पर्यावरण असंतुलन का वीभत्स स्वरूप

Environment: सदियों से चला आ रहा ऋतुचक्र गड़बड़ाने लगा है। गरमी का प्रकोप हर वर्ष बढ़ता जा रहा है। ग्लेशियर पिघलने लगे हैं, ओजोन की परत में छेद हो गया है। विश्वभर में पानी की भीषण कमी के स्पष्ट संकेत मिलने लगे हैं। पर्यावरण संरक्षण आज सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं चर्चित मुद्दा बन गया है। विश्वभर में संस्थाएँ इस दिशा में क्रियाशील हो गई हैं। सरकारी स्तर पर भी कदम उठाए जा रहे हैं, पर जनजागरण की सर्वाधिक आवश्यकता है। विडंबना यह है कि एक ओर तो पर्यावरण संरक्षण के प्रयास हो रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर पर्यावरण को दूषित करने वाले कारण यथावत् बने हुए हैं, बल्कि उनमें निरंतर वृद्धि हो रही है।
उदाहरणस्वरूप दुपहिया तथा चार पहिया वाहनों से निकलने वाले धुएँ से होने वाले प्रदूषण को ही लें-एक ओर सल्फररहित पेट्रोल तथा सी०एन०जी० के प्रयोग पर जोर दिया जा रहा है तो दूसरी ओर वाहनों की संख्या में दिनोंदिन अंधाधुंध वृद्धि हो रही है। इस समस्या ने जितना विकराल रूप धारण कर लिया है, उसके अनुपात में समाधान की गति एवं उत्साह नगण्य ही कहे जा सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण के महायज्ञ में जन-जन की सहभागिता परम आवश्यक है और यह सहभागिता जुटाने में प्रिंट एवं दृश्य-श्रव्य माध्यमों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान हो सकता है। आवश्यक है कि बच्चों से लेकर बूढ़ों एवं महिलाओं तक हरेक व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में पर्यावरण- प्रदूषण की भयावहता, उसके गंभीर परिणाम तथा पर्यावरण-संरक्षण में उसके अपने योगदान का सुस्पष्ट चित्र अंकित हो जाए। उसे समझ आ जाए कि उसे क्या करना है और क्या नहीं करना है। अभी तक पर्यावरण संरक्षण की चर्चा-परिचर्चा, उच्चस्तरीय गोष्ठियाँ, सेमिनारों, सभाओं तक ही सीमित है। आम आदमी आज भी इस हलचल से अनभिज्ञ है, इसलिए उदासीन भी है।
इन प्रयासों में गति तभी आ पाएगी, जब तक हरेक घर, हरेक परिवार, हरेक गृहिणी और एक- एक बच्चे की जबान पर पर्यावरण संरक्षण की बात होगी। इस अभियान को युद्धस्तर पर चलाना होगा। पर्यावरण को दूषित करने वाली हमारी नासमझी, हमारी परंपराओं, हमारी आधुनिकता, हमारी वैज्ञानिक प्रगति, हमारे स्वार्थगत लोभ, हमारे नेताओं को वोट की भूख, सभी का मिला-जुला योगदान है। झुग्गी-झोंपड़ियों की बसाहट यहाँ-वहाँ, जहाँ- तहाँ गंदी बस्तियों का कुकुरमुत्तों की भाँति उगते जाना वर्षों से एक आम बात हो गई है, जहाँ सामान्य नागरिक सुविधाओं का नामोनिशान तक नहीं होता। इस बढ़ते प्रदूषण की अनदेखी ही नहीं की जाती, बल्कि यह कहना अधिक सही होगा कि इसे ढके-छिपे बढ़ावा दिया जाता है।
पेड़ कटते ही चले जा रहे हैं। कानून हैं, मगर मिलीभगत से उनकी धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। भ्रष्टाचार हमारे खून में घुल चुका है। साधनसंपन्न अपने को हर कानून से ऊपर मानता है, हर प्रकार से मनमानी करता है। योजनाएँ बनाई जाती हैं, मगर वह पूरी नहीं होतीं। स्वच्छता अभियान पर करोड़ों रुपये खरच कर दिए गए, किंतु कागजों में। प्रदूषण पहले से भी अधिक बढ़ गया है। ऐसा लगता है कि थोड़ा-बहुत, आधा-अधूरा जो कुछ भी हो रहा है उसमें किसी स्पष्ट नीति, कार्ययोजना का नितांत अभाव है। शासन-प्रशासन, कानून का डर किसी को भी नहीं रहा, जिसके जो समझ में आए वह कर रहा है। जगह-जगह अतिक्रमण आम बात है। जमीन की भूख ऐसी बढ़ गई है कि लोग निकास के रास्ते तक बंद कर देते हैं। गंदे पानी के नालों पर दुकानें और मकान बन जाते हैं। रेलवे लाइनों के किनारे मीलों तक झोंपड़ पट्टियाँ नजर आती हैं।
नगरों के आस-पास के सुंदर टीलों और पहाड़ियों का कत्लेआम आम बात है। वहाँ पत्थरों को तोड़-तोड़कर झुग्गी-झोंपड़ियाँ बसती जा रही हैं। प्राकृतिक संपदा का जैसे कोई वारिस ही नहीं रहा। सब्जी मंडियाँ कीचड़, कचरे का पर्याय बन कर रह गईं। न कोई देखने वाला है न सुनने वाला, एवरेस्ट शिखर तक पर पर्वतारोही दल टनों कचरा छोड़ आते हैं। अस्पतालों, नर्सिंग होमों का जैविक कचरा खुले में डाला जाता है। पढ़ने वाले बच्चों, बीमारों, वृद्धों की असुविधा का किसी को ध्यान नहीं। मोटरसाइकिलों, स्कूटरों से एक्जॉस्ट हटाकर भयंकर शोर करते हुए सड़कों पर दौड़ाया जाता है। गाड़ियों में लगे प्रेशर हॉर्न आने-जाने वालों के कानों को बहरा करते चलते हैं। साइलेंस जोन अभी भी हैं, किंतु उपेक्षित। घर-घर में बोरवैल खुदवाए जा रहे हैं, जिससे जमीन के नीचे का जलस्तर निरंतर गिरता जा रहा है।
पशु-पक्षी तेजी से लुप्त होते जा रहे हैं। गिद्धों की अचानक घटती संख्या आजकल चर्चा का विषय बनी हुई है। नदियों और समुद्रों में बढ़ते प्रदूषण के कारण जल-जंतुओं का निरंतर ह्रास हो रहा है। करोड़ों वर्षों में प्रकृति ने जो सृजन किया था, वह हम कुछ ही वर्षों में मिटाने पर तुल गए हैं।विज्ञान और प्रकृति में बजाय सामंजस्य के एक होड़ लगी है। प्लास्टिक की थैलियों ने तो कहर ही ढा रखा है। पशु उन्हें निगलते हैं और बिन आई मौत मरते हैं। दूषित पर्यावरण का कुप्रभाव मनुष्य के शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। बीमारियाँ बढ़ रही हैं। नए-नए रोग अस्तित्व में आ रहे हैं। मनुष्य आत्मसंतुलन, धैर्य, सहिष्णुता खोकर हिंसक होता जा रहा है। यह तो थी पर्यावरण- प्रदूषण की एक छोटी-सी बानगी और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है, किंतु अधिक विस्तार में यह न आवश्यक है न ही व्यावहारिक ।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
– श्रीमद्भगवद्गीता
अर्थात मनुष्य अपने द्वारा ही संसार- सागर से पार होता है और स्वयं ही अधोगति – को प्राप्त होता है; क्योंकि यह आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है। अब समय कहने-सुनने का नहीं, वास्तव में कुछ करने का है। हर व्यक्ति इस संदर्भ में अपनी – प्राथमिकताएँ खुद ही निश्चित कर ले और उन्हें – कार्यरूप में परिणत करने में जुट जाए। समस्याएँ हमारे सामने हैं। अपनी परिधि के अंदर, अपनी = क्षमता के अनुरूप, अपनी सामर्थ्य के अनुसार हम – में से हरेक को अपना-अपना कर्त्तव्य स्वयं निश्चित – करना है और उसे अमल में लाना है। पर्यावरण- – संरक्षण के लिए जन भागीदारी एवं जिम्मेदारी – अभियान चलाकर इस समस्या से निजात पाई जा सकती है।
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