रहस्योद्घाटन का है। स्वयं में स्वयं की यात्रा का यह अत्यंत गूढ़, विस्तृत और विस्मयकारी पड़ाव है। शरीर से मन, मन से आत्मा और आत्मा से परमात्मा की संबद्ध अंतर्कड़ियों का रहस्य यहीं उजागर होता है। पूज्य गुरुदेव ने इसे हमारे सूक्ष्मशरीर का विकास कहा है। सूक्ष्मशरीर के निचले स्तर पर जन्म-जन्मांतर की अच्छी-बुरी सब वृत्तियाँ मौजूद रहती हैं। इसे सुप्त मन अथवा प्रवृत्त मानस भी कहा जा सकता है।
सूक्ष्मशरीर के मध्यम स्तर में चिंतन, तर्क, निर्णय, तुलना, विवेचन आदि की क्षमताएँ होती हैं, जिसे प्रबुद्ध मानस कहा जाता है। सूक्ष्मशरीर के उच्चतम स्तर पर जीवन की वास्तविक प्रतिभा, आत्मप्रेरणा, ईश्वरीय संदेश प्राप्ति की योग्यता, प्रेम, दया, करुणा, न्याय, निष्ठा, धर्म, सत्य, न्याय आदि विभूतियाँ मौजूद होती हैं- इसे ही अध्यात्म मानस कहा गया है। इसी स्तर पर पहुँचकर ‘स्व’ के यथार्थ का साक्षात्कार होता है। स्वयं में ‘स्व’ की उपलब्धि होती है।चतुर्थ सोपान में ‘स्व’ के विस्तार की परमात्मीया चेतना के रूप में अनुभूति प्राप्त होती है। यह सोपान स्वयं में ‘स्व’ की यात्रा का शिखर है। यहां स्व’, ‘मैं’, ‘अहम्’ असीमित होकर अहं ब्रह्मास्मि, सोऽहमस्मि जैसे महावाक्यों को चरितार्थ करता है। विशुद्ध आत्मा ही परमात्मा है- यह बोध ही इस यात्रा की पराकाष्ठा है। यहाँ तक पहुँचने वाले के लिए आत्मवत् सर्वभूतेषु, समदर्शन, स्थितप्रज्ञता आदि शास्त्रीय भावनाएँ जीवन का यथार्थ चरित्र बन जाती हैं।ऐसे आत्मत्व-ब्रह्मत्व, स्व-तत्त्व को प्राप्त कर लेना ही मनुष्य जीवन की वास्तविक सफलता और सार्थकता है। ‘स्व’ के भाव में स्थिति अर्थात स्वभाव में होना ही मनुष्यता का परम मूल्य कहा गया है। ‘स्व’ में स्थित ही स्वस्थ है और स्वस्थ वही है, जो अपने यथार्थ चैतन्य आत्मबोध से परिपूर्ण है आत्मतत्त्व की उपलब्धि के पश्चात ही जीवन के सभी मौलिक प्रश्न सुलझ पाते हैं। मैं क्या हूँ? मेरा स्वरूप क्या है? उद्देश्य क्या है? इन सब प्रश्नों के उत्तर केवल इसी ‘स्व’ की यात्रा से प्राप्त होते हैं। अपने भीतर की खोज पूरी करने पर ही व्यक्ति सत्य कह पाता है कि मैं आत्मा हूँ, चैतन्यस्वरूप हूँ, मेरा उद्देश्य आत्मारूपी परमात्मा को प्राप्त करना है।इसी महान प्रयोजन की सिद्धि और इसकी समस्त संभावनाएँ लेकर ही हम सब संसार में आए हैं। क्यों न अभी से ही स्वयं की खोज में, ‘स्व’ के अनुसंधान में, मैं क्या हूँ के समाधान में जुट जाएँ ?
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