प्लास्टिक कचरे की विभीषिका और समाधान की राह

Motivation| प्रेरणा: आज प्लास्टिक जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है, इसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। रोजमर्रा के जीवन में उपयुक्त हो रही अधिकांश चीजें प्लास्टिक की बनी हुई हैं। बीसवीं सदी में ईजाद प्लास्टिक की मात्रा आज इस कदर बढ़ चुकी है कि पर्यावरण के लिए यह एक गंभीर संकट बनता जा रहा है। हमारे जलवायु एवं खाद्य पदार्थों में संक्रमित होते हुए यह इस धरती पर जीवन के लिए एक खतरा बनता जा रहा है, जिसकी विकरालता एवं संभावित समाधान पर विचार अपेक्षित हो जाता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 2022 में एक भारतीय ने औसतन 20 किलो प्लास्टिक कचरा पैदा किया। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, देश के कुल कचरे में 8 प्रतिशत प्लास्टिक रहता है।
यह आँकड़ा देखने में भले ही कम लग सकता है, लेकिन इसकी निरंतर बढ़ती मात्रा और इसके सैकडों वर्षों तक वातावरण में बने रहने की प्रकृति के कारण, यह एक बड़ा खतरा बनता है। मालूम हो कि प्लास्टिक को अपघटित होने में 450 से 1000 वर्ष लग जाते हैं। आईआईएससी बैंगलोर की जनवरी-2023 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष-2016 से लेकर 2020 तक भारत में प्लास्टिक का उपयोग हर वर्ष 9.7 प्रतिशत की दर से बढ़ा है। यह 1.4 करोड़ टन से बढ़कर 2 करोड़ टन पहुँच चुका है। इसमें से मात्र 34 लाख टन प्लास्टिक ही रिसाइकल हो रहा है। शेष प्लास्टिक धरती में दफनाया जा रहा है या नदी, झील व समुद्र में फेंका जा रहा है। आश्चर्य नहीं कि नदियाँ प्लास्टिक से प्रदूषित हो रही हैं। विश्व की सबसे प्रदूषित 10 नदियों में एक पावन गंगा में प्लास्टिक प्रदूषण अपना प्रभाव दिखा रहा है।
यह तथ्य दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय और पटना विश्वविद्यालय के अध्ययनकर्ताओं के शोध से स्पष्ट हुआ है, जहाँ गंगा नदी में प्राकृतिक रूप से मिलने वाली मछलियों के 515 नमूनों में मांसपेशियों, लिवर, गिल्ज आदि की जाँच की गई। इनमें 11 प्रतिशत अर्थात हर 10 में से एक मछली में प्लास्टिक मिला, जो 3 से लेकर 56 तक छोटे-बड़े टुकड़ों में था। इसका औसत आकार 4 एमएम था। रिपोर्ट की मानें तो प्लास्टिक प्रदूषण मछलियों के भोजन और जल में बेहद खतरनाक स्तर पर है और यह एक तथ्य है कि देश में प्रतिबंधित होने के बावजूद सिंगल यूज श्रेणी का प्लास्टिक नदियों व झीलों में सबसे अधिक पहुँच रहा है। मछलियों में मिले अधिकतर प्लास्टिक के टुकड़े हरे या सफेद रंग के थे। मछलियाँ इनको भोजन समझकर खाने लगी हैं।
मछलियों की 9 प्रजातियों पर अध्ययन किया गया था, जिनमें से 3 में सबसे अधिक प्लास्टिक मिला, जिनका उपयोग मानव द्वारा सबसे अधिक किया जाता है। स्वाभाविक है कि ऐसे में यह माइक्रोप्लास्टिक मानव शरीर तक भी पहुँच रहा है। इस तरह प्राकृतिक रूप से मिल रही मछलियों का जीवन भी अब सुरक्षित नहीं रह गया है। नेशनल प्रॉडक्टिविटी काउंसिल ने यूनाइटेड नेशन्स *एलएनवायरनमेंट प्रोग्राम के साथ मिलकर गंगा तट पर बसे हरिद्वार, आगरा और प्रयागराज जैसे शहरों के किनारे प्लास्टिक प्रदूषण के स्रोत की पड़ताल की। रिपोर्ट के अनुसार, 25 प्रतिशत प्लास्टिक कचरा न तो रिसाइकल होता है और न ही उसका सही ढंग से निस्तारण हो पाता है। यह कचरा शहर के प्रमुख स्थानों पर फेंका जाता है, जो बारिश के साथ बहकर नदियों में जा मिलता है।
नदियाँ इस एक कचरे को समुद्र तक बहा ले जाती हैं, जिसमें प्लास्टिक के पैकेट, बोतल, चम्मच, नायलॉन के बोरे और पॉलिथीन बैग आदि शामिल रहते हैं। यह भारत भर की नहीं, बल्कि पूरे विश्व की स्थिति है। परिणामस्वरूप पृथ्वी का दो-तिहाई भाग समुद्र, प्लास्टिक कचरे की भयावह चपेट में है। इस समय 269 हजार टन प्लास्टिक समुद्र में तैर रहा है, जो लगभग 4 अरब माइक्रो फाइबर प्रति वर्गकिमी समुद्र में अपना स्थान बना चुका है। विश्व का लगभग 70 प्रतिशत प्लास्टिक कचरा सागर में जाता है और यदि यही स्थिति रही तो 2050 तक मछलियों से अधिक सागर में प्लास्टिक होगा। जिसके विकट परिणाम हमें कल भोगने होंगे। वर्तमान में इस तरह के प्रदूषण से सागर का तापमान 0.6 डिगरी बढ़ चुका है, जिससे 20 प्रतिशत समुद्री जीवन संकट में है।
सागर के 30 प्रतिशत हिस्से में अम्ल की मात्रा अधिक हो चुकी है। यही स्थिति रही तो यह तापमान एक डिगरी से अधिक बढ़ जाएगा, जिसे एक बड़े प्राकृतिक कहर के रूप में हम सबको झेलना होगा। हजारों प्रकार के समुद्री पक्षी पहले ही अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं और बढ़ते प्लास्टिक के कारण कछुओं, सील्स और स्तनपायी जीवों का अस्तित्व खतरे में है। वास्तव में प्लास्टिक सागर के पानी में माइक्रो प्लास्टिक में बदल जाता है, जिसे समुद्री जीव अपना भोजन समझकर खा जाते हैं। एक शोध के अनुसार इस समय सागर में लगभग 150 से 510 खरब टुकड़े तैर रहे हैं। आलम यह है कि सागर का कोई भी हिस्सा इससे अछूता नहीं है, भू-मध्य रेखा से लेकर ध्रुव तक और आर्कटिक सागर से लेकर समुद्री तटों तक आज हर जगह प्लास्टिक फैला पड़ा है। एक शोध- सर्वेक्षण के अनुसार, कैलिफोर्निया के बाजार में बिकने वाली मछलियों की आँतों में बहुत अधिक प्लास्टिक के माइक्रोफाइबर्स पाए गए हैं।
इसी तरह समुद्री कछुआ तैरते प्लास्टिक को भोजन समझकर खा जाता है, जो इनकी आँतों को बरबाद कर रहा है। यही स्थिति समुद्री पक्षियों की है। अनुमान है कि लगभग 60 प्रतिशत पक्षी बहुत अधिक प्लास्टिक का सेवन कर चुके हैं और यदि यही गति रही तो 2050 तक 99 प्रतिशत समुद्री पक्षी प्लास्टिक का सेवन कर चुके होंगे और इनका अस्तित्व अधिकांशतः विलुप्ति के कगार पर होगा। दक्षिण एशियाई देशों के तटों पर माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण पर फरवरी-2023 में आई मलेशियाई अध्ययनकर्ताओं की रिपोर्ट के अनुसार, समुद्र में घुला प्लास्टिक भारत के तटों को प्रदूषित कर रहा है। दक्षिण भारत के प्रमुख तटों पर माइक्रोप्लास्टिक फैला पड़ा है।
सबसे बदतर स्थिति चेन्नई जैसे बड़े शहरों के किनारे के तटों पर है, जहाँ शहर और समुद्र दोनों ओर से माइक्रोप्लास्टिक आ रहा है। शोधकर्ताओं को चेन्नई, कर्नाटक, पुडुचेरी, केरल, ओडिशा और दक्षिण अंडमान तटों पर माइक्रोप्लास्टिक मिला है। यह प्लास्टिक फाइबर, छोटे-बढ़े टुकड़े, फिल्म आदि के रूप में है। इसके दोतरफा नुकसान प्रत्यक्ष देखे जा रहे हैं। यह पर्यटन उद्योग को नुकसान पहुँचा सकता है, ऐसे में पर्यटकों की संख्या कम हो सकती है। दूसरा मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है; क्योंकि समुद्री तट पर भारी मात्रा में नमक तैयार होता है, इस नमक में माइक्रोप्लास्टिक घुलकर मानव शरीर में प्रवेश कर रहा है। ज्ञात हो कि समुद्र से तैयार होने वाले नमक में भी माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा बढ़ रही है।
एक शोध के अंतर्गत तमिलनाडु के 8 जिलों से नमक के नमूने एकत्र किए गए, जिनको तटों पर समुद्री जल से तैयार किया जाता था। जाँच में एक किलोग्राम में 50 से अधिक प्लास्टिक के कण विद्यमान पाए गए, जो फाइबर, नायलॉन, थर्मोप्लास्टिक और छोटे टुकड़ों के रूप में थे। वर्ष-2023 में हुई इस रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ कि नमक में माइक्रोप्लास्टिक तेजी से बढ़ रहा है और मनुष्य शरीर में प्रवेश भी कर रहा है। नमक में पहली बार एक्रिलिन, एक्रेलोनाइट्राइल ब्यूटाडाइन स्टाइरीन, हाई डेंसिटी पॉलीएथिलीन आदि माइक्रोप्लास्टिक मिलने की पुष्टि हुई है। मनुष्य शरीर में प्रवेश होने पर ये प्लास्टिक कण आँतों को सबसे अधिक नुकसान पहुँचा रहे हैं और ये दीर्घकाल में गंभीर रोगों का कारण बन सकते हैं। इस तरह हवा, पानी, मिट्टी और पूरे परिवेश में तेजी से घुल रहा प्लास्टिक धरती पर अस्तित्व के लिए खतरा बन चुका है। एक अनुमान के अनुसार पूरे विश्व में इतना प्लास्टिक हो चुका है कि इससे पूरी पृथ्वी को पाँच बार लपेटा जा सकता है।
हमारे भोजन व शरीर से लेकर प्राकृतिक संपदा को विषाक्त करते माइक्रोप्लास्टिक के खतरे से जूझने व इसे रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) के दिन प्लास्टिक प्रदूषण के लिए समाधान तलाशने की थीम दी थी। समाधान का एक ही उपाय है कि प्लास्टिक का उपयोग कम करें व इसे धीरे-धीरे बंद करें। इसके वैकल्पिक उत्पादों का उपयोग करें। सरकारों का भी कर्त्तव्य बनता है कि इस दिशा में ठोस कदम उठाएँ। हालाँकि वर्ष 2019 में सरकार ने सिंगल यूज प्लास्टिक को समाप्त करने का संकल्प लिया था। साथ ही प्लास्टिक कचरे के पृथक्करण, संग्रहण और निपटाने की दिशा में बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने का प्रयास जारी है, लेकिन ये प्रयास जनता की जागरूक भागीदारी के बिना अपनी निर्णायक परिणति तक नहीं पहुँच सकते। अतः हर नागरिक का कर्त्तव्य बनता है कि वह एक जिम्मेदार व समझदार नागरिक की भाँति प्लास्टिक की विभीषिका को समझते हुए, इसके प्रति अधिकतम लोगों को जागरूक करे तथा इसके – समाधान में अपना यथासंभव सहयोग दे।
पेड़ की एक डाल पर तोता और दूसरी डाल पर बाज बैठे थे। तोते को देख बाज अकड़कर बोला – “अरे तोते! अच्छा है कि मेरा पेट भरा है, नहीं तो मैं क्षण भर में तेरे टुकड़े कर दूँ, पर तु ऐसे दुस्साहस के साथ मेरे सामने खड़ा है।” तोते ने कहा – “आप ठीक कहते हैं कि आप मुझसे ज्यादा शक्तिशाली हैं, पर शक्ति की शोभा दुर्बल पर जोर दिखाने में नहीं, गिरे हुओं को उठाने में होती है। भक्षण तो कोई भी कर सकता है, पर रक्षण करना बलवान का दायित्व है।” बात बाज की समझ में आई और उसकी समझ में परिवर्तन आ गया।
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