मेनोपॉज़ के बाद हड्डियों की कमजोरी का असली कारण पेट, AIIMS की स्टडी में बड़ा खुलासा

सीढ़ियाँ चढ़ते समय घुटनों में दर्द, कमर के निचले हिस्से में लगातार अकड़न, और हल्की सी चोट से भी हड्डी टूटने का डर – इन सबको पारंपरिक रूप से मेनोपॉज़ के बाद सामान्य माना जाता रहा है। हालांकि, AIIMS (ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) ने इस समस्या से निपटने के नए पहलुओं पर रोशनी डाली है। इस नई स्टडी के अनुसार, यह हड्डियों का दर्द और कमज़ोरी सिर्फ़ हार्मोन की कमी के कारण नहीं होती; इसका असली कारण पेट में होता है। मेनोपॉज़ के बाद, जब शरीर में एस्ट्रोजन का लेवल कम हो जाता है, तो यह पेट के इम्यून सिस्टम को प्रभावित करता है। इससे आंतों में सूजन बढ़ जाती है, और यह सूजन धीरे-धीरे हड्डियों को कमज़ोर और खोखला कर देती है। रिसर्च से पता चलता है कि लैक्टोबैसिलस एसिडोफिलस जैसे प्रोबायोटिक बैक्टीरिया (अच्छे बैक्टीरिया जो आंतों को स्वस्थ रखते हैं और पाचन में सुधार करते हैं) इस प्रक्रिया को कंट्रोल करने में मदद कर सकते हैं।
फ्रैक्चर का खतरा कम
अगर पेट की सूजन को कंट्रोल नहीं किया जाता है, तो शरीर हड्डियों के खराब होने की प्रक्रिया को रोक नहीं पाता है। मामूली चोट या गिरने से भी फ्रैक्चर का खतरा बढ़ सकता है, लेकिन अगर आंतों की सूजन को कंट्रोल किया जाए, तो हड्डियों के टूटने की प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है। यही बात ऑस्टियोपोरोसिस के मामलों पर भी लागू होती है। उन्होंने इसे इम्यूनोपोरोसिस, या ऑस्टियोपोरोसिस की इम्यूनोलॉजी नाम दिया है। इस तरह, भविष्य में, ऑस्टियोपोरोसिस का इलाज सिर्फ़ कैल्शियम, हार्मोन या दवाओं तक सीमित नहीं रहेगा। पेट का माइक्रोबायोम और इम्यून बैलेंस भी इसके इलाज के ज़रूरी हिस्से बन जाएंगे। डॉ. रूपेश श्रीवास्तव के अनुसार, प्रोबायोटिक्स पेट में इम्यून सेल्स के बैलेंस को बेहतर बनाते हैं। अगर हम पेट को स्वस्थ रखते हैं, तो इसका असर हड्डियों, इम्यूनिटी और पूरी सेहत पर दिखेगा।
कुछ बचाव के उपाय
सुबह की धूप में 15-20 मिनट बैठें। (विटामिन D के लिए)
अपने खाने में तिल, रागी, सोयाबीन और मूंगफली शामिल करें।
दही जैसे प्रोबायोटिक फूड खाएं।
रोजाना दूध, छाछ और पनीर खाएं।
रोजाना हल्की एक्सरसाइज करें। हल्दी वाला दूध सूजन और दर्द कम करने में फायदेमंद है।
नमक और चीनी का सेवन कम करें। धूम्रपान और शराब से बचें।
इन बातों का ध्यान रखें:
50 साल की उम्र के बाद हड्डियों की जांच करवाना ज़रूरी है। दर्द को सिर्फ़ उम्र बढ़ने का संकेत समझकर नज़रअंदाज़ न करें।
घर पर गिरने से बचने के लिए सावधानी बरतें।
संतुलित आहार और नियमित दिनचर्या बनाए रखें।
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